हंसी की कीमत

बेटे के बारे में सोच सोच कर हम दोनों पति पत्नी बहुत परेशान थे। बारहवीं कक्षा के साथ साथ तनिष्क कोचिंग भी कर रहा था

By :  Deshbandhu
Update: 2026-02-08 05:08 GMT
  • अर्चना त्यागी

'तुम्हारी हंसी की कोई भी कीमत मुझे मज़ूर है, बेटा। जो तुमने छोड़ा है, गुस्सा, वो ज़हर से भी ज़्यादा खतरनाक था। जब तक शरीर में रहता तुम्हें जीने तो देता ही नहीं। इसलिए जो साल गया सो गया बस इस हंसी को रोके रखना। बस यही हमारी पूंजी है। '

बेटे के बारे में सोच सोच कर हम दोनों पति पत्नी बहुत परेशान थे। बारहवीं कक्षा के साथ साथ तनिष्क कोचिंग भी कर रहा था। बल्कि दसवीं कक्षा में अच्छा प्रतिशत आ जाने के कारण हमने उसे कोचिंग भेज दिया था। उसका दाखिला शहर के शहर के प्रतिष्ठित विद्यालय से हटाकर एक ऐसे विद्यालय में करवा दिया था जहां पर केवल परीक्षाएं देने ही जाना पड़ता था। उपस्थिति अनिवार्य नहीं थी।

ग्यारहवीं का साल तो जैसे तैसे निकल गया। तनिष्क परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया तो राहत मिली। ग्यारहवीं कक्षा के नंबरों से बारहवीं कक्षा के परिणाम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला था इसलिए किसी ने भी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया।

बारहवीं कक्षा में तनिष्क के दिमा$ग पर अत्यधिक दबाव आ गया। दिन भर यह सोच कर परेशान रहता कि अच्छा प्रतिशत नहीं आया तो अच्छा कॉलेज मिलने के अवसर से चूक सकता है। कोचिंग में भी जल्दी कोर्स पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय लेकर कक्षाएं लगाई जा रही थीं। इसी कारण से उसे बारहवीं कक्षा के कोर्स को पढ़ने के लिए समय ही नहीं मिल पाता था। कई बार तनाव उस पर इस तरह सवार हो जाता कि घर में किसी के भी ऊपर अपना गुस्सा निकाल देता। बहुत बार तो अपना सामान ही उठाकर फेंकने लगता। उसके कमरे की हालत भी ऐसी हो गई थी कि देखने का मन नहीं होता था। हर तर$फ किताबें बिखरी हुई पड़ी रहती। बिस्तर पर कपड़ों का ढेर लगा रहता। धुलने वाले कपड़े भी कभी बाथरूम तक नहीं ले जाता था। जूते कहीं और मौजे कहीं।

कमरा भी अस्त व्यस्त और वह भी त्रस्त। दिन भर मोबाइल में नजरें गड़ा कर बैठा रहता। पूछने पर एक ही जवाब कि मुश्किल प्रश्नों के जवाब देख रहा था। कोई दूसरा प्रश्न पूछ लिया तो कई बार तो मोबाइल फोन भी फेंक दिया जाता था।

पूरे साल ऐसे ही परेशान और दिशाहीन घूमता रहा। परीक्षाओं के पास आने पर तो हालत यह कि घर में सबसे बात करना ही छोड़ दिया। खाना पीना भी नाम मात्र। डॉक्टर भी स्ट्रेस और एंजाइटी के सिवा तीसरा शब्द नहीं बोल रहा था। जैसे तैसे बारहवीं की परीक्षाएं हुई और फिर इंजीनियरिंग की प्रतियोगी परीक्षा। दो महीने के भीतर ही परिणाम भी घोषित हो गया। रिपोर्ट कार्ड लेने भी जि़द करके अकेले ही गया अपने स्कूल में। प्रतियोगी परीक्षा का परिणाम पहले ही आ चुका था। लेकिन घर में किसी को बताया नहीं था। उसकी हालत देखकर किसी ने पूछा भी नहीं।

स्कूल से घर आया तो बहुत खुश था। हम दोनों को लगा कि पार हो गया है। पर बात तो कुछ और ही थी। हम उसका इंतज़ार कर रहे थे कि वो क्या बताने वाला है। रात को खाने की मेज़ पर बैठा तो बहुत खुश। बात भी ख़ुद ही शुरू और हंसना भी ख़ुद ही शुरू।

'मम्मी, आपने पूछा नहीं कि क्या परिणाम रहा है....? '

मैंने भी हंसते हुए कहा।

'लग तो रहा है जैसे उम्मीद से अच्छा आया है....तुम इतने खुश जो लग रहे हो। '

तनिष्क ने ठहाका लगाया। उसके साथ साथ उसके पापा भी हंस पड़े।

'बात कुछ और है, मां। बारहवीं कक्षा भी पार नहीं हो पाई और इंजीनियरिंग की प्रतियोगी परीक्षा भी नहीं पास हुई। सब चला गया। सब छूट गया तो मैंने भी गुस्से को अलविदा कह दिया। बस अब यही हंसी और गुस्सा बिलकुल भी नहीं। '

पति मेरे जवाब का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। उन्हें देखकर मुझे अहसास हो गया कि वो पहले से सब जानते थे।

'तुम्हारी हंसी की कोई भी कीमत मुझे मज़ूर है, बेटा। जो तुमने छोड़ा है, गुस्सा, वो ज़हर से भी ज़्यादा खतरनाक था। जब तक शरीर में रहता तुम्हें जीने तो देता ही नहीं। इसलिए जो साल गया सो गया बस इस हंसी को रोके रखना। बस यही हमारी पूंजी है। '

शैतान तनिष्क खामोशी से सब सुन रहा था। हां उसकी नम आँखें बहुत कुछ कह रही थीं।

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