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अमेरिका-चीन की सहमति से तय हो सकता है अगला नाम : यूएन महासचिव

न्यूयॉर्क, संयुक्त राष्ट्र के अगले महासचिव कौन होंगे इसको लेकर चर्चा जोरों पर है। मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच वर्षीय कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को समाप्त होगा। नए महासचिव का कार्यकाल 1 जनवरी 2027 से शुरू होना है।

अमेरिका-चीन की सहमति से तय हो सकता है अगला नाम : यूएन महासचिव
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न्यूयॉर्क, संयुक्त राष्ट्र के अगले महासचिव कौन होंगे इसको लेकर चर्चा जोरों पर है। मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच वर्षीय कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को समाप्त होगा। नए महासचिव का कार्यकाल 1 जनवरी 2027 से शुरू होना है।

चुनाव की दौड़ अब ऐसे दौर में पहुंच गई है, जहां किसी एक उम्मीदवार पर सहमति बनाने में दुनिया की बड़ी शक्तियों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। तीन दौर के गुप्त स्ट्रॉ पोल के बावजूद मौजूदा सात उम्मीदवारों में से कोई भी स्पष्ट बढ़त बनाने में सफल नहीं हो पाया है और संयुक्त राष्ट्र के भीतर इस बात को लेकर चर्चा तेज हो गई है कि अंतिम फैसला अमेरिका और चीन समेत सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के बीच संभावित समझौते पर निर्भर कर सकता है।

द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा सात उम्मीदवारों के अलावा अंतिम समय में कुछ नए नामों को भी संभावित विकल्प के रूप में चर्चा में लाया जा रहा है। इसकी वजह यह है कि सुरक्षा परिषद के तीन अनौपचारिक मतदान दौर के बाद भी किसी उम्मीदवार को ऐसा समर्थन नहीं मिला है, जिसे स्पष्ट बढ़त माना जा सके। रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल करीब तीन उम्मीदवारों को ही आवश्यक समर्थन हासिल करने की वास्तविक दौड़ में माना जा रहा है।

महासचिव के चयन की प्रक्रिया में सुरक्षा परिषद की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में 15 सदस्य होते हैं, जिनमें पांच स्थायी सदस्य अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन शामिल हैं। किसी उम्मीदवार को महासचिव पद के लिए आगे बढ़ाने के लिए कम से कम नौ सदस्यों का समर्थन जरूरी होता है और पांच स्थायी सदस्यों में से किसी को भी वीटो का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसके बाद सुरक्षा परिषद जिस नाम की सिफारिश करती है, उसे संयुक्त राष्ट्र महासभा औपचारिक रूप से नियुक्त करती है।

इस प्रक्रिया में ‘स्ट्रॉ पोल’ औपचारिक चुनाव नहीं होते, बल्कि उम्मीदवारों के समर्थन का अंदाजा लगाने के लिए किए जाने वाले गोपनीय मतदान होते हैं। सुरक्षा परिषद के सदस्य किसी उम्मीदवार के सामने ‘एंकरेज’ (प्रोत्साहित), ‘डिस्करेज’ (हतोत्साहित) या कोई विकल्प नहीं चुन सकते हैं। इसके आधार पर यह समझने की कोशिश होती है कि कौन उम्मीदवार अंतिम दौर तक पहुंच सकता है।

इस बार की दौड़ में क्षेत्रीय संतुलन भी महत्वपूर्ण है। मौजूदा सात उम्मीदवारों में लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र से कई नाम हैं। इनमें कोस्टा रिका की पूर्व उपराष्ट्रपति और यूएनसीटीएडी की महासचिव रेबेका ग्रिन्सपैन, गुयाना की राजनयिक कैरोलिन रोड्रिग्स-बिर्केट, अर्जेंटीना के आईएईए प्रमुख राफेल ग्रॉसी, इक्वाडोर की पूर्व विदेश मंत्री और संयुक्त राष्ट्र महासभा की पूर्व अध्यक्ष मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा तथा इक्वाडोर की पूर्व राजदूत इवोन ए-बाकी शामिल हैं। इसके अलावा सेनेगल के पूर्व राष्ट्रपति मैकी साल भी उम्मीदवारों में शामिल हैं।

चिली की पूर्व राष्ट्रपति मिशेल बाचेलेट भी दौड़ में थीं, लेकिन 20 सितंबर को उन्होंने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। यह फैसला सुरक्षा परिषद के स्ट्रॉ पोल में उनके समर्थन में गिरावट के बाद आया। उनके हटने के बाद उम्मीदवारों की संख्या सात रह गई है।

शुरुआती दौर के स्ट्रॉ पोल में रेबेका ग्रिन्सपैन को समर्थन मिलने की खबरें सामने आई थीं। हालांकि बाद के दौर में तस्वीर अधिक जटिल हो गई और किसी उम्मीदवार ने स्थायी सदस्यों के बीच व्यापक स्वीकार्यता हासिल नहीं की। चूंकि ये मतदान गोपनीय होते हैं, इसलिए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं बताते।

अमेरिका और चीन की भूमिका इसलिए भी अहम है क्योंकि दोनों सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं और उनके पास वीटो अधिकार है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा वित्तीय और राजनीतिक चुनौतियों के बीच दोनों देशों की संस्था को लेकर अलग-अलग प्राथमिकताएं हैं।

संयुक्त राष्ट्र इस समय गंभीर वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है। अमेरिका ऐतिहासिक रूप से संगठन का सबसे बड़ा योगदानकर्ता रहा है, लेकिन मौजूदा अमेरिकी प्रशासन के तहत संयुक्त राष्ट्र को मिलने वाली फंडिंग में बड़ी कटौती हुई है। दूसरी ओर चीन से यह उम्मीद की जाती रही है कि वह संगठन के वित्तीय संकट में अधिक योगदान दे सकता है। हालांकि इस मोर्चे पर भी व्यापक समाधान सामने नहीं आया है।

अमेरिका संयुक्त राष्ट्र में प्रशासनिक सुधारों पर भी जोर दे रहा है। ‘यूएन80’ पहल के तहत संगठन की एजेंसियों के एकीकरण, मुख्यालय से जुड़े खर्चों में कमी और संसाधनों को जमीनी स्तर के कार्यक्रमों की ओर स्थानांतरित करने की मांग की जा रही है। ऐसे में अगले महासचिव को अमेरिका की इन प्राथमिकताओं और चीन समेत अन्य बड़ी शक्तियों की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाना होगा।

चीन ने इस बीच महासचिव पद के उम्मीदवारों के साथ बातचीत भी की है। चीनी विदेश मंत्रालय के अनुसार, विदेश मंत्री वांग यी ने जून में रेबेका ग्रिन्सपैन और मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा से अलग-अलग मुलाकात की थी। मंत्रालय ने बताया कि दोनों उम्मीदवारों ने बहुपक्षवाद और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को मजबूत करने की आवश्यकता पर अपने विचार रखे।

इस चुनाव का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संयुक्त राष्ट्र इस समय कई गंभीर वैश्विक संकटों से गुजर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियां, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सुरक्षा परिषद में बढ़ती महाशक्ति प्रतिस्पर्धा ने संगठन के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं।

इन परिस्थितियों में नए महासचिव के सामने केवल प्रशासनिक जिम्मेदारियां नहीं होंगी, बल्कि उन्हें ऐसे समय में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को बनाए रखना होगा जब सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक-दूसरे से असहमत हैं।


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