गांधी आज भी प्रासंगिक, मजबूरी नहीं बल्कि मजबूती के प्रतीक: प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल

कार्यक्रम की शुरुआत कॉलेज की गवर्निंग बॉडी की चेयरपर्सन अनुराधा कृष्णा के बीज वक्तव्य से हुई। उन्होंने संस्थापक बृज किशन चांदीवाला और महात्मा गांधी के घनिष्ठ संबंधों को याद किया। उनके वक्तव्य में गांधी के विचारों और चांदीवाला के जीवन में उनके प्रभाव को रेखांकित किया गया।;

Update: 2026-11-03 09:01 GMT

नई दिल्ली: जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज के संस्थापक बृज किशन चांदीवाला की स्मृति में कांस्टीट्यूशनल क्लब में 'गांधी टुडे' विषय पर पहला व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में संघ लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने महात्मा गांधी के विचारों, उनके नैतिक साहस और वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि गांधी को आज भी मजबूती, इच्छाशक्ति और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता के प्रतीक के रूप में समझने की जरूरत है। व्याख्यान का उद्देश्य गांधी के विचारों को वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक संदर्भों में देखना तथा उनके जीवन से जुड़े उन पहलुओं पर विचार करना था, जो आज भी समाज को दिशा दे सकते हैं। कार्यक्रम में कॉलेज के प्राध्यापक, कर्मचारी और छात्राएं शामिल हुईं।

बृज किशन चांदीवाला और गांधी के संबंधों को किया याद

कार्यक्रम की शुरुआत कॉलेज की गवर्निंग बॉडी की चेयरपर्सन अनुराधा कृष्णा के बीज वक्तव्य से हुई। उन्होंने संस्थापक बृज किशन चांदीवाला और महात्मा गांधी के घनिष्ठ संबंधों को याद किया। उनके वक्तव्य में गांधी के विचारों और चांदीवाला के जीवन में उनके प्रभाव को रेखांकित किया गया। कॉलेज की प्राचार्य प्रो. स्वाति पाल ने व्याख्यान की अध्यक्षता की। उन्होंने प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल से गांधी के विचारों, उनके कार्यों और आज के समय में उनकी महत्ता पर प्रकाश डालने का आग्रह किया। इसके बाद प्रो. अग्रवाल ने गांधी के जीवन और विचारों को वर्तमान समाज से जोड़ते हुए अपनी बात रखी।


 


मजबूती का प्रतीक बताया

प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने व्याख्यान में गांधी को मजबूरी के बजाय मजबूती का प्रतीक बताया। उन्होंने समाज में प्रचलित कहावत 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी' को गांधी के व्यक्तित्व की सही व्याख्या नहीं माना। उनके विचारों के अनुसार, गांधी की वास्तविक पहचान उनकी नैतिक दृढ़ता, इच्छाशक्ति और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता में थी। प्रो. अग्रवाल की पुस्तक 'मज़बूती का नाम महात्मा गांधी' भी इसी वैचारिक दृष्टिकोण को सामने रखती है। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति ने अपनी शर्तों पर ब्रिटिश शासन की ताकत और उसके प्रभाव को चुनौती दी, उसे मजबूर व्यक्ति के रूप में कैसे देखा जा सकता है? उनके अनुसार, गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन में बालक, युवा, वृद्ध और महिलाओं की भागीदारी किसी मजबूरी का परिणाम नहीं थी। यह गांधी की अपील, उनके विचारों और नैतिक प्रभाव का परिणाम था, जिसने समाज के अलग-अलग वर्गों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा।

सत्य के लिए प्रियजनों के खिलाफ खड़े होने का साहस

प्रो. अग्रवाल ने कहा कि गांधी में सत्य और सही बात के लिए अपने सबसे प्रिय लोगों के खिलाफ खड़े होने का भी साहस था। उनके मुताबिक, गांधी का नैतिक बल केवल सार्वजनिक जीवन तक सीमित नहीं था, बल्कि व्यक्तिगत संबंधों में भी उनकी प्रतिबद्धता दिखाई देती थी। उन्होंने 1947 के दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि जब देश के कई हिस्सों में स्वतंत्रता का उत्सव मनाया जा रहा था, तब गांधी सांप्रदायिक हिंसा को शांत करने के प्रयास में जुटे थे। उन्होंने भारत और पाकिस्तान, दोनों पक्षों की ओर से होने वाली हिंसा का विरोध किया। प्रो. अग्रवाल ने गांधी के सार्वजनिक जीवन की असफलताओं और विवादों पर भी चर्चा की। उन्होंने माना कि गांधी के अनेक फैसले विवादास्पद रहे और उनके लंबे सार्वजनिक जीवन की आलोचना भी हुई। लेकिन उनके अनुसार, इन आलोचनाओं के बावजूद गांधी के योगदान के एक महत्वपूर्ण पहलू को नकारना मुश्किल है।

गांधी ने ब्रिटिश सत्ता के भय और प्रभाव को चुनौती दी

प्रो. अग्रवाल ने कहा कि गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य की हिंसा और उसके प्रभाव से पैदा होने वाले भय को चुनौती दी। उनके मुताबिक, गांधी की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि उन्होंने औपनिवेशिक सत्ता के दबदबे को कमजोर किया और लोगों में अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस पैदा किया। उन्होंने गांधी के आंदोलन को केवल राजनीतिक संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि समाज की नैतिक चेतना से जुड़े प्रयास के रूप में भी देखा। उनके अनुसार, गांधी की प्रासंगिकता इस बात में है कि उन्होंने सत्य, अहिंसा और नैतिक साहस को सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनाया।

व्याख्यान के दौरान डाक टिकट का अनावरण

कार्यक्रम के दौरान विशेष रूप से डाक टिकट का अनावरण भी किया गया। यह आयोजन संस्थापक बृज किशन चांदीवाला की स्मृति और गांधी के विचारों को सम्मान देने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. संध्या गर्ग तथा प्रो. रूबी भारद्वाज ने किया। व्याख्यान में कॉलेज के प्राध्यापकों, कर्मचारियों और छात्राओं ने भाग लिया। आयोजन के माध्यम से गांधी के विचारों, उनके नैतिक साहस और वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता पर संवाद किया गया।

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