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पीएम मोदी के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती गांव अब हाशिए पर नहीं, बल्कि विकास के केंद्र में हैं: मनोज सिन्हा

जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कठुआ जिले के 'वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम' के तहत आने वाले सीमावर्ती गांव 'करोल कृष्णा' का दौरा किया।

पीएम मोदी के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती गांव अब हाशिए पर नहीं, बल्कि विकास के केंद्र में हैं: मनोज सिन्हा
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कठुआ। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने गुरुवार को कठुआ जिले के 'वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम' के तहत आने वाले सीमावर्ती गांव 'करोल कृष्णा' का दौरा किया।

मनोज सिन्हा ने स्थानीय परिवारों को कई सरकारी स्कीमों के फायदे और युवाओं को अपॉइंटमेंट लेटर दिए।

6 अहम गांवों के लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बॉर्डर के गांव भारत के आखिरी गांव नहीं हैं, बल्कि पहले गांव हैं, जो देश की पहचान और विकास की फ्रंटलाइन हैं।

उन्होंने कहा कि दशकों से बॉर्डर शब्द से दूरी का एहसास होता था और ये गांव शासन की प्राथमिकताओं से बहुत दूर थे, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बॉर्डर के गांवों को विकास की मुख्यधारा में लाया गया है। जब भारत के विकास की कहानी लिखी जाएगी तो उसका पहला चैप्टर करोल कृष्णा, रथुआ, गजनल, बोबिया, कडियाला और गुज्जर चक जैसे गांवों से शुरू होना चाहिए, जहां भारत की सीमा सांस लेती है और तिरंगा लहराता है।

2019 से हुई तरक्की पर रोशनी डालते हुए उन्होंने कहा कि कठुआ जिले के सभी 216 बॉर्डर गांव अब सड़क से जुड़ गए हैं और पूरी बिजली पहुंच गई है। टेलीकम्युनिकेशन और टेलीविजन की पहुंच, जो कभी सीमित थी, अब हर घर तक पहुंच गई है।

उन्होंने कहा कि ये आंकड़े सिर्फ नंबर और रिपोर्ट नहीं हैं, बल्कि ये आपकी जिंदगी में असली बदलाव दिखाते हैं।

उन्होंने डेटा शेयर करते हुए बताया कि गरीबी का स्तर कम हुआ है, शहरों की ओर पलायन आधा हो गया है, और गांवों की इनकम 30 प्रतिशत बढ़ गई है। रोजगार के मौके बढ़े हैं, और बेरोजगारी पहले के लेवल से लगभग आधी हो गई है। बॉर्डर पर रहने वाले परिवारों की सुरक्षा के लिए 2,000 से ज्यादा पर्सनल और कम्युनिटी बंकर बनाए गए हैं। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि पूरी आबादी गरीबी रेखा से ऊपर उठ जाए।

उन्होंने बॉर्डर की इकॉनमी को बदलने में नारी शक्ति की भूमिका की भी तारीफ की। नेशनल रूरल लाइवलीहुड मिशन के तहत 1,300 से ज्यादा सेल्फ-हेल्प ग्रुप बनाए गए हैं, जिससे 12,000 से ज्यादा परिवारों को फायदा हुआ है। महिलाएं सिलाई, कढ़ाई, क्राफ्ट और छोटे-मोटे कामों में लगी हुई हैं, जिससे घर और गांव की इकॉनमी दोनों मजबूत हो रही हैं।

उपराज्यपाल ने बॉर्डर के गांवों की युवा पीढ़ी से मेट्रो शहरों की तरह बड़े सपने देखने की भी अपील की। ​​सरकारी स्कूलों में अब बेहतर सुविधाएं, डिजिटल क्लासरूम, वोकेशनल ट्रेनिंग और पूरे एकेडमिक सेशन हैं। यह कोई छोटा बदलाव नहीं है बल्कि यह एक पीढ़ी का बदलाव है।

उन्होंने बॉर्डर के गांवों के विकास के लिए चार मुख्य संकल्प बताए। गांवों को सिर्फ सड़कों से ही नहीं, बल्कि बाजारों से जोड़कर आत्मनिर्भरता, बागवानी और डेयरी कोऑपरेटिव को बढ़ावा देना। खेती, टूरिज्म, डिफेंस-सपोर्ट सर्विस और क्राफ्ट में मौके बनाकर युवाओं को मजबूत बनाना। हेल्थकेयर और टेली-मेडिसिन कनेक्टिविटी को मजबूत करके हेल्थ सुविधाओं में सुधार, और चौथा संकल्प सिविल एडमिनिस्ट्रेशन और आर्म्ड फोर्स के बीच कोऑर्डिनेशन बढ़ाकर मजबूत सिक्योरिटी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना है। डेवलपमेंट और सिक्योरिटी अलग-अलग लक्ष्य नहीं हैं, बल्कि वे एक ही लक्ष्य के दो पिलर हैं। सिर्फ एक सुरक्षित गांव ही खुशहाल गांव बन सकता है, और सिर्फ खुशहाल गांव ही आत्मनिर्भर और विकसित भारत बना सकते हैं।


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