पुलिस मुख्यालय में 4 साल बाद अमित शाह, मगर सवाल जस के तस
अमित शाह ने की पुलिस मुख्यालय में बड़ी बैठक

जोगेंद्र सोलंकी
नई दिल्ली, पूरे चार साल बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को खुद जय सिंह मार्ग स्थित पुलिस मुख्यालय आना पड़ा। आखिरी बार वे 30 अगस्त 2022 को यहाँ आए थे। शनिवार को विमर्श कक्ष में तीन घंटे तक चली बैठक में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पुलिस आयुक्त से लेकर हर जिले के पुलिस उपायुक्त तक मौजूद रहे।
बाहर कहा गया - राजधानी की सुरक्षा और 1 नवंबर को रामलीला मैदान में विपक्षी गठबंधन के प्रदर्शन की तैयारी। अंदर जो चर्चा हुई, वही दिल्ली पुलिस की नाकामी का कच्चा चिट्ठा है।
कागज पर शाबाशी, सड़क पर लाचारी
पुलिस कह रही है अपराध घटा। मगर उसी के आंकड़े उसी से सवाल पूछ रहे हैं।
बेटियों की सुरक्षा - सबसे बड़ा छलावा: पुलिस का दावा - दुष्कर्म 2,141 से घटकर 1,901 रह गया, छेड़छाड़ 2,345 से 1,708। पर राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो कहता है - दिल्ली आज भी देश की सबसे असुरक्षित राजधानी। महिलाओं के खिलाफ 13,366 मामले, मुंबई से दोगुने से ज्यादा। लूटपाट के 5,406 और वसूली के 212 मामलों में दो-तिहाई में भी सजा नहीं। यानी हर तीन में से एक पीड़ित आज भी थाने की चौखट पर न्याय के लिए भटक रहा है। गश्ती गाड़ी की बत्ती तो चमकती है, पर रात में सुनसान सड़क पर वही डर क्यों?
2,622 करोड़ का नशा - गली-गली कैसे पहुंचा?: पुलिस ने खुद माना - 1,643 किलो जहर जलाया, कीमत 2,622 करोड़। इसमें 517 किलो कोकीन, 529 किलो गांजा। सवाल जलाने का नहीं, पहुंचने का है। ये जहर स्कूल के गेट तक, झुग्गी की चौपाल तक पहुंचा कैसे? ये मुखबिरी की नाकामी नहीं तो क्या है?
विदेश में सरगना, दिल्ली में गोलियां: आज दिल्ली पर सबसे भारी साया लारेंस बिश्नोई गिरोह का है। सरगना साबरमती कारागार में, उसका भाई अनमोल और दायां हाथ काला जठेड़ी तिहाड़ में। फिर भी वसूली की कॉल कनाडा में बैठे गोल्डी बराड़ के यहां से आती है। अपराध शाखा खुद मानती है - गिरोह ने गांव-देहात के नाबालिगों के हाथ में पिस्तौल थमा दी, सर्राफा और भवन कारोबारियों को हवाला से लूटा। करणी सेना प्रमुख की हत्या से लेकर पंजाबी गायक के जिम पर गोलीबारी तक, तार एक ही जगह जुड़ते हैं। वसूली के 212 में से 63 फीसदी ही सुलझे, तो बाकी 37 फीसदी में व्यापारी किसके भरोसे जीए?
गृह मंत्रालय - डोर आपके हाथ, फिर ढील कैसी?
दिल्ली पुलिस सीधे गृह मंत्री के अधीन। कतई बर्दाश्त नहीं का नारा हर बैठक में। फिर 4 साल बाद मंत्री को खुद क्यों आना पड़ा? अगर सब ठीक होता तो तीन घंटे की ये बैठक क्यों? मनोबल बढ़ाने की बात कहकर पल्ला झाड़ना अब नहीं चलेगा।
पूर्व गृह सचिव पिल्लई की चेतावनी जो आज सच हुई
पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जी. के. पिल्लई ने तो बहुत पहले ही आगाह किया था। 2020 दंगों पर नागरिक न्याय मंच की रिपोर्ट में उन्होंने लिखा था - "पर्याप्त गुप्त सूचना के बावजूद दिल्ली पुलिस दंगों को रोकने में नाकाम रही, हिंसा को पलने-बढ़ने दिया।"
उन्होंने ये भी कहा था - "जब तक थाने की बुनियादी व्यवस्था नहीं सुधरेगी, शहर सुरक्षित नहीं होगा।" चार साल बाद वही थाने वाली लाचारी आज भी बैठक का मुख्य एजेंडा है।
दिल्ली सरकार - हाजिरी लगाई या हिस्सेदारी निभाई?
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पहली बार ऐसी बैठक में बैठीं। ये नया प्रयोग था। पर जनता का सवाल सीधा है - आप गईं तो क्या थाने में प्राथमिकी के लिए लगने वाले तीन-तीन घंटे पर सवाल पूछा? जब 27 हजार अर्धसैनिक बल उतारना पड़े तो ये किसकी नाकामी है?
आखिरी बात
वातानुकूलित कक्ष की फिसलन भरी प्रस्तुति से सड़क का सच नहीं बदलता। जब तक तिहाड़ की चारदीवारी से वसूली की धमकी आना बंद नहीं होगी, जब तक गली में बिकता नशा बंद नहीं होगा, तब तक ये बैठकें फाइलों में दर्ज होकर रह जाएंगी। दिल्ली को बैठक नहीं, जवाब चाहिए।


