मानसून सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक में हंगामा, टीएमसी के बागी सांसदों को बुलाने पर विपक्ष का वॉकआउट
विपक्ष के विरोध का मुख्य कारण टीएमसी से अलग हुए 20 सांसदों के समूह को बैठक में आमंत्रित किया जाना था। विपक्ष का कहना था कि इन सांसदों के नए राजनीतिक समूह को अभी तक लोकसभा अध्यक्ष की औपचारिक मान्यता नहीं मिली है, इसलिए उन्हें सर्वदलीय बैठक में बुलाना संसदीय परंपराओं के अनुरूप नहीं है।

नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से एक दिन पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक माहौल गर्म रहा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में संसद भवन एनेक्सी में हुई बैठक के दौरान कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), डीएमके, झारखंड मुक्ति मोर्चा, आम आदमी पार्टी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, वाम दलों और शिवसेना (यूबीटी) सहित कई विपक्षी दलों के नेताओं ने विरोध दर्ज कराया। बैठक शुरू होने के कुछ ही मिनट बाद विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों ने सांकेतिक वॉकआउट किया। हालांकि, कुछ समय बाद सभी नेता दोबारा बैठक में लौट आए और चर्चा में हिस्सा लिया। 3 घंटे चली मीटिंग की अध्यक्षता राजनाथ सिंह ने की।
बागी सांसदों को बुलाने पर विपक्ष की आपत्ति
विपक्ष के विरोध का मुख्य कारण टीएमसी से अलग हुए 20 सांसदों के समूह को बैठक में आमंत्रित किया जाना था। विपक्ष का कहना था कि इन सांसदों के नए राजनीतिक समूह को अभी तक लोकसभा अध्यक्ष की औपचारिक मान्यता नहीं मिली है, इसलिए उन्हें सर्वदलीय बैठक में बुलाना संसदीय परंपराओं के अनुरूप नहीं है। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा कि संसद के टेबल ऑफिस की सूची में अब भी तृणमूल कांग्रेस के सांसदों की संख्या 28 दर्ज है। ऐसे में जिन 20 सांसदों ने अलग होकर नया राजनीतिक मंच बनाया है, उनके विलय और स्थिति पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि इन सांसदों की अयोग्यता संबंधी याचिकाएं भी लंबित हैं, इसलिए उन्हें अलग दल के रूप में बैठक में शामिल करना उचित नहीं माना जा सकता।
महुआ मोइत्रा ने उठाए संवैधानिक सवाल
महुआ मोइत्रा ने कहा कि 91वें संविधान संशोधन के बाद किसी अलग संसदीय गुट के गठन को लेकर स्पष्ट प्रावधान हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब नए समूह को अभी तक आधिकारिक मान्यता नहीं मिली है, तब संसदीय कार्य मंत्रालय ने उन्हें किस आधार पर सर्वदलीय बैठक का निमंत्रण दिया। उन्होंने कहा कि इसी मुद्दे पर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके, जेएमएम, आम आदमी पार्टी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, वाम दलों और शिवसेना (यूबीटी) सहित पूरे विपक्ष ने सांकेतिक रूप से बैठक से बाहर निकलकर विरोध दर्ज कराया।
कांग्रेस और अन्य दलों ने भी जताई नाराजगी
कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने कहा कि पार्टी ने संविधान और संसदीय व्यवस्था के सम्मान में विरोध दर्ज कराया है। उनका कहना था कि जब तक संबंधित मामलों पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक किसी भी गुट को अलग राजनीतिक इकाई मान लेना उचित नहीं है। शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अरविंद सावंत ने भी इस कदम पर सवाल उठाते हुए कहा कि कानून में ऐसी मान्यता का आधार स्पष्ट होना चाहिए। उन्होंने कहा कि विपक्ष का विरोध इसी संवैधानिक प्रक्रिया को लेकर है। आम आदमी पार्टी के सांसद एन.डी. गुप्ता ने भी अपने दल से जुड़े एक समान विवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि जब संबंधित याचिकाएं लंबित हों, तब तक किसी समूह को अलग मान्यता देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।
सरकार ने सहयोग की अपील की
बैठक के दौरान संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने सभी राजनीतिक दलों से संसद के सुचारु संचालन में सहयोग करने की अपील की। उन्होंने कहा कि संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है और सभी दलों की जिम्मेदारी है कि सदन की कार्यवाही बिना व्यवधान के चले। रिजिजू ने कहा कि सरकार सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार है और विपक्ष के सुझावों का स्वागत करती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हंगामे से किसी भी पक्ष का लाभ नहीं होता। रिजिजू ने बैठक के बाद कहा कि, मीटिंग में अच्छी चर्चा हुई। सबने अपनी बात रखी। सदन बिना रुकावट चले, यह सभी की जिम्मेदारी है।
20 जुलाई से शुरू होगा मानसून सत्र
संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलेगा। इस दौरान कुल 19 बैठकें प्रस्तावित हैं। सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयक और नीतिगत प्रस्ताव सदन में पेश करने की तैयारी कर रही है, जबकि विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, विभिन्न जांच मामलों और अन्य राजनीतिक मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा है।
टीएमसी और शिवसेना में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम
हाल के दिनों में टीएमसी और शिवसेना दोनों में राजनीतिक बदलाव देखने को मिले हैं। टीएमसी के 20 सांसदों ने अलग राजनीतिक मंच बनाने का दावा किया है, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना छोड़कर छह सांसद एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हो चुके हैं। लोकसभा अध्यक्ष द्वारा कुछ मामलों में बैठने की व्यवस्था को लेकर निर्णय किए गए हैं, जबकि अन्य मामलों में संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाएं अभी जारी हैं।


