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मानहानि केस: बॉम्बे हाईकोर्ट ने राहुल गांधी की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता और सांसद राहुल गांधी की उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उन्होंने उनके खिलाफ चल रही एक मानहानि की आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई थी

मानहानि केस: बॉम्बे हाईकोर्ट ने राहुल गांधी की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा
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राहुल गांधी की याचिका पर सुनवाई पूरी, जल्द आएगा हाईकोर्ट का आदेश

  • पीएम मोदी पर बयान को लेकर मानहानि मामला, राहुल गांधी ने मांगी राहत
  • 2019 से चल रहे केस में नया मोड़, बॉम्बे हाईकोर्ट ने आदेश सुरक्षित रखा
  • राजनीतिक बयान या व्यक्तिगत हमला? कोर्ट जल्द करेगा फैसला

मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता और सांसद राहुल गांधी की उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उन्होंने उनके खिलाफ चल रही एक मानहानि की आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई थी।

यह मामला वर्ष 2019 से चल रहा है। 28 अगस्त 2019 को मुंबई के गिरगांव स्थित मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट अदालत में भारतीय जनता पार्टी के सदस्य महेश हुकुमचंद श्रीश्रीमल ने राहुल गांधी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि सितंबर 2018 में राहुल गांधी ने एक सार्वजनिक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित रूप से आपत्तिजनक और मानहानिकारक बयान दिया था।

इन बयानों के बाद विभिन्न समाचार चैनलों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रधानमंत्री मोदी को लेकर कथित ट्रोलिंग और अपमानजनक टिप्पणियां हुईं, जिसके लिए राहुल गांधी को जिम्मेदार ठहराया गया।

शिकायत के आधार पर मजिस्ट्रेट अदालत ने राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि की कार्यवाही शुरू की थी। राहुल गांधी ने इस कार्यवाही को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया था कि इस मामले को खारिज कर दिया जाए, क्योंकि उनके बयान राजनीतिक संदर्भ में दिए गए थे और उनमें कोई व्यक्तिगत हमला नहीं था।

हाईकोर्ट में इस याचिका पर सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपनी दलीलें पेश कीं। आज सुनवाई के बाद न्यायालय ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। इसका मतलब है कि कोर्ट जल्द ही इस मामले में अपना अंतिम फैसला सुनाएगा।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक, राहुल गांधी के वकीलों का कहना है कि राजनीतिक नेताओं के बयानों को लेकर इस तरह की शिकायतें लोकतंत्र में आम हैं और इन्हें दबाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। वहीं शिकायतकर्ता पक्ष का तर्क है कि बयान सीमा से आगे निकल गए थे और इससे प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचा।


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