केरल विधानसभा में सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पेश करेंगे सीएम सतीशन
केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन विधानसभा में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने, मतदाता सूची से बाहर किए गए पात्र नागरिकों के मतदान का अधिकार बहाल करने और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति करने वाले पैनल में बदलाव की मांग वाला प्रस्ताव पेश करेंगे।

तिरुवनंतपुरम। केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन सोमवार को विधानसभा में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने, मतदाता सूची से बाहर किए गए पात्र नागरिकों के मतदान का अधिकार बहाल करने और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति करने वाले पैनल में बदलाव की मांग वाला प्रस्ताव पेश करेंगे।
रविवार को जारी विधानसभा बुलेटिन में नियम 118 के तहत इस प्रस्ताव को पेश करने के लिए सूचीबद्ध किया गया है। प्रस्ताव में निर्वाचन आयोग के कामकाज पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया गया है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं से इस संस्थान के प्रति जनता का भरोसा कमजोर हुआ है।
प्रस्ताव के मसौदे में कहा गया है कि स्पष्ट मानदंडों या पूर्व सूचना के बिना लाखों पात्र नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। इसमें वंचित समुदायों, अल्पसंख्यकों, प्रवासी श्रमिकों और युवा मतदाताओं को ऐसे समूहों के रूप में चिह्नित किया गया है, जिनके मतदान के अधिकार प्रक्रियागत खामियों और कथित हेरफेर के कारण प्रभावित हो सकते हैं।
मसौदे के अनुसार, पात्र नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर रखना लोकतांत्रिक सिद्धांतों का उल्लंघन है और वयस्क मताधिकार की संवैधानिक गारंटी के लिए खतरा है। प्रस्ताव में मतदाता सूची की त्रुटियों को दूर करने और सूची से बाहर रह गए प्रत्येक पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार बहाल करने की मांग की गई है।
इसमें मतदाता सूची तैयार करने और सत्यापन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सॉफ्टवेयर पर भी सवाल उठाए गए हैं। मसौदे में आरोप लगाया गया है कि इस प्रणाली ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों के वैधानिक अधिकारों को सीमित किया है।
प्रस्ताव में यह भी आरोप लगाया गया है कि फॉर्म-6 में नियमों के विपरीत संशोधन किए गए। इसमें मीडिया में आई उन खबरों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें दावा किया गया था कि निर्वाचन आयोग के अधिकांश सदस्यों ने इन उपायों पर असहमति जताई थी। मसौदे में कहा गया है कि निर्वाचन आयोग को सरकार के प्रभाव से स्वतंत्र होकर काम करना चाहिए और अपने कामकाज में पारदर्शिता बनाए रखनी चाहिए। इसमें तर्क दिया गया है कि मतदाता सूची में हेरफेर जनता के जनादेश को कमजोर करने के समान है।
प्रस्ताव में निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति की संरचना बदलने की मांग भी की गई है। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के प्रधान न्यायाधीश को शामिल करते हुए एक समिति गठित करने का सुझाव दिया गया है। मसौदे में कहा गया है कि बाद में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कानून में प्रधान न्यायाधीश को चयन समिति से बाहर करने और कार्यपालिका को बहुमत देने से निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता कमजोर हुई है।
इसके अलावा, प्रस्ताव में आरोपों का सामना कर रहे मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने के लिए कदम उठाने की मांग की गई है। इसमें कहा गया है कि संस्थागत विश्वसनीयता बहाल करने के लिए ऐसा करना जरूरी है। प्रस्ताव के अंत में निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार से तीनों मांगों पर कार्रवाई करने की अपील की गई है, ताकि लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की जा सके। हालांकि, विधानसभा बुलेटिन में प्रस्ताव को पेश करने के लिए सूचीबद्ध किया गया है। इसमें प्रस्ताव के पारित होने का कोई उल्लेख नहीं है।


