बायजाबाई शिंदे दक्षिण की सौंदर्य लतिका

किताब 'राजमाता श्रीमंत बायजाबाई शिंदे' उन्नीसवीं सदी में 'दक्षिण की सौंदर्य लतिका' के नाम से मशहूर ग्वालियर रियासत के महाराज दौलतराव सिंधिया की पत्नी बायजाबाई की सम्मोहक शख़्सियत और उनकी हंगामख़ेज़ ज़िंदगी के उत्तरार्ध को बख़ूबी बयां करती है

Update: 2023-04-30 05:57 GMT

- ज़ाहिद ख़ान

किताब 'राजमाता श्रीमंत बायजाबाई शिंदे' उन्नीसवीं सदी में 'दक्षिण की सौंदर्य लतिका' के नाम से मशहूर ग्वालियर रियासत के महाराज दौलतराव सिंधिया की पत्नी बायजाबाई की सम्मोहक शख़्सियत और उनकी हंगामख़ेज़ ज़िंदगी के उत्तरार्ध को बख़ूबी बयां करती है। लेखक डॉ. अजय अग्निहोत्री ने ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और पुराने ग्रंथों का सहारा लेकर बड़े ही लगन और श्रम से बायजाबाई की जीवनी तैयार की है। उनके जीवन पर हिंदी में यह पहली किताब है। ग्वालियर के इतिहास पर काफ़ी कुछ लिखा गया है। इसके इतिहास पर तमाम ऐतिहासिक सामग्री मिल जाती है, लेकिन सिंधिया राजवंश की इस राज महिला के संबंध में अभी तक कोई प्रमाणिक किताब नहीं थी। लेखक ने यह किताब लिखकर, अपनी ओर से इस कमी की भरपाई करने की कोशिश की है

डॉ. अजय अग्निहोत्री, इससे पहले भी इतिहास पर कुछ किताबें लिख चुके हैं। ख़ास तौर पर उन्होंने मध्य प्रदेश के चंबल संभाग स्थित गोहद और राजस्थान स्थित धौलपुर, भरतपुर के जाटों के राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास पर दो महत्वपूर्ण किताबें और ग्वालियर के इतिहास पर एक किताब 'हमारा ग्वालियर' लिखी है। 'राजमाता श्रीमंत बायजाबाई शिंदे', पूर्व में लिखी उनकी इन किताबों से इस मायने में अलग है कि यह पूरी किताब बायजाबाई शिंदे के इर्द-गिर्द घूमती है। बायजाबाई शिंदे के बहाने उस दौर की ग्वालियर रियासत और उसके दूसरी रियासतों और अंग्रेजी हुकूमत से संबंधों का भी खुलासा होता है।

किताब आठ अध्यायों में विभक्त है। किताब को और प्रमाणिक स्वरूप देने के लिए लेखक ने इसमें सात परिशिष्ट भी रखे हैं। मसलन 'मालवा के महान विद्रोह कालीन अभिलेख' और 'ग्वालियर प्रवास के समय कर्नल स्लीमन के के विचार' आदि। इन परिशिष्टों के अध्ययन से उस दौर का पूरा मंज़र आंखों के सामने ज़िंदा हो जाता है। मध्यकालीन इतिहास की जब भी बात होती है, तो इसे मुग़लों के इतिहास से जोड़ा जाता है। मुग़ल इतिहास के ख़ास तौर पर उन प्रसंगों का ज़िक्र छेड़ा जाता है कि ''वहां सत्ता संघर्ष आम था। आम अवाम के ऊपर शासकों का बेहद अत्याचार था। उनका उत्पीड़न था।....आदि-आदि।'' यह बातें बहुत हद तक सही भी हैं।

लेकिन इस तरह की अधिनायक प्रवृतियां सभी शासकों में रही हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में शासन करने वाले शासकों मराठे, राजपूत, परमार, होल्कर और निज़ाम आदि का इतिहास यदि उठा कर देखें, तो शासन का चरित्र कमोबेश ऐसा ही रहा है। वहां भी अपनी सत्ता को बचाने का इसी तरह का आंतरिक और बाहरी संघर्ष था। राजशाही और सामंतशाही की सभी अच्छाईयां और बुराईयां मौजूद थीं। बहरहाल, प्रस्तुत किताब कहने को तो बायजाबाई शिंदे पर है, लेकिन इसमें उस दौर के मराठा साम्राज्य के साथ-साथ सिंधिया रियासत में सत्ता के लिए चल रहे संघर्ष और पारिवारिक उठा-पटक का भी विस्तृत ब्यौरा है। बायजाबाई शिंदे का पिता सर्जेराव घाटगे, जो दौलतराव सिंधिया का दीवान था, उसकी क्रूरता के तमाम कि़स्सों के साथ ही किताब में इस बात को भी उल्लेखित किया गया है कि दौलतराव सिंधिया और बायजाबाई शिंदे के विवाह को इतिहास में 'राजनैतिक विवाह' की संज्ञा दी गई है। सर्जेराव घाटगे ने सत्ता में अपना हस्तक्षेप बढ़ाने के लिए ही अपनी बेटी बायजाबाई शिंदे का विवाह दौलतराव सिंधिया से किया था।

बायजाबाई शिंदे न सिफ़र् अद्वितीय सुंदर थीं, बल्कि उनमें राजकाज के भी अद्भुत गुण थे। वे दौलतराव सिंधिया के राजकाज में भी अपना हाथ बंटाती थीं। घोड़े पर बैठना, बंदूक चलाना, भाला फेंकना, तलवार चलाने और युद्ध की पारंपरिक कला में एक कुशल और योग्य सैनिक की भांति वे दक्ष थीं। सामरिक विशेषताओं के साथ-साथ वह श्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ भी थीं। दौलतराव सिंधिया उनमें गहरा यक़ीन रखते थे। बायजाबाई शिंदे ने दौलतराव सिंधिया की बीमारी के समय ग्वालियर के रीजेण्ट के रूप में शासन चलाया। उनकी मृत्यु के बाद भी उन्होंने ही राज्य की बागडोर संभाली। बायजाबाई शिंदे 1827 से लेकर 1833 कुल छह साल तक ग्वालियर के राजसत्ता के केन्द्र में रहीं और उन्होंने बड़े ही चतुराई से अंग्रेज़ हुकूमत को साधते हुए राजकाज चलाया। अंग्रेज़ों की कूटनीति और राजमहल के आंतरिक संघर्ष की वजह से वे ज्यादा समय तक सत्ता में नहीं रह पाईं। यदि सत्ता में रहने का उन्हें और भी मौक़ा मिलता, तो क्षेत्र में बायजाबाई शिंदे के अनेक काम हमारे सामने आते। किताब में लेखक ने ऐतिहासिक तथ्यों के साथ बायजाबाई और उनके दत्तक पुत्र जनकोजीराव सिंधिया के बीच के सत्ता-संघर्ष को भी दर्शाया है। इसी सत्ता-संघर्ष का ही नतीजा था कि उन्हें ग्वालियर छोड़ना पड़ा। बाद में वे फतेहगढ़, इलाहाबाद, बनारस, नासिक और उज्जैन रहीं। इधर ग्वालियर राज्य पर अंग्रेज़ों का एकछत्र राज हो गया। वे इस रियासत को अपनी शर्तों पर चलाते रहे।

किताब में एक अध्याय 'सन् 1857 की क्रांति और बायजाबाई' है। इस अध्याय को पढ़ने से मालूम चलता है कि 1857 की क्रांति में सिंधिया राजवंश और बायजाबाई की निष्ठा अंग्रेज़ हुकूमत में ही थी। उन्होंने आख़िरी समय तक क्रांतिकारियों का साथ नहीं दिया। इस 'वफ़ादारी' का इनाम जयाजीराव सिंधिया को मिला और अंग्रेज़ों ने उन्हें ग्वालियर की सत्ता पर फिर गद्दीनशीं कर दिया। लेखक ने किताब के इसी अध्याय में ग्वालियर रेजीडेंट मैक्फर्सन के इस कथन को भी शामिल किया है, जो 1857 की क्रांति में अंग्रेजों की जीत के बाद का है। ''यदि सिंधिया सरकार भी सन् 1857 की क्रांति में शामिल हो जाती, तो क्रांति का क्या स्वरूप होता, इसकी तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे।'' इसके अलावा मध्य भारत के पॉलीटिकल एजेंट सर राबर्ट हेमिल्टन द्वारा बायजाबाई साहब को 26 अप्रैल 1858 में लिखा पत्र भी शामिल है, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश सरकार के प्रति सिंधिया और बायजाबाई की निष्ठा की तारीफ़ की है। पत्र के मुताबिक-''पेशवा ने होल्कर, बायजाबाई और सिंधिया इन तीनों नामों का उपयोग करके जनता में असंतोष फैलाने का प्रयत्न किया, लेकिन इन तीनों की ब्रिटिश सरकार के प्रति सच्ची भक्ति होने के कारण इन्हें सफलता नहीं मिल सकी। इन तीनों में से यदि कोई भी एक पेशवा का पक्ष स्वीकार कर लेता, तो हमें (अंग्रेज़ों को) बहुत बड़ी विपदा का सामना करना पड़ जाता। यदि वैसा हो जाता, तो ठाकुर, ज़मींदार लोग भी उनसे मिल जाते और प्रत्येक गांव में अंग्रेज़ों के खिलाफ बग़ावत हो जाती। फिर भी विजय हमारी ही होती, लेकिन हिंदुस्तान के अन्य राजवंश भी हमारे विरुद्ध हो जाते और हिंदुस्तान में बहुत दिनों तक युद्ध चलता रहता और उधर यूरोप में भी बलवा होने का डर पैदा हो जाता। हमें जो नेटिव सेना की महत्वपूर्ण मदद मिली, वह भी नहीं मिल पाती।'' अंग्रेज़ रेजीडेंट मैक्फर्सन के कथन और राबर्ट हेमिल्टन के पत्र से कहीं न कहीं यह बात भी ज़ाहिर हो जाती है कि 1857 क्रांति के असफल हो जाने के क्या कारण थे।

बावजूद इसके लेखक ने किताब में अपनी ओर से कुछ संतुलन बिठाने की कोशिश भी की है। 'सन् 1857 की क्रांति और जयाजीराव सिंधिया 'एक पुनरावलोकन' अध्याय में वे कुछ चुनिंदा तथ्यों से यह साबित करने की नाकाम कोशिश करते हैं कि 1857 क्रांति के समय जयाजीराव सिंधिया ने 'ग्वालियर हित' को ही सर्वोपरि रखा। 'बायजाबाई का व्यक्तित्व एवं कृतित्व' अध्याय में लेखक ने बायजाबाई की शख़्सियत पर रौशनी डाली है। उनके स्वभाव, रुचियों और राजनीतिज्ञ के तौर पर उनके कार्यों को जांचा है। किताब में अंग्रेज़ महिलाओं फैनी पार्क्स के रोज़नामचे और एमिली ईडन, मिसेज ड्यूबर्ली के लेखन के हवाले से भी बायजाबाई के व्यक्तित्व का बहुत कुछ खुलासा होता है।

किताब के आखिर में लेखक ने कुछ चित्र भी संकलित किए हैं, जो बायजाबाई के अलावा उनके बाकी परिवार के लोगों के हैं। वहीं उन ऐतिहासिक भवनों, छतरियों और मंदिरों की भी तस्वीरें हैं, जिनसे कहीं न कहीं बायजाबाई का वास्ता रहा है। ग्वालियर स्थित बैजाताल, बनारस का ज्ञानवापी मंडप, गंगा किनारे सिंधिया घाट, इलाहाबाद स्थित वेणी-माधव मंदिर और उज्जैन स्थित श्री गोपाल मंदिर का निर्माण बायजाबाई ने ही करवाया था। अपनी ज़िंदगी के आख़िर में उन्होंने न सिफ़र् कई नये मंदिर बनवाए, बल्कि बड़े मंदिरों को भी खू़ब दान दिया। कुछ तस्वीरें बायजाबाई कालीन प्रचलित शाही सिक्कों की हैं।

Full View

Tags:    

Similar News