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सहमे-सहमे सरकार नजर आते हैं

नतीजों ने जरूर झटका दिया है लेकिन बदलाव तभी शुरू हो गया था जब नीतीश कुमार की पहल पर इंडिया गठबंधन की नींव पड़ी

सहमे-सहमे सरकार नजर आते हैं
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- अरविन्द मोहन

नतीजों ने जरूर झटका दिया है लेकिन बदलाव तभी शुरू हो गया था जब नीतीश कुमार की पहल पर इंडिया गठबंधन की नींव पड़ी। तब तक भाजपा जाने कितने गीदड़ और एक शेर वाला लाइन चला रही थी। इंडिया के समांतर एनडीए को जिंदा किया गया और नए सहयोगी बनाने के लिए जाने क्या कुछ नहीं किया गया। पुराने मामले खोलने और जेल भेजना भी इनमें शामिल था।

लंबे और थकाऊ चुनाव के बाद आए नतीजे हर बार की तरह कुछ नए हीरो लेकर आए हैं तो कई पुराने महारथियों की राजनैतिक विदाई का संदेश भी। ठीक इसी तरह मतदाताओं ने शासन और राजनीति के लिए भी कुछ एकदम नए संदेश दिए हैं तो कुछ पुराने ढर्रे पर अपने अपने ढंग से निर्णय भी सुनाया है और जाहिर तौर पर राजनेता दिन-रात जनता के बीच रहकर भी इन संदेशों को ठीक से नहीं समझते या इनकी उपेक्षा करते हैं तभी हर बार लगभग आधा सदन बदल जाता है। सरकार का स्वरूप बदल जाता है और कई बार तो सरकार बदल जाती है। संयोग है कि इस बार सरकार सीधे-सीधे नहीं बदली है, सरकार के मुखिया भी नहीं बदले हैं लेकिन जनादेश का सबसे ज्यादा प्रभाव उनके इकबाल पर ही दिखता है। सहमे-सहमे से सरकार नजर आते हैं और उनके कामकाज के आधार पर जनता ने उनको फेल भले न किया हो लेकिन उनको अपने रंग-ढंग बदलने का जनादेश तो दिया ही है। ऐसा संदेश या आदेश सिर्फ उनके लिए ही नहीं है। पक्ष-विपक्ष के लगभग सभी नेताओं के लिए है, बहन मायावती, नवीन पटनायक, चौटाला परिवार और महबूबा मुफ्ती के लिए तो कुछ ज्यादा ही सख्त जनादेश आया है।

लेकिन जाहिर तौर पर सबसे ज्यादा प्रभावी और दूरगामी संदेश नरेंद्र मोदी और उनके जोड़ीदार अमित शाह के लिए है। उनकी उपलब्धियों को लेकर भी शंका जताई गई है लेकिन उनकी कार्यशैली पर ज्यादा सख्त निर्णय आया है। फैसले लेने की प्रक्रिया, मुसलमानों के प्रति उनका रवैया, मुद्दों का चुनाव, विपक्ष से ही नहीं अपने साथियों के साथ व्यवहार का तरीका और शासन चलाने की शैली पर बहुत साफ निर्णय आया है। सबको साथ, सबका विकास सिर्फ नारा भर नहीं होना चाहिए। यह संदेश नहीं आदेश है और एक ही दिन में प्रधानमंत्री और अमित शाह बदले-बदले लगे (उनके इशारों पर नाचने वाली मीडिया में बदलाव और ज्यादा और जल्दी दिखाई दिया)। सबकी 'फ़ाइल मेन्टेन' करना, फिर जरूरत के हिसाब से अपनी लोकतान्त्रिक सत्ता के साथ सरकारी एजेंसियों के दुरूपयोग से दबाव बनाना, मीडिया के सहारे और प्रचार पर सरकारी धन खर्च करके अपने पक्ष में हवा बनाने की कोशिश करना, विरोध का निरादर ही नहीं मतदाताओं को फुसलाए जाने की चीज मानना, लोगों का उपयोग करके रद्दी की टोकरी में डालना, मौका पड़ने पर किसी का भी पैर पकड़ लेना (किसानों का उदाहरण सबसे चर्चित है) और निरंतर एक नकली विमर्श चलाते रहना ही इस कार्यशैली की मुख्य बातें हैं। लेकिन आप कुछ लोगों को पूरे समय बुद्धू बना सकते है, सबको कुछ समय तक बुद्धू बना सकते हैं लेकिन सबको सदा के लिए बुद्धू नहीं बना सकते।

और बड़े हिसाब से देखें तो यह चुनाव प्रबंधन कौशल से जीतने के अति आत्मविश्वास या घमंड और आमजन की भावनाओं के स्वाभाविक अभिव्यक्ति के बीच का मुकाबला था। कई लोग इसे मोदी और शाह के घमंड के रूप में देखते हैं लेकिन यह बुनियादी तौर पर अपने साधन, संघ के मुफ़्त के कार्यकर्ताओं और प्रबंधन कौशल को सबसे ऊपर मानने की मानसिकता थी। और भले राहुल गांधी ने लाख अपमान सहकर भी लगातार खुद को सुधार या और मेहनत की (भाजपा उनके करीबियों को तोड़ती भी रही) तथा उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव ने चुनाव के समय मजबूती दिखाई। लेकिन सच कहें तो मोदी-शाह की जोड़ी की ताकत से असली लड़ाई आमजन ने लड़ी। सिर्फ लड़ी नहीं जीत भी हासिल की। ऐसे-ऐसे नए और अनाम उम्मीदवारों ने भाजपा के दिग्गजों और इस जोड़ी के दुलारे नेताओं (स्मृति ईरानी और टोनी से लेकर नृपेन्द्र मिश्र के सुपुत्र तक) को पटखनी दी कि हम आप सभी तालियां बजाने को मजबूर हुए। और इस जीत का नतीजा ही है कि भाजपा के इन दोनों नेताओं का व्यवहार और बाडी लैंग्वेज एकदम बदला है। कई बार यह सुखद लगता है, कई बार दया आती है।

नतीजों ने जरूर झटका दिया है लेकिन बदलाव तभी शुरू हो गया था जब नीतीश कुमार की पहल पर इंडिया गठबंधन की नींव पड़ी। तब तक भाजपा जाने कितने गीदड़ और एक शेर वाला लाइन चला रही थी। इंडिया के समांतर एनडीए को जिंदा किया गया और नए सहयोगी बनाने के लिए जाने क्या कुछ नहीं किया गया। पुराने मामले खोलने और जेल भेजना भी इनमें शामिल था। इन तरीकों से नीतीश कुमार को तोड़ना और चंद्रबाबू को जबरिया साथी बनाने में 'सफलता मिली (आज यही दोनों लाज बचाने वाले साबित हुए हैं) लेकिन अन्नाद्रमुक और उससे भी बढ़कर बीजद को साथ ला पाना संभव नहीं हुआ। कई तरह से सहयोग तो ओवैसी जैसों ने भी दिया।

लेकिन सीधा साझीदार न बनकर भी बसपा ने जिस तरह से मदद की वह खुद उसके लिए आत्मघाती साबित हुआ। अब बहनजी की दौलत बचने का भरोसा जितना है उससे ज्यादा पक्का यह लग रहा है कि बसपा का आधार ही बिखर जाए। इससे छिटके दलित मतदाताओं ने ही उत्तर प्रदेश में, भाजपा को सबसे बड़ा झटका दिया। वह संविधान ही मोदी का सबसे बड़ा बोझ साबित हुआ जिसे वे खिलौना समझ रहे थे। राहुल, प्रियंका, अखिलेश, उद्धव ठाकरे, तेजस्वी, स्टालिन, ममता, कल्पना सोरेन और शरद पंवार की राजनीति को कम नहीं आंकना चाहिए लेकिन यह कहने में हर्ज नहीं है कि यह साधन, सत्ता और मैनेजरों के सहारे चुनाव जीतने के अति आत्मविश्वास और जनता पर भरोसा करने की दो अलग-अलग शैलियों की राजनीति का मुकाबला था और भले मोदी जी तिबारा प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं लेकिन उनकी शैली हार गई है। ज्यादा से ज्यादा 240 सीटों तक ही पहुंच पाई। पहले विपक्ष और लोग सहमे थे अब सत्ता पाकर भी मोदीजी और शाह जी सहमे नजर आते हैं।

आगे इसी चीज पर गौर करना होगा कि कांग्रेस या स्टालिन या अखिलेश गठबंधन की राजनीति पर, जनता पर, देश की विविधता का आदर करने पर भरोसा करते हैं या इस बार की छोटी कामयाबी पर ऐंठकर नुकसान उठाते हैं। पर इनसे ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर आई है जिनको राजनीति के साथ सत्ता भी चलानी है। और हमारे मोदी जी को विचार विमर्श, सहयोगियों की राय लेना, उसका आदर करना, विरोध पर भी गौर करना और काम से काम उन लोगों की राय भी जानना आता ही नहीं जो उनके फैसलों से प्रभावित होते हैं। कश्मीर में यही हुआ, किसानों के साथ यही हुआ, धर्माचार्यों के साथ वही हुआ और मुसलमान तो हिन्दू वोट के लिए चारा ही बनाए गए थे। लोगों का आदर, देश की विविधता का आदर और सबको साथ लेकर चलना उन्हें आएगा या नहीं यह चिंता की बात है। पर यह रिकार्ड भी है कि लाख सख्त दिखने के बावजूद मौका पड़ने पर कोर्स कारेक्शन में वही सबसे तेज भी हैं।


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