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अमेरिका-भारत ट्रेड डील पर राहुल गांधी ने पूछे पांच सवाल, किसानों के हितों पर जताई गंभीर चिंता
राहुल गांधी ने कहा कि सरकार को साफ करना चाहिए कि क्या यह समझौता भारत के कृषि उद्योग पर किसी अन्य देश की दीर्घकालिक पकड़ मजबूत करने की दिशा में कदम तो नहीं है।

नई दिल्ली। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने अमेरिका के साथ हुए हालिया व्यापार समझौते को लेकर अपनी आपत्तियों को दोहराते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने पांच तीखे सवाल रखे हैं। उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया कि इस मुद्दे पर वह अपने रुख में किसी भी तरह की नरमी नहीं बरतेंगे। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इस ट्रेड डील के नाम पर देश के किसानों के साथ “विश्वासघात” होता दिखाई दे रहा है। उनका कहना है कि यह केवल वर्तमान की बात नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और भारत के कृषि भविष्य से भी जुड़ा सवाल है।
“क्या हम कृषि क्षेत्र पर बाहरी पकड़ की अनुमति दे रहे हैं?”
राहुल गांधी ने कहा कि सरकार को साफ करना चाहिए कि क्या यह समझौता भारत के कृषि उद्योग पर किसी अन्य देश की दीर्घकालिक पकड़ मजबूत करने की दिशा में कदम तो नहीं है। उन्होंने कहा, “किसानों को यह जानने का अधिकार है कि जिन नीतियों पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं, उनका उनके भविष्य पर क्या असर पड़ेगा। यह सिर्फ आज का मसला नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की दिशा तय करने वाला मुद्दा है।”
डीडीजी आयात पर पहला सवाल
कांग्रेस नेता का पहला सवाल डीडीजी (ड्राई डिस्टिलर्स ग्रेन्स) के आयात को लेकर है। उन्होंने पूछा कि डीडीजी आयात करने का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या इसका मतलब यह है कि भारतीय मवेशियों को आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) अमेरिकी मक्का से बने डिस्टिलर्स ग्रेन खिलाए जाएंगे? राहुल गांधी ने आशंका जताई कि यदि ऐसा होता है, तो भारत के डेयरी उत्पाद अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिकी कृषि उद्योग पर निर्भर हो सकते हैं। उनका तर्क है कि इससे घरेलू कृषि और पशुपालन क्षेत्र की आत्मनिर्भरता प्रभावित हो सकती है।
जीएम सोया तेल और किसानों की चिंता
दूसरा सवाल जीएम सोया तेल के संभावित आयात को लेकर है। राहुल गांधी ने पूछा कि यदि भारत जीएम सोया तेल के आयात की अनुमति देता है, तो मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और देशभर के सोया किसानों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? उन्होंने कहा कि सोया उत्पादकों को पहले से ही मूल्य अस्थिरता का सामना करना पड़ता है। ऐसे में विदेशी आयात के दबाव से कीमतों में गिरावट आ सकती है, जिससे किसानों की आय पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
‘अतिरिक्त उत्पादों’ की परिभाषा पर सवाल
तीसरे प्रश्न में राहुल गांधी ने सरकार द्वारा प्रयुक्त ‘अतिरिक्त उत्पादों’ शब्द की स्पष्टता मांगी है। उन्होंने पूछा कि इन अतिरिक्त उत्पादों में कौन-कौन सी वस्तुएं शामिल हैं? क्या यह भविष्य में दालों और अन्य फसलों को भी अमेरिकी आयात के लिए खोलने की दिशा में संकेत है? कांग्रेस का तर्क है कि यदि धीरे-धीरे अधिक कृषि उत्पाद आयात के दायरे में लाए गए, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव भारतीय किसानों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति पर पड़ सकता है।
‘नॉन-ट्रेड बैरियर्स’ हटाने का अर्थ क्या?
चौथे सवाल में राहुल गांधी ने ‘नॉन-ट्रेड बैरियर्स’ (गैर-व्यापार अवरोध) हटाने के अर्थ पर स्पष्टीकरण मांगा है। उन्होंने पूछा कि क्या भविष्य में भारत पर जीएम फसलों को लेकर अपने रुख में ढील देने, सरकारी खरीद प्रणाली को कमजोर करने या न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तथा बोनस घटाने का दबाव डाला जाएगा? कांग्रेस का कहना है कि यदि ऐसी शर्तें शामिल हैं, तो यह कृषि नीति की स्वायत्तता पर प्रभाव डाल सकती हैं।
“दरवाजा खुलने के बाद नियंत्रण कैसे होगा?”
राहुल गांधी का पांचवां सवाल दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर है। उन्होंने पूछा कि यदि एक बार आयात का दरवाजा खोल दिया गया, तो हर वर्ष उसे और अधिक खोलने के दबाव को कैसे रोका जाएगा? क्या इसके लिए कोई स्पष्ट रोकथाम तंत्र है, या फिर हर नए समझौते में धीरे-धीरे और अधिक फसलों को शामिल किया जाता रहेगा? उनका कहना है कि सरकार को इस पर ठोस और पारदर्शी नीति स्पष्ट करनी चाहिए।
किसानों के मुद्दे पर राजनीतिक टकराव
अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। जहां सरकार इसे आर्थिक अवसर और वैश्विक सहयोग के रूप में पेश कर रही है, वहीं विपक्ष इसे कृषि क्षेत्र के लिए संभावित जोखिम के रूप में देख रहा है। राहुल गांधी ने कहा कि यह बहस केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि किसानों के जीवन और देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ी है। उन्होंने मांग की कि सरकार संसद में इस समझौते के सभी पहलुओं पर विस्तृत चर्चा करे।
सरकार की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा
फिलहाल प्रधानमंत्री कार्यालय या संबंधित मंत्रालय की ओर से राहुल गांधी द्वारा उठाए गए सवालों पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में संसद और सार्वजनिक मंचों पर इस मुद्दे पर और अधिक बहस हो सकती है। स्पष्ट है कि अमेरिका-भारत ट्रेड डील को लेकर विपक्ष और सरकार के बीच मतभेद गहराते जा रहे हैं। अब देखना होगा कि सरकार इन सवालों का क्या जवाब देती है और यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।
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