अरुणाचल प्रदेश में नॉर्वे मॉडल पर बनेगा पहला गतिज ऊर्जा संयंत्र
अरुणाचल प्रदेश ने परीक्षण के तौर पर एक गतिज ऊर्जा संयंत्र की स्थापना के लिए नार्वे के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. यह तकनीक आधारभूत ढांचे का खर्च के साथ ही जमीन और पर्यावरण भी बचाएगी

अरुणाचल प्रदेश ने परीक्षण के तौर पर एक गतिज ऊर्जा संयंत्र की स्थापना के लिए नार्वे के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. यह तकनीक आधारभूत ढांचे का खर्च के साथ ही जमीन और पर्यावरण भी बचाएगी.
अरुणाचल प्रदेश को देश में पनबिजली उत्पादन की राजधानी या पावरहाउस भी कहा जाता है. देश के पनबिजली उत्पादन की संभावित क्षमता करीब 58 हजार हजार मेगावाट होने का अनुमान है. इसमें से 40 फीसदी उत्पादन अकेले इसी राज्य में किया जा सकता है. हालांकि अब तक इसमें से करीब दो फीसदी का ही दोहन संभव हो सका है.
राज्य सरकार ने पनबिजली उत्पादन को बढ़ावा देकर के लिए सरकार ने विकास की गति बढ़ाने और राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए वर्ष 2025 से 2035 को 'पनबिजली का दशक' घोषित किया है. इसे ध्यान में रखते हुए कई नई परियोजनाओं को अनुमति दी जा रही है.
पनबिजली परियोजनाओं का विरोध
राज्य में ऐसी ज्यादातर पनबिजली परियोजनाओं के लिए बनने वाले विशाल बांधों के खिलाफ लंबे समय से आंदोलन होता रहा है. आंदोलनकारी संगठनों की दलील है कि खासकर बड़ी परियोजनाओं के कारण आदिवासियों की जमीन छिन जाएगी और बड़े पैमाने पर उनके विस्थापन का खतरा पैदा हो जाएगा. इसके साथ ही पर्यावरण पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा.
क्या चीन में बन रहे विशाल बांध को लेकर भारत को परेशान होना चाहिए?
सियांग नदी पर प्रस्तावित 11 हजार मेगावाट पनबिजली परियोजना के अलावा इटालीन परियोजना और दिबांग बहुउद्देशीय परियोजना के खिलाफ होने वाले आंदोलन तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहे हैं. स्थानीय लोग और संगठन इन परियोजनाओं का विरोध तो कर ही रहे हैं, पर्यावरणविदों ने भी इनके असर की समीक्षा किए बिना अंधाधुंध तरीके से इनको मिलने वाली मंजूरी पर सवाल उठाए हैं.
कैसी है नई तकनीक
राज्य में पनबिजली परियोजनाओं के लिए बड़े बांधों और आधारभूत ढांचे के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर होने वाले जमीन अधिग्रहण आंदोलन को ध्यान में रखते हुए पनबिजली क्षमता के दोहन के लिए भारत और नार्वे ने प्रदेश में परीक्षण के तौर पर काइनेटिक एनर्जी यानी गतिज ऊर्जा से चलने वाले एक डेमोंस्ट्रेशन संयंत्र की स्थापना के लिए सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं.
सेंटर फार अर्थ साइंसेज एंड हिमालयन स्टडीज, राज्य सरकार और नार्वे की टाइडल सेल एएस (Tidal Sail AS) के बीच हुए इस सहमति पत्र के मुताबिक राज्य में देश का पहला गति ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया जाएगा. इसकी क्षमता पांच सौ किलोवाट होगी.
इस तकनीक से बनने वाली परियोजना गतिज ऊर्जा का इस्तेमाल करते हुए सीधे नदी की धारा से ही बिजली पैदा करने में सक्षम है. गतिज ऊर्जा बहते हुए पानी की गति और मास यानी द्रव्यमान से पैदा होने वाली ऊर्जा को कहा जाता है. सहमति पत्र के मुताबिक, इसके लिए बड़े पैमाने पर आधारभूत ढांचे के निर्माण की जरूरत नहीं होगी. इससे पर्यावरण के अनुकूल और किफायती ऊर्जा मिल सकती है.
अरुणाचल प्रदेश में पनबिजली परियोजनाओं का विरोध क्यों
आखिर यह तकनीक कैसे काम करती है? सेंटर फार अर्थ साइंसेज के एक प्रवक्ता डीडब्ल्यू को बताते हैं, "गतिज ऊर्जा संयंत्र बहते पानी या हवा की गतिज ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं. यह ऊर्जा टरबाइन को घुमाती है. इससे पानी की गतिज ऊर्जा यांत्रिक ऊर्जा में बदलती है. उसके बाद उसे जेनरेटर के जरिए विद्युत ऊर्जा में बदल दिया जाता है."
'स्वच्छ ऊर्जा की ओर कदम बढ़ाता राज्य'
अरुणाचल प्रदेश की विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री दांसगलू पुल डीडब्ल्यू को बताती हैं, "नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय और इनोवेशन नॉर्वे के सहयोग से बनने वाली यह परियोजना एक ऐसी तकनीक से चलेगी जिसके लिए बड़े आधारभूत ढांचे की जरूरत नहीं होगी. इसके जरिए सीधे नदी की धाराओं से बिजली पैदा की जाएगी. यह पर्यावरण के अनुकूल तो होगा ही, इससे मिलने वाली ऊर्जा भी किफायती होगी."
वो इस समझौते को स्वच्छ ऊर्जा की ओर राज्य के बढ़ते कदम में 'मील का पत्थर' बताती हैं.
उनका कहना था, "राज्य में नदियों का विशाल नेटवर्क होने के कारण नवीकरणीय ऊर्जा पैदा करने की काफी संभावना है. इस तकनीक से प्राकृतिक संसाधनों का पर्यावरण के अनुकूल इस्तेमाल तो सुनिश्चित होगा ही, ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी.
सहमति पत्र पर हस्ताक्षर के मौके पर मौजूद भारत में नार्वे की राजदूत मे-एलिन स्टेनर ने कहा, "अरुणाचल की नदी प्रणालियां इसे नदी की गतिज ऊर्जा तकनीक का प्रदर्शन करने के लिए एक आदर्श स्थान बनाती हैं."
उनका कहना था कि यह मौजूदा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का पूरक बन सकता है. इसके साथ ही दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा.
इस मौके पर सेंटर फार अर्थ साइंसेज के निदेशक इंजीनियर ताना तागे का कहना था, "इस तकनीक के सफल इस्तेमाल से जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता में कमी के साथ ही कार्बन उत्सर्जन घट सकता है. साथ ही इसकी मदद से नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र को भी बचाया जा सकता है.
पर्यावरणविदों का क्या कहना है?
राज्य के पर्यावरणविदों का कहना है कि जब तक इस तकनीक के व्यावहारिक इस्तेमाल के नतीजे सामने नहीं आते तब तक इस पर कोई टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी.
एक पर्यावरणविद डी.के. अपांग डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सहमति पत्र के प्रावधान तो ठीक हैं. लेकिन इससे राज्य में पहले से शुरू हुई बड़ी पनबिजली परियोजनाओं के प्रतिकूल असर को कम करने में कोई मदद नहीं मिलेगी."
बड़े बांधों के खिलाफ बीते करीब एक दशक से आंदोलन करने वाले सियांग इंडीजीनस फार्मर्स फोरम (एसआईएफएफ) के प्रमुख जेजांग डीडब्ल्यू से कहते हैं, "राज्य को पहले ही पर्यावरण के लिहाज से काफी नुकसान हो चुका है. नई तकनीक के फायदे का बाद में पता चलेगा. लेकिन फिलहाल विशाल परियोजनाओं का निर्माण कार्य रोक कर वैकल्पिक उपाय तलाशने पर जोर दिया जाना चाहिए."
सूखा झेलती दुनिया में पनबिजली का भविष्य?
कोलकाता में जन्मी डॉ. अपराजिता दत्ता ने अरुणाचल में पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर लंबे समय तक काम किया है. वो डीडब्ल्यू से कहती हैं, "यह नई तकनीक कागज पर तो बेहतर नजर आती है. लेकिन इसके लागू होने के बाद ही इसके असर का आकलन किया जा सकता है. उससे पहले इस पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा."
महिला पर्यावरण कार्यकर्ता टी.के. गामलिन डीडब्ल्यू से कहती हैं, "अरुणाचल प्रदेश में पनबिजली उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं. लेकिन इस प्राकृतिक ऊर्जा के दोहन के लिए ऐसे उपाय लागू किए जाने चाहिए जिससे पर्यावरण और स्थानीय आदिवासियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचे. गतिज ऊर्जा संयंत्र के नतीजों के दावे और हकीकत में कितना अंतर है, यह तो परियोजना शुरू होने के कुछ साल बाद ही पता चल सकता है."


