UPI चार्ज पर सियासत, सरकार ने ₹2,000 तक के भुगतान पर स्थिति साफ की, राहुल गांधी बोले-अमेरिका के दबाव में सरकार का सरेंडर
केंद्र का तर्क है कि बड़े व्यापारी भुगतान से जुड़ी किसी संभावित शुल्क व्यवस्था का उद्देश्य आम उपयोगकर्ता पर सीधा बोझ डालना नहीं, बल्कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लंबे समय तक टिकाऊ बनाना हो सकता है।

नई दिल्ली: भारत में डिजिटल भुगतान की पहचान बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वह बड़े UPI लेनदेन पर शुल्क लगाने का रास्ता तैयार कर रही है। उनका दावा है कि भले ही शुल्क सीधे ग्राहकों से नहीं लिया जाए, लेकिन व्यापारी पर पड़ने वाला अतिरिक्त खर्च अंततः वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों के जरिए आम लोगों तक पहुंच सकता है। वहीं, केंद्र सरकार का कहना है कि आम UPI उपयोगकर्ता पर सीधे कोई शुल्क लगाने की योजना नहीं है।
वित्त मंत्रालय ने क्या स्पष्ट किया?
वित्त मंत्रालय की ओर से सोमवार को जारी अधिसूचना के बाद ₹2,000 तक के UPI भुगतान को लेकर स्थिति स्पष्ट की गई है। इसके तहत इस सीमा तक के भुगतान पर बैंक या पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई शुल्क नहीं लगा सकेंगे। RuPay डेबिट कार्ड से किए जाने वाले भुगतान को भी इस व्यवस्था में शामिल किया गया है। हालांकि, विवाद की मुख्य वजह ₹2,000 से अधिक के व्यापारी भुगतान हैं। टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) एक्ट, 2026 के संसद से पारित होने के बाद इस बात पर चर्चा शुरू हुई कि बड़े व्यापारी लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR की व्यवस्था लाई जा सकती है।
मोदी सरकार ने चुपचाप UPI पर फ़ीस लगाने का रास्ता खोल दिया है।
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) September 15, 2026
अब ₹2,000 से ऊपर के merchant UPI लेन-देन पर MDR लगाया जा सकता है। इन ट्रांजैक्शंस की संख्या भले ही सिर्फ़ 5% हो, लेकिन UPI के कुल transaction value का करीब 65% इन्हीं में है।
सरकार कहती है कि ग्राहक से कोई फ़ीस नहीं…
राहुल गांधी ने सरकार पर साधा निशाना
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सरकार की नीति पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ₹2,000 से अधिक के UPI लेनदेन संख्या में भले ही कम हों, लेकिन कुल लेनदेन मूल्य में उनका हिस्सा काफी बड़ा है। राहुल का तर्क है कि यदि व्यापारी से शुल्क लिया जाता है तो वह लागत कीमतों में शामिल कर सकता है और इसका असर उपभोक्ता पर पड़ सकता है। राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिकी पेमेंट कंपनियां लंबे समय से भारत की जीरो-MDR व्यवस्था का विरोध करती रही हैं और सरकार अब उनके दबाव में नीति बदलने की दिशा में आगे बढ़ रही है। हालांकि, केंद्र सरकार ने विदेशी दबाव से जुड़े इन आरोपों को गलत और भ्रामक बताया है।
खड़गे ने भी उठाया शुल्क का मुद्दा
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमला बोला। उन्होंने नोटबंदी के बाद डिजिटल और कैशलेस भुगतान को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा दिए गए तर्कों का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि जब UPI को डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनाया गया है तो अब शुल्क की चर्चा क्यों हो रही है। खड़गे ने उन रिपोर्टों का भी उल्लेख किया जिनमें ₹5,000 के लेनदेन पर ₹25 और ₹10,000 पर ₹50 तक शुल्क की संभावनाएं बताई गई थीं। हालांकि, ऐसी दरों को लेकर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
0.4 फीसदी शुल्क की चर्चा, लेकिन फैसला नहीं
बड़े व्यापारी भुगतान पर संभावित MDR को लेकर शुरुआती चर्चाओं में करीब 0.4 प्रतिशत शुल्क की दर का उल्लेख सामने आया है। उदाहरण के तौर पर यदि ₹10,000 के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लागू होता है तो यह रकम ₹40 होगी। हालांकि, यह केवल संभावित दर का उदाहरण है और इसे अंतिम शुल्क नहीं माना जा सकता। सबसे अहम बात यह है कि फिलहाल बड़े UPI व्यापारी भुगतान पर वास्तविक शुल्क कितना होगा या होगा भी या नहीं, इस पर अंतिम व्यवस्था सामने नहीं आई है।
UPI भुगतान के दो रूप समझना जरूरी
UPI के जरिए होने वाले लेनदेन को broadly दो हिस्सों में समझा जा सकता है। पहला व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P भुगतान है, जैसे किसी दोस्त या परिवार के सदस्य को पैसे भेजना। दूसरा व्यापारी भुगतान यानी P2M लेनदेन है, जिसमें ग्राहक किसी दुकान, कंपनी या कारोबारी को भुगतान करता है। शुल्क को लेकर चर्चा मुख्य रूप से इसी दूसरे वर्ग के बड़े लेनदेन से जुड़ी है। सरकार का कहना है कि आम ग्राहक से सीधे UPI शुल्क वसूलने की कोई योजना नहीं है और ₹2,000 तक के भुगतान निशुल्क रहेंगे।
सरकार का जोर डिजिटल पेमेंट सिस्टम की मजबूती पर
केंद्र का तर्क है कि बड़े व्यापारी भुगतान से जुड़ी किसी संभावित शुल्क व्यवस्था का उद्देश्य आम उपयोगकर्ता पर सीधा बोझ डालना नहीं, बल्कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लंबे समय तक टिकाऊ बनाना हो सकता है। दूसरी ओर, कांग्रेस का कहना है कि व्यापारी पर अतिरिक्त लागत पड़ने की स्थिति में उसका अप्रत्यक्ष असर ग्राहकों पर पड़ सकता है। इस तरह UPI शुल्क का मुद्दा फिलहाल आर्थिक नीति के साथ-साथ राजनीतिक बहस का भी केंद्र बन गया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बड़े व्यापारी लेनदेन के लिए सरकार और भुगतान तंत्र किस तरह की अंतिम शुल्क व्यवस्था तय करते हैं।


