फफक-फफक कर रोया बजट...!
'बजट' जिसे मैं अपनी भाषा में महत्वपूर्ण शासकीय दस्तावेज मानता हूं । वह इसलिए कि इसी के आधार पर वर्ष भर देश और देश की जनता के लिए उसी तरह कार्य किए जाते हैं
- डॉ.सूर्यकांत मिश्रा
'बजट' जिसे मैं अपनी भाषा में महत्वपूर्ण शासकीय दस्तावेज मानता हूं । वह इसलिए कि इसी के आधार पर वर्ष भर देश और देश की जनता के लिए उसी तरह कार्य किए जाते हैं , जिस तरह एक परिवार का मुखिया अपने परिवार के लिए करता है । भारतवर्ष की केंद्रीय सरकार प्रतिवर्ष फरवरी माह में देशवासियों के लिए सदन में अपना लेखा - जोखा प्रस्तुत करती है । इसी लेखे - जोखे को हम ' आम बजट ' के नाम से जानते हैं । वैसे तो देश की बहुत बड़ी आबादी बजट और बजट के मुद्दों से दूर रहती है या यह भी कह सकते हैं कि उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । हमारे देश के ही कुछ ऐसे लोगों को इस बजट का बेसब्री से इंतजार भी रहता है । इन लोगों में विशेष रूप से विपक्ष में बैठी राजनैतिक पार्टियां शामिल होती हैं । साथ ही ऐसे लोगों की भी कमी नहीं रहती जो इसी बजट के बहाने समाचार पत्रों में अपना मुखड़ा छपवाना चाहते हैं ! बजट के दिन हर चाय और नाश्ते की होटल / टपरी और सोशल मीडिया पर अचानक से जन्में नए - नए अर्थशास्त्री देश की अर्थव्यवस्था की दिशा और दशा तय करने में व्यस्त देखे जा सकते हैं ! बजट दस्तावेजों को पढ़े बिना ऐसे अर्थशास्त्री जी डी पी , महंगाई और जी एस टी पर इस तरह भाषणबाजी और बयानबाजी कर रहे होते हैं , मानो पूरा वित्त मंत्रालय इन्होंने ही स्थापित किया हो !
भारत के इस बार के बजट ने ऐसे ही अर्थशास्त्रियों के लिए और अधिक मुश्किलें पैदा कर दीं । वित्त मंत्री श्रीमती सीतारमण ने इस बार अच्छे - अच्छों की खोपड़ी से ऊपर जाने वाला केवल अर्थशास्त्रियों की समझ वाला बजट प्रस्तुत किया ! इस बार के बजट ने ' चाय पर अर्थशास्त्र ' को स्पष्ट कर दिखाया । बिना आंकड़ों और बिना समझ के सिर्फ अपनी जेबों के अनुभव पर जुगाली करने वाले देश की आर्थिक नीति पर बे -वजह की माथा पच्ची करते देखे गए । यह नजारा भी सामने आया जिसमें समाचार पत्रों में बजट पर चार लाइन लिखते या कहते हुए अपना मुखड़ा छपवाने वाले अर्थ तंत्र के ' अधजल गगरी छलकत जाए ...' कहावत को चरितार्थ करते हुए आम बजट को ' खास ' या ' बर्बादी ' बताकर विश्लेषण करते रहे ! मुझे तो ऐसा लगने लगा है जैसे आम बजट के आते ही छपास रोगी विशेष , राजनैतिक दलों में छोटे ओहदे से लेकर बड़े पदों पर आसीन लोग इस पर प्रतिक्रिया देना अपना मौलिक अधिकार समझने लगे हैं ! ऐसे लोगों में वे भी शामिल हैं जो दो जमा दो कुल चार कक्षाओं तक ही पढ़ें हैं या फिर अक्षर ज्ञान से उनका दूर- दूर तक नाता नहीं रहा है ! मै यही कह सकता हूं कि अनपढ़ भी बन रहे अर्थशास्त्री ! हमारे लिए अच्छा तो यह हुआ कि ऐसे लोग प्रोफेसर एडम स्मिथ और कौटिल्य के युगी में पैदा नहीं हुए ,अन्यथा हमें दूसरे रूप में अर्थशास्त्र ग्रन्थ मिला होता ! देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए बजट के आंकड़े और योजनाओं ने लैपटॉप के भीतर ही उनके विषाणुयुक्त विश्लेषण पर बिलखना शुरु कर दिया !
मदारीनुमा अर्थशास्त्री देश की जी डी पी को माइनस में पहुंचाकर बड़ी शान से विकास का ऊंचा ग्राफ खींचने मेंं माहिर दिखाई पड़ रहे हैं । महंगाई पर ' अनपढ़ ज्ञान ' के मेंढक रेपो रेट , रिवर्स रेपो रेट , मुद्रा स्फीति , मुद्रा संकुचन का नाम सुनते ही उल्टियां करने की स्थिति में टरटराने लगते हैं ! ऐसे लोग बड़ी शान के साथ महंगाई को मदारी के डमरू बजाने की तर्ज पर तर्क को टाल जाते हैं ! देश के हर गली - मोहल्ले और झोपड़पट्टी पर अर्थशास्त्री देश की अर्थव्यवस्था पर इस तरह तर्क - कुतर्क करते दिखाई पड़ते हैं मानो उसके अर्थतंत्र को वित्तमंत्री ने तहस - नहस कर दिया हो ! भले ही ऐसे अर्थशास्त्री ने कभी बैंक खाता न देखा हो या फिर बैंक की जमा पर्ची और राशि आहरण पर्ची को भी किसी अन्य से भरवाया हो ! यह कहा जा सकता है कि अज्ञान के सहारे ही आज के ' आर्थिक विशेषज्ञ ' बड़े गंभीर लेख लिख रहे हैं ! कारण यह कि ज्ञान के आधार पर तो सिर्फ डर पैदा होता है और अज्ञान से विश्वास ! जब बजट सदन में पेश किया जाता है तब ऐसे विश्लेषण कर्ताओं का सुषुप्त जागरण होता है और एक कुशल अर्थशास्त्री इनके ज्ञान के आगे अपनी डिग्री को आग के हवाले कर डालता है ! एक कहावत बड़ी प्रसिद्ध है - ' बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना..' । बुरी आदत कोई भी हो - ब-आसानी नहीं जाती ! आदतन बैंड बाजा देखते और आवाज सुनते ही कंधे उचकने और पांव थिरकने लगते हैं । बस ! फिर क्या चार लाइन लिखा और फोटो के साथ पहुंच गए अखबार के दफ्तर !
जब से अर्थव्यवस्था ने अपना सब कुछ खोलकर रखना शुरू किया है तब से हवा भी थोड़ी बदल गई है ! अब बजट में आम आदमी की जिंदगी बदल डालने जैसा कुछ भी नहीं होता है ! वास्तव में देखा जाए तो बजट आने पर अब न तो आम आदमी उछल पड़ता है और न ही गुस्से में लाल - पीला होता है ! जो थोड़ी बहुत उत्तेजना होती भी है वह शाम की चाय के साथ खत्म हो जाती है ! यह वैसा ही दृश्य होता है जैसे - बजट भाषण खत्म , मजा हजम ! मंत्रालय को खुश करने वाले एक्सपर्ट्स कह रहे होते है - ' टू थम्स अप ' इसके विपरीत आम आदमी - मेरे लिए कुछ नया नहीं है!
बजट की सेहत बिगाड़ने वाले झोलाछाप अर्थशास्त्री जितनी छेड़छाड़ बजट के साथ कर सकते थे , उन्होंने कर ली । रिल्स भी खूब बनी - बनाई और वायरल की गई ! अलग - अलग तरह के अर्थशास्त्रियों की नासमझी भरी टिप्पणियों को सुन - सुनकर निर्मला सीतारमण जी का बजट ' फफक - फफक कर रोने लगा ।' मानो वह कह रहा हो अब अगली बार से या तो बजट ही न बनाना या फिर ऐसे लोगों के मुंह पर पहले से ही क्विक फिक्स का प्लास्टर चढ़ा देना !