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ग्रेट निकोबार परियोजना की पर्यावरण मंजूरी और पारदर्शिता पर जयराम रमेश ने उठाए सवाल

कांग्रेस महासचिव और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने शुक्रवार को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) और निगरानी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

ग्रेट निकोबार परियोजना की पर्यावरण मंजूरी और पारदर्शिता पर जयराम रमेश ने उठाए सवाल
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नई दिल्‍ली: ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को लेकर कांग्रेस और केंद्र सरकार के बीच विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। कांग्रेस महासचिव और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने शुक्रवार को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) और निगरानी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि परियोजना के विभिन्न पहलुओं का आकलन पर्याप्त नहीं है और पर्यावरण मंत्रालय के निर्धारित मानकों से काफी कम है। यह पत्र पिछले कुछ वर्षों में दोनों नेताओं के बीच इस परियोजना को लेकर हुए पत्राचार की कड़ी में नया अध्याय माना जा रहा है।

'मंत्री का जवाब निराशाजनक और असंतोषजनक'

जयराम रमेश ने अपने पत्र में लिखा कि तीन जून 2026 को भेजे गए उनके पत्र के जवाब में 13 जून को पर्यावरण मंत्री की ओर से जो प्रतिक्रिया मिली, वह संतोषजनक नहीं थी। उन्होंने कहा कि ग्रेट निकोबार परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय अध्ययन और प्रभाव आकलन कई मामलों में अधूरे हैं और मंत्रालय द्वारा तय किए गए दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं हैं। रमेश के अनुसार, उन्होंने पहले भी कई पत्रों में इन मुद्दों को विस्तार से उठाया था, लेकिन अब तक उन्हें कोई ठोस और सार्थक जवाब नहीं मिला है।

अनुपालन रिपोर्ट सार्वजनिक न होने पर सवाल

कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि परियोजना को मिली पर्यावरण मंजूरी के तहत हर छह महीने में अनुपालन रिपोर्ट सार्वजनिक करना अनिवार्य है, लेकिन मार्च 2024 के बाद से ऐसी कोई रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि परियोजना निगरानी समिति की बैठकों का विवरण कई महीनों की देरी के बाद वेबसाइट पर अपलोड किया जा रहा है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं। उनका कहना है कि पर्यावरण मंजूरी के बाद जिन संरक्षण और शमन योजनाओं को 15 दिनों के भीतर सार्वजनिक किया जाना था, वे अब तक उपलब्ध नहीं कराई गई हैं।

कई वैज्ञानिक संस्थानों की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं

जयराम रमेश ने कहा कि भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), सलीम अली पक्षीविज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केंद्र (सैकॉन), भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई), भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (बीएसआई), राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (एनआईओ), भारतीय वन प्रबंधन संस्थान (आईआईएफएम) और अंडमान-निकोबार वन विभाग सहित कई संस्थानों को विभिन्न अध्ययन और शमन योजनाएं तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि इन संस्थानों की कई रिपोर्टें और संशोधित प्रस्ताव अब तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। इससे उनकी विश्वसनीयता और पर्याप्तता पर सवाल खड़े होते हैं।

'जल्दबाजी में दी गई पर्यावरण मंजूरी'

कांग्रेस नेता का कहना है कि उपलब्ध जानकारी के अनुसार परियोजना से संबंधित कम से कम 12 महत्वपूर्ण अध्ययन अभी भी अधूरे हैं या लंबित हैं। उनका दावा है कि इससे यह स्पष्ट होता है कि पर्यावरण मंजूरी जल्दबाजी में प्रदान की गई थी। उन्होंने विशेष रूप से प्रवाल भित्तियों (कोरल रीफ) के बड़े पैमाने पर स्थानांतरण की योजना को अव्यावहारिक बताते हुए कहा कि इस तरह के उपाय व्यवहारिक रूप से लगभग असंभव हैं और इनके सफल होने की संभावना बहुत कम है।

अपारदर्शिता पर भी उठाए सवाल

जयराम रमेश ने कहा कि जिन रिपोर्टों और अध्ययनों को सार्वजनिक करने की मांग की जा रही है, उनका राष्ट्रीय सुरक्षा या रणनीतिक हितों से कोई टकराव नहीं है। इसके बावजूद उन्हें सार्वजनिक न करना समझ से परे है। उन्होंने आरोप लगाया कि परियोजना से जुड़े दस्तावेजों को छिपाने के लिए असामान्य स्तर की गोपनीयता बरती जा रही है। उनके अनुसार, सरकार के जवाबों से पर्यावरणीय प्रभावों और पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान नहीं हुआ है।

कांग्रेस ने जताई पर्यावरणीय नुकसान की आशंका

कांग्रेस ने हाल ही में भी इस परियोजना को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की थी। पार्टी का कहना है कि गलाथिया खाड़ी में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट से क्षेत्र की संवेदनशील पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है और प्रवाल भित्तियों का बड़े पैमाने पर विनाश होने की आशंका है। जयराम रमेश ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को भी दो पत्र लिखकर आईएनएस बाज रनवे के विस्तार से जुड़े फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है।

राहुल गांधी ने भी साधा सरकार पर निशाना

कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी इस परियोजना को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठा चुके हैं। उनका आरोप है कि सरकार रक्षा और बंदरगाह विकास का तर्क देकर वास्तव में निजी हितों को बढ़ावा देना चाहती है। उन्होंने दावा किया कि यह परियोजना एक कारोबारी समूह को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से आगे बढ़ाई जा रही है, जिससे क्षेत्र की बहुमूल्य पारिस्थितिकी को नुकसान होगा। राहुल गांधी ने हाल ही में अंडमान-निकोबार की अपनी यात्रा पर आधारित एक वीडियो जारी कर लोगों से पर्यावरण संरक्षण के समर्थन में अभियान से जुड़ने की अपील भी की थी।

क्या है ग्रेट निकोबार परियोजना?

केंद्र सरकार की ग्रेट निकोबार परियोजना के तहत एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, नागरिक-सह-नौसेना हवाई अड्डा, नया टाउनशिप और बिजली संयंत्र विकसित करने की योजना है। सरकार इसे सामरिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण परियोजना मानती है, जबकि विपक्ष इसके पर्यावरणीय प्रभावों और पारिस्थितिक जोखिमों को लेकर लगातार सवाल उठा रहा है।


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