महिलाएं ही खेती को बचा सकती हैं
किसानों के लिए यह बहुत खुशी का मौका है। वे फसलों के भंडारण व बिक्री में लगे हुए हैं। इस समय मुझे बचपन की याद आ रही है, जब मेरी मां खेतों में काम करती थी।
— बाबा मायाराम
महिलाओं ने जैविक खेती को आगे बढ़ाया है। तेलंगाना में डेक्कन डेवलपमेंट सोसायटी (डीडीएस) की महिलाओं ने न केवल पौष्टिक अनाज की खेती की है, बीज बैंक भी बनाए हैं, बल्कि गांव देहातों में सस्ती दुकान खोलकर इसे सबके लिए उपलब्ध कराया है। कर्नाटक में वनस्री नामक समूह ने बीजों के आदान-प्रदान का सिलसिला चलाया है। नगालैंड में नार्थ ईस्ट नेटवर्क (एनईएन) नामक संस्था ने पौष्टिक अनाजों की खेती को फिर से खड़ा किया है।
हाल ही खेतों में धान कटाई हुई है। किसानों के लिए यह बहुत खुशी का मौका है। वे फसलों के भंडारण व बिक्री में लगे हुए हैं। इस समय मुझे बचपन की याद आ रही है, जब मेरी मां खेतों में काम करती थी। वह अकेली नहीं थी, जो खेत में काम करने जाती थी, बल्कि हमारे गांव की अधिकांश महिलाओं का समय खेत में बीतता था। पिताजी का तो लगभग एक महीने अस्थायी रूप से खेत में ही डेरा होता था, जब तक कटाई और बालियों में से अनाज निकालने का काम पूरा नहीं हो जाता था।
मैं इस कॉलम में परंपरागत खेती को याद करना चाहूंगा, जिसमें महिलाओं की बड़ी भूमिका होती थी। वे खेत में बीज बोने से लेकर उनके संरक्षण-संवर्धन और भंडारण तक का काम बड़े जतन से करती रही हैं। पशुपालन से लेकर विविध तरह की हरी सब्जियां लगाने और फलदार पेड़ों को रोपने से लेकर उनके जतन का काम करती हैं। जंगलों से फल-फूल, पत्ती के गुणों की पहचान करना व संग्रह करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही है। वे जैव विविधता की जानकार और संरक्षक हैं। यानी वे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से लेकर खाद्य सुरक्षा का महत्वपूर्ण काम करती रही हैं। लेकिन आजकल आधुनिक खेती में उनकी भूमिका सिमट गई है।
अगर हम देखें तो जब से खेती में मशीनीकरण हुआ है तब से महिलाओं की भूमिका सिमटती जा रही है। जबकि पूर्व में खेती में सिर्फ हल-बक्खर चलाने को छोड़कर महिलाएं सभी काम करती थीं। बल्कि छत्तीसगढ़ में तो कुछ जगह हल भी चलाती हैं। पारंपरिक खेती में बीजों का चयन, बीजोपचार, बुआई, निंदाई-गुड़ाई और कटाई-बंधाई तक की पूरी प्रक्रिया में महिलाएं जुड़ी थीं। खेतों में फसल की रखवाली, मवेशियों की परवरिश और गोबर खाद बनाने जैसे खेती से जुड़े काम उनके जिम्मे थे। हालांकि पहाड़ और जंगल पट्टी में अब भी महिलाएं खेती के काम में संलग्न हैं।
कड़कड़ाती ठंड हो या मूसलाधार बारिश या फिर चिलचिलाती तेज धूप महिलाएं सभी परिस्थितियों में खेती का काम करती रही हैं। खेती के विकास में उनका योगदान महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, भोजन के लिए ईंधन जुटाना, खाना बनाना, ढोरों के लिए भी खेतों से घास लाना और फिर खेतों में काम करने जाना और फिर खेत से आकर घर का काम करना आदि उनकी जिम्मेदारी में शामिल है।
निंदाई-गुड़ाई के दौरान विजातीय पौधे और खरपतवार को फसल से अलग करना भी उनके काम का हिस्सा हुआ करता था। जब पौधों में फूल आ जाते हैं तब वे ऐसे विजातीय पौधों को आसानी से पहचानकर अलग कर देती थीं। निंदाई-गुड़ाई तीन-चार बार करनी पड़ती थी। खरपतवारनाशक के बढ़ते इस्तेमाल से उनकी भूमिका कम हो गई।
बीजों के चयन में उनकी खास भूमिका होती थी। पहले खेतों में ही बीजों का चयन हो जाता था, इसमें देखा जाता था कि सबसे अच्छे स्वस्थ पौधे किस खेत में हैं। किस खेत के हिस्से में अच्छी बालियां हैं। वहां किसी तरह के कमजोर और रोगी पौधे नहीं होने चाहिए। अगर ऐसे पौधे फसलों के बीच होते थे तो उन्हें हटा दिया जाता था। फिर अच्छी बालियों को छांटकर उन्हें साफ कर और सुखा लिया जाता था। इसके बाद बीजों का भंडारण किया जाता था। अगली फसल के मौके पर इन्हीं बीजों को बोया जाता था। यह किसानों की जांची-परखी विधि है। इन सब कामों में महिलाएं ही मदद करती थीं।
बीज भंडारण पारंपरिक खेती का एक अभिन्न हिस्सा है। अलग-अलग परिस्थिति और संस्कृति के अनुरूप किसानों ने बीजों की सुरक्षा के कई तरीके और विधियां विकसित की हैं। मक्का के बीज को घुन और खराब होने से बचाने के लिए चूल्हे के ऊपर छींके पर रखते हैं और सतपुड़ा अंचल में खुले में मक्के के भुट्टे को खंबे को छिलका समेत उल्टे लटकाकर रखते हैं। छिलका बरसाती का काम करता है और बारिश का पानी भी उन्हें खराब नहीं कर पाता।
मिट्टी की बड़ी कोठियों में, लकड़ी के पटाव पर, मिट्टी की हंडी में व ढोलकी में बीज रखे जाते थे। इसके अलावा, तूमा (लौकी की एक प्रजाति) बांस के खोल में बीजों का भंडारण किया जाता था। इसी प्रकार बीजों को धूप में सुखा कर, कोठी या भंडारण के स्थान पर धुंआ किया जाता था, जिससे पतंगे या घुन नहीं लगता। कीड़ों से बचाव के लिए लकड़ी या गोबर से जली राख या रेत भी बीजों में मिलाते हैं। गांव में अब भी मिट्टी की कोठियां मिल सकती हैं, हालांकि इनमें कमी आई हैं।
बीज के अभाव में बीजों का आदान-प्रदान हुआ करता था। कई बार महिलाएं अपने मायके से ससुराल बीज ले आती थीं। खासतौर से सब्जियों के बीज की अदला-बदली रिश्तेदार और परिवारजनों में होना आम बात थी।
धान रोपाई का काम तो महिलाएं करती हैं। जब वे रंग-बिरंगे कपड़ों में गीत गाते हुए धान रोपाई करती हैं तो देखते ही बनता है। इनमें कई स्कूली विद्यार्थी भी होते हैं। वे स्कूल में पढ़ते भी हैं और खेतों में भी जमकर काम करते हैं। पहले दीपावली के समय लम्बी छुट्टियां होती थीं, जिन्हें फसली छुट्टियां भी कहा जाता था। यानी इन छुट्टियों में बच्चे खेतों के काम में मदद करते थे, और फसलों व अनाजों के बारे में सीखते थे।
पहले हर घर में बाड़ी हुआ करती थी, जिसे जैव विविधता का केन्द्र हुआ करती थी। इसमें कई तरह की हरी सब्जियां, मौसमी फल और मोटे अनाज लगाए जाते थे। जैसे भटा, टमाटर, हरी मिर्च, अदरक, भिंडी, सेमी (बल्लर), मक्का, ज्वार आदि होते थे। मुनगा, नींबू, बेर, अमरूद आदि बच्चों के पोषण के स्रोत होते थे। इसमें न अलग से पानी देने की जरूरत थी और न खाद की। जो पानी रोजाना इस्तेमाल होता था उससे ही बाड़ी की सब्जियों की सिंचाई हो जाती थी। लेकिन इनमें कई कारणों से कमी आ रही है। ये सभी काम महिलाएं ही करती थीं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में अब भी बाड़ी में सब्जियां लगाई जाती हैं।
छत्तीसगढ़ में सब्जी बाजार में महिलाएं ही सब्जी बेचती हैं। फुटपाथ पर ताजी हरी सब्जियों को लोगों को खरीदते हुए देखा जा सकता है। इन हाट-बाजारों में मशरूम, हरी सब्जियां, फल की दुकानें लगाती हैं। कई गांव, कस्बों व रायपुर शहर में भी सब्जी बाजारों में महिलाएं ही सब्जियां बेचते दिखती हैं।
जंगल क्षेत्र में रहने वाले लोगों की आजीविका जंगल पर ही निर्भर है। खेत और जंगल से उन्हें काफी अमौद्रिक चीजें मिलती हैं, जो पोषण के लिए नि:शुल्क और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती हैं। ये सभी चीजें उन्हें अपने परिवेश और आस-पास से मिल जाती है। जैसे बेर, जामुन, अचार, आंवला, महुआ, मकोई, सीताफल, आम, शहद और कई तरह के फल-फूल, जंगली कंद और पत्ता भाजी सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं। यानी खेती एक तरह की जीवन पद्धति है जिसमें जैव विविधता का संरक्षण होता है। मिट्टी, पानी और पर्यावरण का संरक्षण होता है और इन सब में महिलाओं की भूमिका अहम है।
मैंने देश के कई कोनों में खेती पर, विशेष कर देसी बीजों वाली खेती पर रिपोर्टिंग की है। महिलाओं ने जैविक खेती को आगे बढ़ाया है। तेलंगाना में डेक्कन डेवलपमेंट सोसायटी (डीडीएस) की महिलाओं ने न केवल पौष्टिक अनाज की खेती की है, बीज बैंक भी बनाए हैं, बल्कि गांव देहातों में सस्ती दुकान खोलकर इसे सबके लिए उपलब्ध कराया है। कर्नाटक में वनस्री नामक समूह ने बीजों के आदान-प्रदान का सिलसिला चलाया है। नगालैंड में नार्थ ईस्ट नेटवर्क (एनईएन) नामक संस्था ने पौष्टिक अनाजों की खेती को फिर से खड़ा किया है। इस तरह के अनेक काम देश भर में किए जा रहे हैं। इन सबमें महिलाएं ही अगुआई कर रही हैं।
कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि कृषि में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। खासतौर पर जंगल और पहाड़ में खेती उन पर ही निर्भर है। नई रासायनिक और आधुनिक खेती में जो अभूतपूर्व संकट आया है उससे जंगल व परंपरागत खेती भी प्रभावित हो रही है। ऐसे में मिट्टी-पानी और जैव विविधता, पर्यावरण देशी बीजों की हल-बैल की परंपरागत खेती को बचाना जरूरी है और ऐसी परंपरागत खेती को वे ही बचा सकती हैं क्योंकि उनके पास बरसों से संचित परंपरागत ज्ञान, कौशल व अनुभव है। कई छोटे- छोटे प्रयोग इस दिशा में हो रहे हैं। जलवायु बदलाव के दौर में यह और भी जरूरी हो गया है। लेकिन क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?