बुद्ध पूर्णिमा और मजदूर दिवस
चार दिन पहले मजदूर दिवस था और चांद की चाल के चलते बुद्ध पूर्णिमा भी।;
संदीप सिंह
आज यह बहुत जरूरी हो चला है कि एक नया आर्थिक सामाजिक प्रस्ताव लेकर आया जाये। जहां न्यूनतम आय हो, हर गरीब परिवार को सीधी और ठोस आर्थिक मदद हो, सेहत की गारंटी हो, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का कायापलट, अच्छी शिक्षा की गारंटी हो, भर्तियों के लिए कोचिंग और ट्यूशन के बोझ से मुक्ति मिले, छोटे कारोबारी, युवा कारोबारियों को बिना ब्याज लोन, अन्य मदद आदि मिले।
चार दिन पहले मजदूर दिवस था और चांद की चाल के चलते बुद्ध पूर्णिमा भी।
1 मई के दिन को संसार भर के श्रमिकों ने श्रम की गरिमा और श्रमिक अधिकारों को याद रखने और मजबूत करने के अवसर के रूप में तय किया। संसार के दुखों का कारण और निवारण का मार्ग ढूंढते-भटकते बुद्ध को पूर्णिमा के ही दिन ज्ञान प्राप्ति हुई थी। बुद्ध के संवेदनशील मन ने संसार के दुख को देखा असमानता, लोभ-लाभ, संचय, चोरी, अधिग्रहण, जन्म, मृत्यु, जरा को उन्होंने दुख के कारणों में गिना। सही आजीविका, सही दृष्टि, सही कर्म, सही वाणी, सहअस्तित्व आदि को उन्होंने अपने सिद्धांत में अनिवार्य बनाया।
यह बुद्ध की बात हुई। हज़ारों वर्ष बीत गए,समय के प्रवाह में करुणा और समानता बुद्ध के दर्शन की सबसे बड़ी पहचान बन गई। जहां भी लंबे कानों, बड़ी-बड़ी बंद आखों और स्थिरता की नदी में डूबा वह पाषाण चेहरा हमें दिखता, शांति का अनुभव होता है।
फिर आया पूंजीवाद। मुनाफे पर आधारित उत्पादन व्यवस्था। किसी भी उत्पादन में पूंजी और श्रम लगता है। वस्तु या सेवा के मूल्य में श्रम का मूल्य छुपा रहता है। धीरे-धीरे वस्तुएं, या 'प्रोडक्ट', सेवाएं, उनके ब्रांड और पूंजी प्रदाता कंपनियां प्रमुखता और मुख्तारी हासिल करती जाती हैं; श्रम और श्रमिक अलक्षित हो जाते हैं। श्रम, पूंजी और मुनाफे के बीच एक तनाव हमेशा बना रहता है। पूंजीवाले की एक ही चाहत है उसे ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफा मिले। श्रम निचोड़ने में पूंजी मालिक मनमाना न हो जाए इसलिए तमाम संघर्षों के बाद संसार भर में बने श्रम कानून और तमाम कानूनी मर्यादाएं। भारत के संविधान में भी श्रम कानून और श्रमिक अधिकारों को तय किया गया। इंदिरा गांधी जी द्वारा बनाया गया-'ठेका मजदूरी (नियंत्रण और उन्मूलन) एक्ट, 1970 इसमें बहुत अहम था। 1991 में नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद से श्रम क़ानून निशाने पर आ गए। साल 1991 में- अमेरिका, विश्व बैंक और आईएमएफ के दबाव में भारत ने अपनी अर्थव्यवथा का ताला विदेशी पूंजी के लिए खोला। हर चीज की तरह इसका भी एक बैकग्राउंड था। उनकी शर्त थी भारत अपने कड़े श्रम क़ानून शिथिल करे। इसे 'लेबर रिफॉर्म' का सुंदर सा नाम दिया गया। प्रचार से फैलाया गया कि भारत तरक्की इसलिए नहीं कर रहा है कि यहां श्रम क़ानून बहुत सख्त हैं और भी कई प्रसंग थे।
खैर, कि़ले में सुरंग बनाई जा चुकी थी। दिवार गिरते देर न लगी। अंतत: कि़ला भी ढह गया। मलबे की भी बोली लगी। सोने-चांदी की चीज कौड़ियों के मोल बिकीं। धीरे-धीरे स्थिरता आई, बड़ी तकनीक और बड़ी पूंजी भी। मनरेगा जैसे कानूनों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कुछ धन डाला। मगर 2014 में आ गए नरेंद्र मोदीजी- जिनका राजनीतिक कैरियर ही पूंजीपतियों के सपोर्ट की देन था। ऊपर-ऊपर से आरएसएस और भाजपा की राजनीति धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में होती दिखती है, मगर उनकी आर्थिक नीति हमेशा पूंजीमालिकों के हितसाधन का माध्यम रही चली आई है और वही इनका मुख्य उद्देश्य भी है। संसद में, नीतिनिर्माण में, फैक्ट्री फ्लोर पर, कंपनी, खदान, निर्माण यूनिट या कारख़ाने में ये जिन श्रमिकों के हितों के ख़िलाफ़ काम करते हैं, उन्हीं श्रमिकों को धर्म, जाति, क्षेत्र आदि की अस्मिताओं में उलझाकर अपनी ओर खींचते हैं।
दिन भर की मेहनत से रौंदे मन और शरीर लेकर बस्ती/मुहल्ले पहुंचे श्रमिकों को गणेश पूजा, लक्ष्मी पूजा, विश्वकर्मा पूजा, छठ, झांकियों, गीत-संगीत आदि के ज़रिए अपनी ओर खींच लेना आसान था। जब व्यवस्था और संगठन से सहारा नहीं मिलता तो आखिरी चारा ईश्वर और आस्था का मजबूत स्तंभ होता है। घर-गांव-खेती-परिवेश से उजड़े और पलायित ये श्रमिक और कर्मी अपने मानसिक-सांस्कृतिक अलगाव और बिखराव को पाटने के लिए भी संस्कृति और धर्म का स्वभावत: सहारा लेते हैं।
सत्ता में आते ही मोदीजी ने दो काम शुरू किए। पहला- श्रम कानूनों को ख़त्म करना। दूसरा-कॉरपोरेट मोनोपॉली खड़ी करना। सरकार द्वारा पोषित चंद बड़े औद्योगिक घराने एक-एक करके छोटे खिलाड़ियों को निगल जा रहे हैं। धीरे-धीरे भारतीय कारोबार जगत और बाजार से प्रतिस्पर्धा खत्म की जा रही है। इसका सबसे बड़ा शिकार छोटे-मध्यम आकार के उद्योग-धंधे हुए हैं। चार नए लेबर कोड लाकर अब पुराने श्रम कानूनों से मिले अधिकारों को अंतिम श्रद्धांजलि दी जा चुकी है। ठेका प्रथा और आउटसोर्सिंग स्थायी सत्य हो गया। बेरोजगारी के पहाड़ तले पिस रहे देश के श्रमिकों के पास चुनने की आज़ादी नहीं है। जहां सेवाओं का उत्पादन हो रहा है वहां हाल विचित्र और लगभग रहस्यमयी है।
सूचना क्रांति और संचार की नई तकनीक- इंटरनेट- ने एक संकट पैदा किया है। अब मालिक और श्रमिक का कोई मिलन स्थल नहीं है। इंटरनेट आने के बाद मालिक मायावी हो गया। वह हमेशा मौजूद है और कभी उपस्थित नहीं है। जिन्हें गिग वर्कर्स कहा जाता है- ओला, उबर आदि टैक्सी वाले श्रमिक, ज़ोमैटो, स्विगी आदि डिलीवरी वाले श्रमिक, अर्बन कंपनी, आमेजन, फ्लिपकार्ट, नर्सिंग, होमकेयर, ब्यूटी और वेलनेस सेवाएं आदि वाले श्रमिक, अन्य डिजिटल सेवाओं के श्रमिक आदि अब किसके लिए काम करते हैं, किसके सामने मांग उठायें, किस पर दबाव बनायें- पता ही नहीं चलता। उनकी लड़ाई अब एक एल्गोरिदम से है, एक सॉफ्टवेर प्रोग्राम से है। ये एल्गोरिदम श्रमिक के शोषण का सबसे आधुनिक, सबसे तेज और सबसे सक्षम औजार बन गए हैं। ये श्रमिक को किसी फैक्ट्री फ्लोर पर एकत्रित नहीं करते, एक जगह नहीं बुलाते, समूह नहीं बनाने देते- ये श्रमिक को उसके ही घर में, उसकी ही मोटरसाइकिल पर, अपना और अपनी शर्तों का ग़ुलाम बना लेते हैं।
एक विचित्र स्थिति में संसार पहुंच चुका है। हम भारत के लोग दो दुनियाओं में एक साथ जी रहे हैं। एक ओर हम 5प्रतिशत हैं, दूसरी ओरनो सिंग्नल।' सरल भाषा में हमारा एक पैर गांव की व्यवस्था से जुड़ा है और दूसरा पैर शहर की व्यवस्था में। ग्रामीण व्यवस्था दरक रही है और शहरी व्यवस्था में पांव रखने की जगह नहीं मिल रही। आमदनी और बच्चों की अच्छी शिक्षा की चाहत अधिकतर लोगों को शहर लाती है जो उन्हें मिलती नहीं है।
फिर अचानक आता है कोई झटका। नोटबंदी हो जाती है- और भारत की मनुष्यता अपने सभी घाव लेकर सड़क पर पसर जाती है। कोविड महामारी के साथ अवैज्ञानिक सरकारी लॉकडाउन आता है और देश की जनता सड़कों पर कराह उठती है। कभी महाकुंभ या कोइ बड़ा पर्व आ जाता है जो फिर से व्यवस्था पर गर्म तेल सा सच उड़ेल देता है। न जाने किस शक्ति से देश चलता रहता है और एक अदृश्य हिंसा चौतरफा घटती रहती है। परेशान होकर मनु जोसेफ जैसे विद्वान लेखक अपनी किताब में पूछते हैं 'ग़रीब हमारा क़त्ल क्यों नहीं करते?'
एक दिन अमेरिका और इजरायल ईरान पर हमला कर देते हैं। ईरान हॉर्मुज़ की खाड़ी को बंद कर देता है और अरब देशों के तेल संयंत्रों को निशाना बनाकर दुनिया भर में नेचुरल गैस, कच्चे तेल, नाफ़्ता, हीलियम आदि की सप्लाई रोक देता है। भारत में सेठ और कालाबाज़ारिये इस आपदा को अवसर में बदलते हुए 900 रुपए के गैस सिलेंडर को 4000 रुपए तक पहुंचा देते हैं और एक बार फिर भारत का दबाया हुआ श्रमिक सच प्रकट होकर विकट हो जाता है।
गुस्से और नफ़रत, घुटन और फ्रस्ट्रेशन से भरे श्रमिक सड़कों पर निकल आते हैं। लंबे समय से उनके अंदर उबल रहा बवंडर - सिलेंडर की क्राइसिस के चलते- ट्रिगर प्वाइंट बन जाता है। यह उबाल हर जगह है। कहीं दिख रहा है कहीं नहीं। अमीरी-ग़रीबी के बीच की खाईं भारत में इतनी बड़ी हो गई है कि 50-60प्रतिशत भारत उसमें साफ़-साफ़ डूबता दिखाई दे रहा है।
आज सबसे बड़ी देशभक्ति आर्थिक असमानता की इस चट्टान को तोड़ने का प्रयास करना है। लाख धर्म और जाति की, छुआछूत की दीवारें हो, शोषण की लौहमशीन जब श्रमिक का खून पीने उतरती है तो उनमें थोड़ी एकता पैदा हो जाती है। एक सिलेंडर के चलते नए लेबर कोड, मुनाफे, मीडिया, पूरे सिस्टम, न्यू इंडिया का सच सामने आ गया। सिलेंडर संकट कैंसर से भी गंभीर बीमारी का लक्षण है। आज यह बीमारी बड़े ऑपरेशन की मांग कर रही है मगर भारत का राजनीतिक तंत्र दर्द निवारक बांटने का मुक़ाबला कर रहा है। क्या इससे बीमारी दूर होगी?
आज यह बहुत जरूरी हो चला है कि एक नया आर्थिक सामाजिक प्रस्ताव लेकर आया जाये। जहां न्यूनतम आय हो, हर गरीब परिवार को सीधी और ठोस आर्थिक मदद हो, सेहत की गारंटी हो, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का कायापलट, अच्छी शिक्षा की गारंटी हो, भर्तियों के लिए कोचिंग और ट्यूशन के बोझ से मुक्ति मिले, छोटे कारोबारी, युवा कारोबारियों को बिना ब्याज लोन, अन्य मदद आदि मिले, जाति जनगणना हो, आरक्षण का दायरा बढ़े, नौकरियों में महिलाओं की हर स्तर पर 40प्रतिशत भागीदारी हो। उसी निरंतरता में गांव की आमदनी बढ़ानी पड़ेगी।
तब कहीं जाकर इस दयार में जरा सा क़रार पैदा होगा।
जब कहीं जाकर हमारे बुद्ध जरा सा मुस्कुरायेंगे।
(लेखक जेएनयू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष रहे हैं और कांग्रेस से जुड़े हैं।)