गड्ढे में भारत, भारत में गड्ढा
युवराज मेहता की खबर आने के बाद अब कई अखबारों में दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग जगहों की खबरें और तस्वीरें आ रही हैं कि यहां भी गड्ढा है, वहां भी गड्ढा है।
— सर्वमित्रा सुरजन
युवराज मेहता की खबर आने के बाद अब कई अखबारों में दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग जगहों की खबरें और तस्वीरें आ रही हैं कि यहां भी गड्ढा है, वहां भी गड्ढा है। दो-चार दिनों में ये खबरें गायब हो जाएंगी और जहां गड्ढे हैं, वहां के पार्षद, विधायक, सांसद से कोई नहीं पूछने जाएगा कि आप इन्हें पटवाने के लिए क्या कर रहे हैं या जिन जगहों पर सड़कें होनी चाहिए थीं, वहां गड्ढे क्यों बने हैं।
अगर आप सोचते हैं कि संपन्न परिवार, अच्छी नौकरी, आलीशान रिहायशी इलाके में मकान, बढ़िया कार और उच्च वर्ण का होने से आप सुरक्षित हैं, आपके अधिकार सुरक्षित हैं, तो फिर यह खबर आपके लिए है। नोएडा में 16 जनवरी की रात इंजीनियर युवराज मेहता अपनी कार सहित सेक्टर-150 में कोहरे के बीच बेसमेंट के लिए खोदे गए गड्ढे में गिर गए और कुछ घंटों तक खुद को बचाने की कोशिश करने के बाद मौत के सामने हार गए। भाग्य में भरोसा रखने वाले लोग चाहें तो कह लें कि देखो मौत कैसे खींचकर ले गई, लेकिन असल में यह व्यवस्थागत हत्या है।
युवराज मेहता गुरुग्राम से ग्रेटर नोएडा अपने घर जा रहे थे तो घने कोहरे के कारण उनकी कार सड़क किनारे बनी दीवार को तोड़कर एक मॉल के निर्माणाधीन बेसमेंट में जा घुसी। हालांकि यह बेसमेंट नहीं, बल्कि 50 एकड़ में फैला और 45 फीट गहरा किसी 'मौत के तालाब' जैसा है। जिसे कई बार प्राधिकरण के अधिकारियों ने देखा होगा और अनदेखा करके चलते बने होंगे। जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाए, देश में ऐसे लाखों गड्ढे आम लोगों के लिए मौत का इंतजाम लिए बने रहते हैं। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या सरकार में बैठे अन्य खास लोग तो जब सड़क पर निकलते हैं तो सुरक्षा काफिला उनके साथ रहता है। उनकी राह को न केवल समतल बनाया जाता है बल्कि लुभावना दिखाने के लिए साज-सज्जा भी हो जाती है और ये सब जनता के पैसे से ही होता है। जनता भी बड़े चाव से अपने नेताओं को देखने के लिए सड़क किनारे लाइन लगाकर खड़ी हो जाती है। उसे लगता है कि ये वही लोग हैं, जिनके हाथों में हमारे वर्तमान और भविष्य की बागडोर है। हमने इन्हें अपना वोट देकर चुना है, ताकि संसद और विधानसभाओं में जाकर ये जनप्रतिनिधि हमारे हित के लिए कानून बनाएं। अब जनता खुद ही देख ले कि कैसे उसका हित हो रहा है।
सुनामी आती, भूकंप आता, बादल फटता, तब तो समझ आता कि किसी रिहायशी इलाके के बीचों-बीच एक जानलेवा तालाब बन गया। लेकिन नोएडा में तो बिल्डर की लापरवाही और प्राधिकरण की अनदेखी से ऐसा हुआ है। 2006 में हरियाणा में प्रिंस नाम का बच्चा 60 फीट गहरे बोरवेल में गिर गया था, जिसे 50 घंटों की मशक्कत के बाद किसी तरह बचाया गया था। इस काम में सेना ने अतुलनीय योगदान दिया था। तब चैनलों पर दिन-रात इस खबर को चलाया गया। जब बच्चा सही सलामत बाहर आया तो देश ने चैन की सांस ली। फिर बहुत से चैनलों में बच्चे को बुलाकर उससे बात की गई, कई फिल्मी हस्तियों ने उसे दुलारा। ऐसा लगा कि इस देश में सद्भाव और प्यार कितना कूट-कूट कर भरा है। हालांकि ये भ्रम जल्दी ही टूट गया। फिल्मी हस्तियों का हाल तो ऐसा है कि अब वे राजनीति में अभिनय कला के मुरीद हो चुके हैं और चैनलों का सच भी सामने आ गया कि उन्हें इस खबर में भी टीआरपी चाहिए थी। वर्ना गड्ढे में किसी के गिरने और मरने या बचने की खबर दिखाने की जगह पहले वे ये खबरें दिखाते कि देश में कहां-कहां कितने किस्म के गड्ढे बने हुए हैं।
युवराज मेहता की खबर आने के बाद अब कई अखबारों में दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग जगहों की खबरें और तस्वीरें आ रही हैं कि यहां भी गड्ढा है, वहां भी गड्ढा है। दो-चार दिनों में ये खबरें गायब हो जाएंगी और जहां गड्ढे हैं, वहां के पार्षद, विधायक, सांसद से कोई नहीं पूछने जाएगा कि आप इन्हें पटवाने के लिए क्या कर रहे हैं या जिन जगहों पर सड़कें होनी चाहिए थीं, वहां गड्ढे क्यों बने हैं। इसी तरह कमजोर पुल-पुलियों का हाल है, जिन पर लोग भगवान भरोसे चलते हैं। याद कीजिए कैसे गुजरात में 30 अक्टूबर 2022 को मच्छू नदी पर बना मोरबी पुल भरभरा कर टूट गया था, जिसमें कम से कम 140 लोगों की मौत हो गई थी। उससे पहले वाराणसी में 2018 में एक फ्लाईओवर के दो खंभे एकदम से गिर गए थे, जिनमें 18 लोगों की मौत हो गई थी। ऐसे हादसों की एक लंबी श्रृंखला है, जिसमें प्रशासनिक लापरवाही और निर्माण में हो रहे भ्रष्टाचार ने मासूमों की जान ले ली, उसके बाद भी दोषियों का बाल भी बांका नहीं हुआ। क्योंकि सरकार की दिलचस्पी लोगों की सुरक्षा से ज्यादा अपनी कुर्सी बचाने में है। दुख की बात तो ये है कि लोगों को भी न अपने हितों की परवाह है, न अपनी जान की। केंद्र में बैठी भाजपा सरकार हिंदू-मुस्लिम राजनीति के पाठ में ही लोगों को उलझाए रखे है। इस पाठ के अब कई अध्याय तैयार हो गए हैं। पहले केवल मंदिर बनाने का मुख्यपाठ था, अब लव जिहाद, वोट जिहाद, घुसपैठिए, सामूहिक नमाज पढ़ना, हिजाब आदि तरह-तरह के अध्याय भाजपा ने खोल दिए हैं, जिसमें हिंदुओं को झोंक दिया गया है। उन्हें मुस्लिमों, ईसाइयों से, उर्दू या अंग्रेजी बोलने और मांस खाने वालों से नफरत करने से फुर्सत मिले तो वे सोचें कि सरकार को उन्होंने काम करने के लिए सत्ता सौंपी थी या धर्म का खेल करने के लिए।
युवराज मेहता केवल गड्ढे में गिरने से नहीं मरे, उन्हें बचाने की कोशिश ही नहीं की गई, यह बात भी मोदी और योगी को महामानव समझने वाले लोग याद कर लें। रात 12 बजे के करीब उनकी कार पानी से भरे गड्ढे में गिरी, उन्होंने किसी तरह सवा बारह बजे अपने पिता को फोन लगाकर इसकी सूचना दी, युवराज के पिता ने 12 बजकर 25 मिनट पर 112 नंबर डायल कर इस आपात स्थिति की जानकारी दी, 12 बजकर 50 मिनट पर पुलिस और फायर ब्रिगेड पहुंचे, सवा बजे राज्य आपदा नियंत्रण की टीम पहुंची, फिर भी युवराज को बचाया नहीं जा सका और करीब पौने दो बजे तक वे पूरी तरह डूब गए। सोचिए कि ये कैसी आपदा और बचाव की टीमें हैं जो बीच शहर में केवल एक शख्स को नहीं डूबने से बचा नहीं सकी।
जबकि इस दौरान कार की छत पर खड़े होकर युवराज ने अपने मोबाइल की रोशनी जलाकर लगातार मदद की गुहार लगाई। मुनेंद्र नाम का एक डिलीवरी करने वाला शख्स इस घटना का चश्मदीद गवाह है, उन्होंने बताया कि बचाव टीम के जवान छोटी सी रस्सी लेकर बार-बार पानी में फेंक रहे थे, लेकिन युवराज को इससे कोई मदद नहीं मिल रही थी। इसके बाद मुनेंद्र ने पुलिसकर्मियों से कहा कि उन्हें तैरना आता है, उन्हें पानी में जाने दें, इसके बाद मुनेंद्र ने रस्सी ली और पानी में कूद गए। करीब आधे घंटे तक उन्होंने पानी में रहकर युवराज को ढूंढने की कोशिश की, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं लग पाया। एसडीआरएफ के गोताखोरों ने सीढ़ी लगाकर पानी में उतरने का प्रयास किया, लेकिन पानी ठंडा होने के चलते किसी ने आगे जाने की हिम्मत नहीं जुटाई। अब मुनेंद्र ने एक और गंभीर बात कही है कि पुलिस उन पर मीडिया में बयान न देने को लेकर दबाव बना रही है और उन्हें डराया-धमकाया जा रहा है।
बता दें कि युवराज के पिता ने बिल्डर पर केस दर्ज कराया तो मंगलवार को पुलिस ने आरोपी बिल्डर अभय कुमार को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन क्या इस हादसे में सरकार को पहली जिम्मेदारी लेते हुए खुद ही मामला दर्ज नहीं करना चाहिए था। वैसे सरकार की नींद तो शायद तीन दिन बाद टूटी, क्योंकि मुख्यमंत्री योगी ने तीन दिन बाद एसआईटी गठन का ऐलान किया। मंगलवार दोपहर जब एसआईटी जांच के लिए पहुंची, तब शाम करीब सात बजे एनडीआरएफ की टीम ने डूबी हुई कार को तलाश कर निकाल लिया। यानी घटना के 91 घंटे बाद ये कार निकाली गई। कार को पानी से निकाला गया तो उसका सनरूफ और फ्रंट का शीशा टूटा हुआ था। इसका मतलब है कि युवराज सनरूफ तोड़कर कार की छत पर चढ़े थे। यानी उन्होंने खुद को बचाने के लिए सारी संभव कोशिशें कीं। अगर वे बचते तो शायद अखबारों में उनकी दिलेरी, त्वरित बुद्धि की तारीफ होती कि कैसे उन्होंने खुद को बचा लिया। जबकि तब भी सवाल यही होना चाहिए था कि उनके गिरने या डूबने की नौबत ही क्यों आई।
जैसे किसी एडवेंचर (जोखिम भरी) गतिविधि में स्वेच्छा से हिस्सा लेने वालों से बाकायदा फार्म भरवाया जाता है कि अगर कोई हादसा हुआ तो इसके जिम्मेदार आयोजक नहीं होंगे, भागीदार ही अपनी सुरक्षा के लिए जिम्मेदार रहेंगे, क्या अब गड्ढों से भरे देश में रहने वाले तमाम नागरिकों को ऐसा ही शपथ पत्र सरकार भरवाएगी। मोदी चाहें तो एसआईआर में एक कॉलम और बढ़वा लें। जो नागरिक जोखिम उठाकर देश में रहने और वोट डालकर उन्हें चुनने के लिए सहमत हैं, वही मताधिकार से संपन्न रहेंगे। बाकी जिन लोगों का वोट ही नहीं है, उनकी मर्जी या विरोध वैसे भी मायने नहीं रखता।