अमेरिका का वेनेजुएला पर हमला दुनिया भर के लिए चेतावनी

यह गुंडों जैसी हरकत है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के साथ उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को भी बेडरुम से घसीट कर बाहर निकालना और उठा कर ले जाना

Update: 2026-01-04 22:25 GMT
  • शकील अख्तर

मूल मुद्दा दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों पर कब्जा करने का है। अमेरिका ने इराक में क्या किया था। कितने झूठे आरोप लगाए थे राष्ट्रपति सद्दाम पर। जैसे यहां ड्रग के, तानाशाह होने के और पता नहीं क्या-क्या आरोप लगाए जा रहे हैं वैसे ही वहां रासायनिक हथियार के आरोप लगाए थे। आज तक साबित नहीं कर पाया अमेरिका।

यह गुंडों जैसी हरकत है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के साथ उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को भी बेडरुम से घसीट कर बाहर निकालना और उठा कर ले जाना। मतलब अब अमेरिका को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि दुनिया में कोई क्या सोचेगा? और महिला अधिकार सम्मान की तो बात ही नहीं। दूसरे देश में घुसने और वहां के राष्ट्रप्रमुख और उसकी पत्नी को उठा ले जाना क्या कोई सामान्य घटना है? किसी अन्य देश को या किसी को भी क्या अधिकार है? यह अपहरण करना है या अतंरराष्ट्रीय आतंकवाद?

राष्ट्रपति मादुरो पर वह कई आरोप लगा रहा है। झूठे मनगढ़ंत। लेकिन उनकी पत्नी पर क्या आरोप हैं? कोई भी कानून अगर पति दोषी हो तो भी पत्नी के साथ इस तरह के सलूक की इजाजत नहीं देता। लेकिन अगर आप भारतीय मीडिया देखें तो उसमें यह सवाल सिरे से गायब है। ज्यादातर खबरें अमेरिका के एंगल से लिखी गई हैं। और राष्ट्रपति एवं उनकी पत्नी के अपहरण को जस्टिफाई किया गया है। कारण बता दिए जाते हैं कि इसलिए अमेरिका ने यह किया। भारत में भी जहां अपराध को उन्हें दबाना होता है वहां यह सवाल उठा देते हैं कि उसने यह अपराध क्यों किया।

यहां एक और पहलू अंतरराष्ट्रीय रूप से रिश्वत देने का भी आ रहा है। राष्ट्रपति का आवास सुरक्षा घेरे में था। होता ही है। और यहां तो अमेरिका कई महीनों से धमकी दे रहा था। सुरक्षा और कड़ी की गई होगी। मगर राष्ट्रपति और पत्नी को इस तरह ले गए जैसे फिल्मों में गुंडे बाजार से कोई सामान उठा कर ले जाते हैं। फिल्मों में कोई नहीं बोलता तो यहां भी कोई नहीं बोला। फिल्मों में तो डर दिखाया जाता है। यहां कहा जा रहा है कि अमेरिका ने पहले ही वहां की सेना और सुरक्षा व्यवस्था को मोटी रिश्वतें पहुंचा दी थीं। सब खामोश रहे।

जो लोग सोवियत संघ के खत्म हो जाने से खुश होते हैं वे देख लें कि एक धु्रवीय व्यवस्था के कितने खतरे होते हैं। हम भी इसे भुगत रहे हैं। हमारे देश में भी सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा बहुत अमेरिका परस्त रही है। सोवियत संघ की विरोधी।

मगर अभी जब पहलगाम में आतंकवादी हमला हुआ और हमारी सेना ने पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई की तो अमेरिका ने अचानक सीजफायर करवा दिया। और राष्ट्रपति ट्रंप ने साठ-सत्तर बार बोला कि मैंने युद्ध रुकवा दिया। वह यहीं तक नहीं रुके उन्होंने पाकिस्तान की प्रशंसा भी शुरु कर दी। वहां के आर्मी चीफ मुनीर जो पहलगाम आतंकवादी हमले के लिए जिम्मेदार थे उन्हें स्पेशल लंच पर बुलाया।

इस एक धु्रवीय व्यवस्था का भारत पहले हमेशा विरोध करता रहा। लेकिन 2014 में मोदी के आने के बाद वे माई डियर फ्रेंड ट्रंप में ऐसे लगे रहे कि ट्रंप द्वारा किए गए भारत के खिलाफ किसी काम पर एक शब्द भी नहीं बोले। सोवियत संघ जरूर टूट गया मगर रूस फिर भी हमारा दोस्त बना रहा।

वेनेजुएला में सारा मामला तेल का है। अमेरिका मीडिया के जरिए झूठी कहानियां फैला रहा है जैसे इराक के लिए भी फैलाईं थी उसने। मगर सारा खेल वहां के तेल पर कब्जे का है। दुनिया का सबसे ज्यादा तेल वेनेजुएला के पास है और पहले अमेरिका ही वहां तेल निकालने का काम करता था। मगर जब से वहां तेल का राष्ट्रीयकरण हुआ और अमेरिकी कंपनियों को बाहर निकलना पड़ा अमेरिका तब से मौके की तलाश में था। और अब जब वह वहां के राष्ट्रपति तक को उठा लाया तो सारी शर्म छोड़कर साफ कह रहा है कि अब वेनेजुएला का शासन वह चलाएगा। अमेरिकी तेल कंपनियां वहां जाएंगी।

24 घंटे में ही सारी कलई खुल गई। ड्रग व्रग की बातें खतम हो गईं। असलियत पर आ गए। वेनेजुएला में वामपंथी राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने तेल का राष्ट्रीयकरण करके इस दक्षिण अमेरिकी देश में गरीबी उन्मूलन की शुरुआत की थी। तेल का पैसा जो अमेरिका ले जाता था। और वहां के चंद लोग उसकी दलाली में पैसे वाले बन जाते थे शावेज ने वह चक्र तोड़कर तेल का फायदा आम जनता को पहुंचाना शुरू किया। और उसी के बाद से पूरा पश्चिमी प्रचार तंत्र वेनेजुएला की गलत तस्वीर पेश करने लगा। चंद पैसे वाले बने लोगों की कहनियां सुना-सुनाकर यह बताने लगा कि अमेरिका जब वेनेजुएला में था तो वहां बड़ी- बड़ी गाड़ियां थीं। लेकिन अब वह नहीं दिखतीं।

इसी तरह अब अमेरिका की खुलेआम वेनेजुएला पर हमला करने और वहां नई राष्ट्रपति ( कार्यवाहक) नियुक्त होने के बाद कहा जा रहा है कि मादुरो तानाशाह थे। हमारे यहां का मीडिया भी इस पर जोर दे रहा है और तमाम सोशल मीडिया के लोग भी। यह एक बहुत खतरनाक बात है। अगर कोई तानाशाह भी था तो अमेरिका को यह अधिकार कैसे मिल जाता है कि वह किसी सम्प्रभु देश में घुसकर वहां के राष्ट्रपति और उसकी पत्नी को उठाकर ले जाए? आश्चर्यजनक और दुखद है कि हमारे यहां लोग इस बात पर जोर दे रहे हैं कि राष्ट्रपति ऐसा था वैसा था। यह कहना अमेरिका की गुंडागर्दी को सही ठहराना, मान्यता देना जैसा हो रहा है।

मूल मुद्दा दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों पर कब्जा करने का है। अमेरिका ने इराक में क्या किया था। कितने झूठे आरोप लगाए थे राष्ट्रपति सद्दाम पर। जैसे यहां ड्रग के, तानाशाह होने के और पता नहीं क्या-क्या आरोप लगाए जा रहे हैं वैसे ही वहां रासायनिक हथियार के आरोप लगाए थे। आज तक साबित नहीं कर पाया अमेरिका। और साबित करना क्या कोई अब तो बात भी नहीं करता कि वह आरोप कितने गलत और झूठे थे।

अब एक और बात लास्ट भारत की। कभी भारत इन परिस्थितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। कहने को विश्वगुरू हम आज हैं। मगर वास्तव में वह नेहरू के समय थे। जब दुनिया दो धु्रवीय थी। अमेरिका और रूस के बीच शीत युद्ध की स्थिति थी। तब गुटनिरपेक्ष देशों की एक तीसरी ताकत बनकर नेहरु ने विश्व में शांति बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाई थी।

कोरियाई देशों के बीच 1950 में शुरु हुआ युद्ध विश्व युद्ध के मुहाने तक पहुंच गया था। सोवियत संघ और चीन उत्तर कोरिया के साथ थे और अमेरिका दक्षिण कोरिया के साथ। उस समय नेहरू ने भारत के नवनिर्माण के साथ अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। संयुक्त राष्ट्र में भारत के शांति प्रस्ताव को मान्यता मिली। विश्व युद्ध टला। भारत को एनएनआरसी ( तटस्थ राष्ट्र प्रत्यावर्तन समिति) का अध्यक्ष चुना गया। शांति स्थापित हुई।

यह एक नहीं कई उदाहरण हैं। यह तो नेहरू के शुरुआती काल का है जब वे अन्तरराष्ट्रीय जगत में भारत के महत्व को स्थापित कर रहे थे। यहां ध्यान दें। नेहरू खुद को नहीं भारत के महत्व को स्थापित कर रहे थे। आज तो खुद को विश्व गुरु कहते हैं। और अमेरिका एवं अब तो उसके बाद चीन भी कहने लगा कि हमने सीज फायर करवाया। और हमारे विश्व गुरु एक बार भी यह नहीं कह सके कि झूठ। गलत।

लेकिन आज हमारी भूमिका क्या है क्या नहीं सबको मालूम है। मोदी देश को इस स्थिति तक ले आए। मगर कभी अन्तरराष्ट्रीय दुनिया में ऐसी कार्रवाईयां यह तो गुंडागर्दी है। दोस्ताना मदद हमने भी की थीं। नेपाल के राजा त्रिभुवन को जब लोकतंत्र के लिए गद्दी छोड़ना पड़ी तो नेहरू ही उनकी मदद करके उन्हें काठमांडु से निकालकर भारत लाए। यह भी 1951 नेहरू के उसी शुरुआती दौर का है। जिसे लेकर उल्टे नेहरू पर अब आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने नेपाल को भारत में नहीं मिला लिया। नेहरू की भूमिका कम करने के लिए ऐसे जाने कितने आरोप उन पर लगाए जाते हैं। इसी तरह इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णों को उनकी मर्जी से वहां की आजादी की लड़ाई के दौरान सुरक्षित निकाला।

कई उदाहरण हैं। भारत की बड़ी अन्तरराष्ट्रीय भूमिका के। अब कहानियां बड़ी हैं। भूमिका कुछ नहीं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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