Top
Begin typing your search above and press return to search.

बंगाल और केरल में त्रिकोणात्मक मुकाबला होगा – दीपांकर भट्टाचार्य

सीपीआई एमएल महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य से आने वाले विधानसभा चुनावों से लेकर चुनाव आयोग की भूमिका आदि कई सवालों पर एडिटर इन चीफ राजीव रंजन श्रीवास्तव की बातचीत




दीपांकर भट्टाचार्य से बातचीत

राजनीति से जुड़े तमाम सवालों पर कई अहम नेताओं के साथ देशबंधु समूह के एडिटर इन चीफ राजीव रंजन श्रीवास्तव लगातार बात करते रहे हैं। देशबंधु समूह के चैनल डीबी लाइव पर राजीव रंजन श्रीवास्तव कभी पॉडकास्ट के ज़रिये तो कभी डीबी डॉयलॉग के मंच पर अक्सर कई शख्सियतों के साथ कुछ तात्कालिक तो कुछ अपने देश के लिए कुछ दीर्घकालिका विषयों पर तो चर्चा करते ही हैं, तमाम वैचारिक सवालों पर भी उनकी बातचीत काफी अहम होती है। इसी कड़ी में वामपंथ के एक बड़े नेता और भाकपा माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य से भी राजीव रंजन श्रीवास्तव ने कई किस्तों में बातचीत की, कई सवाल उठाए। पेश है दीपांकर भट्टाचार्य के साथ राजीव रंजन श्रीवास्तव की बातचीत के अहम हिस्से --

राजीव रंजन श्रीवास्तव – दीपांकर जी, कुछ ही महीनों में पश्चिम बंगाल में चुनाव होने हैं। हाल ही में बिहार चुनाव के नतीजे आए, एसआईआर को लेकर हो हल्ला हुआ, राहुल गांधी की अगुवाई में आपसबने मिलकर इतनी ज़ोरदार यात्रा निकाली। बंगाल में भी जो कुछ हो रहा है, सबके सामने है। ऐसे में बंगाल चुनाव को लेकर आपकी क्या राय बन रही है।

दीपांकर भट्टाचार्य - धन्यवाद राजीव जी। दरअसल हमसबने देखा कि बिहार में क्या हुआ। चुनाव आयोग की भूमिका पर तमाम सवाल उठे, एसआईआर अभी बंगाल, यूपी समेत पूरे देश में हो रहा है। ईडी की कार्रवाइयां सबके सामने है। हमें लगता है कि आम जनता लड़ेगी। बिहार का चुनाव परिणाम हम लोग जैसा उम्मीद कर रहे थे, नहीं आया। हम सोच रहे थे कि महाराष्ट्र के बाद बिहार में हम लोग इन्हें रोक पाएंगे , लेकिन बिहार में भी एक तरह से महाराष्ट्र जैसा ही हो गया। एक तरफ महाराष्ट्र में हो गया दूसरी तरफ बिहार में हो गया, इससे पूरे देश में लोग निराश हैं। मेरे ख्याल से इस बात को समझ भी रहे हैं, देख रहे हैं और ज्यादा संगठित होने की तैयारी में हैं इसलिए लड़ाई तो और आगे बढ़ेगी। बंगाल हो, असम हो, तमिलनाडु हो, केरल हो लोग बिल्कुल छोड़ेंगे नहीं। हमें लगता है कि लड़ाई होगी और ये ताकतें बाहर होंगी। आंदोलन से ही चुनाव को साफ सुथरा और जनपक्षधर बनाया जा सकता है। चुनाव कोई आराम से हो जाएगा, चुनाव में लोगों को वोट डालने दिया जाएगा, आपको जीतने दिया जाएगा, ऐसा नहीं है। सरकार ने साफ कर दिया कि हम चुनाव में पूरे देश पर कब्जा कर लेना चाहते हैं। तो एक तरफ कब्जा कर लेने की नीयत है। ठीक वैसे ही जैसे जल, जंगल जमीन पर कॉपोरेट का कब्जा हो रहा है वैसे ही चुनाव पर सत्ताधारी दल का कब्जा। तो हम जिस तरह से जल, जंगल, ज़मीन बचाने के लिए लड़ते हैं वैसे ही चुनाव और वोट को भी बचाने के लिए लड़ेंगे। हमें लगता है कि लड़ाई एकमात्र रास्ता है और निश्चित तौर पर लड़ते हुए ही जीत भी आएगी। हो सकता है दो, तीन लड़ाई हम हार जाएंगे, लेकिन हर लड़ाई निश्चित तौर पर नहीं हारेंगे, हिंदुस्तान नहीं हारेगा, तमाम प्रदेश की जनता निश्चित तौर पर नहीं हारेगी। लड़ते हुए ही हम लोग इस लोकतंत्र को कायम रखेंगे। ये लोग पूरी तरह से सत्ता हड़प लेना, कब्जा कर लेना, हिंदुस्तान को एक पार्टी वाला राज्य बना देना चाहते हैं। हर राज्य में एक ही पार्टी या गठबंधन की सरकार थोप देना चाहते हैं। ये जो तानाशाही का अभियान चल रहा है इसके खिलाफ लड़ते हुए ही लोकशाही का आंदोलन तेज़ करके ही इसे हम लोग रोकेंगे। बिहार में नहीं संभव हुआ। बिहार में आज नहीं संभव हुआ, कल होगा। बिहार में इस बार नहीं हुआ, तो बंगाल में होगा। किसी और राज्य में होगा। तो हमें तो लोगों पर पूरा भरोसा है। लोग आंदोलन का भरोसा अगर छोड़ देंगे तब तो इस देश में बस तानाशाही चलेगी। इसलिए लोगों पर भरोसा रखना होगा। आंदोलन पर भी भरोसा रखना होगा।

राजीव – लेकिन बिहार में ऐसा क्यों हुआ। बिहार में तो आपकी पार्टी ने बहुत मेहनत की थी और बहुत उम्मीदें थीं आपकी पार्टी से...

दीपांकर – बिलकुल। हमने कहा कि बिहार में अस्वाभाविक रिजल्ट आया। सब लोग समझ रहे थे कि जबरदस्त मुकाबला है कांटे का। जितने एग्जिट पोल आए थे, उसमें भी जरूर यह कहा गया था कि एनडीए का पलड़ा भारी है, लेकिन मुकाबला कांटे का है लेकिन जो नतीजे आए उसमें कोई मुकाबला दिखा ही नहीं, एकतरफा दिखा सबकुछ। हमने इसे अननेचुरल आउटकम बताया है। जो एसआईआर हुआ, इतने बड़े पैमाने पर करीब 70 लाख लोगों के नाम बिहार में काटे गए और बाद में करीब 25 लाख लोगों के नाम जोड़े गए, इतने बड़े पैमाने पर जहां फेरबदल हुआ उसका तो बिल्कुल एक इंपैक्ट होना था, वो इंपैक्ट दिख रहा है। दूसरे, जो हमने कहा कि एसआईआर से लोगों में एक जबरदस्त अफरातफरी, आतंक और असुरक्षा का माहौल था कि भाई हमारा वोट रहेगा या नहीं रहेगा, नागरिकता हमारी बचेगी या नहीं बचेगी, वोट के अधिकार हमें मिलेंगे, नहीं मिलेंगे। तो कोई भी जो बेहद असुरक्षित हो जाए, तो लोग पैनिक में आ गए। आप कह लीजिए कि लोगों में बड़े पैमाने पर इस पूरी प्रक्रिया को लेकर गुस्सा है। हमें लगता है कि एसआईआर ने स्ट्रैटजिकल इंपैक्ट डाला। एसआईआर ने एक साइकोलॉजिकल इंपैक्ट भी इस चुनाव में डाला। ये है एसआईआर की बात। दूसरे, बिहार में चुनाव जिस तरीके से हुआ, वो तो आजकल नॉर्मल हो गया है। चुनाव में शाम 5:00 बजे के बाद अचानक वोटिंग परसेंटेज कैसे बढ़ने लगते हैं इसके बारे में चुनाव आयोग की ओर से कहीं कोई व्याख्या नहीं आती। कोई सबूत नहीं मिल पाता। कोई वीडियो एविडेंस नहीं है। कोई सीसीटीवी का फुटेज नहीं है। कैसे अंतिम वक्त में मतदान का प्रतिशत इतना बढ़ जाता है। हम लोगों ने बहुत जगह देखा कि महिलाओं को मजबूर किया गया कि आप महिला मतदाताओं को बूथ तक ले आइए और वोट डलवाइए सरकार के पक्ष में। तो जीविका दीदी को सरकार के पक्ष में प्रचार करते हुए देखा गया। चुनाव के बीच में भी महिलाओं पर दबाव डालते हुए जगह जगह हम लोगों ने देखा है। कई जगह इसको लेकर प्रोटेस्ट भी हुआ। जितने बड़े पैमाने पर पैसे बांटे गए। ये तो अपने आपमें एक नई बात है। नया प्रयोग है। तीन हजार करोड़ लगभग तीन चार करोड़ लोगों के बीच में। और वो जो ₹10000 महिलाओं के खाते में डाले गए उसका भी असर बिल्कुल दिखा है। ये सारी बातें हैं जिसका सीधा असर नतीजों पर हुआ। ये अभी भी बिहार के लोगों को समझ में नहीं आ पा रही है।

राजीव - चूंकि अब पश्चिम बंगाल में एसआईआर चल रहा है, दूसरे राज्यों में भी एसआईआर हो रहा है जहां-जहां चुनाव होने हैं। ऐसे में जब आप इस बात को अच्छी तरह से जान रहे हैं कि बिहार में एसआईआर ने खेल खराब कर दिया है तो आगे के लिए कितने सचेत हैं आप?

दीपांकर - एसआईआर से भी लोग जूझ रहे हैं। आपने देखा होगा कि माले ही ने सबसे ज्यादा कंप्लेंट दर्ज कराई। जमीन पर लोग लड़े, और लड़कर ही कई लोगों के नाम कटने से बचाया। नाम तो कटने वाले थे डेढ़ दो करोड़ के। लेकिन कटे 70 लाख के। चुनाव आयोग को हर सवाल का जवाब देना चाहिए कि चुनाव में जहां भी लोगों के नाम कटे, नई मतदाता सूची बनी, ये कहीं से भी कोई साफ सुथरी सूची नहीं है। अगर बात ऐसी होती कि एसआईआर के बाद एक बढ़िया सूची बन गई तो बात समझ में आती। लेकिन एसआईआर के बाद भी तो तमाम विसंगतियां, तमाम गलतियां, तमाम गड़बड़ियां दिख ही रही हैं। एसआईआर के साथ ये जो पैसे बांटे गए इसका भी बड़ा असर है और ये तो चुनाव आयोग को बताना पड़ेगा कि अगर किसी भी सरकार को ये छूट रहेगी कि चुनाव से बिल्कुल 10 दिन पहले महिला रोजगार योजना लागू की जाए, और इस बहाने 10-10 हजार रुपए बांटे जाएं। आज तक हिंदुस्तान में कभी नहीं हुआ कि डेढ़ करोड़ महिलाओं के खाते में चुनाव में पैसे डाले गए हों। तो ये सारे प्रयोग बिहार में किए गए और उसका असर दिखाई पड़ा।

राजीव - लेकिन ये बताइए दीपांकर जी, इसकी शुरुआत, अगर थोड़ा पीछे जाएं तो मध्य प्रदेश से होती है - लाडली बहन योजना, उसके बाद आप देखिए महाराष्ट्र में लाडकी बहन... वहां पर भी अब बाद में उसका क्या हुआ वो तो पता नहीं और बिहार में भी बाद में क्या होगा, यह पता नहीं लेकिन चुनाव से पहले इतने पैसे दे देना, वोट बैंक को सुरक्षित रखना, अपने पक्ष में करना, यह अगर चल गया और इस पर चुनाव आयोग या सुप्रीम कोर्ट कोई रोक नहीं लगाता है तो फिर आगे कैसे करेंगे आप.... तब तो कोई भी चुनाव आप लोगों के लिए जीतना मुश्किल हो जाएगा।

दीपांकर - जहां कोई भी सरकार सत्ता में है, वो सत्ता का बिल्कुल दुरुपयोग करेगी। तो हमें लगता है कि चुनाव में, जो हम लोग कहते थे कि लेवल प्लेइंग फील्ड हो, बराबरी का चुनाव हो लेकिन अब बिल्कुल चुनाव बराबरी का नहीं रह गया। चुनाव में बड़े पैमाने पर सत्ता का दुरुपयोग और यह चुनाव आयोग के सौजन्य से हो रहा है, चुनाव आयोग की देखरेख में हो रहा है और बड़े पैमाने पर बिहार में इस तरह की वोटिंग देखने को मिली। हरियाणा से जो ट्रेनें चलाई गई, कम से कम चार ट्रेनों के बारे में जानकारी मिल गई। आप बाहर से वोटरों को ले आ रहे हैं बीजेपी के पक्ष में, एनडीए के पक्ष में, वोट डलवाने के लिए। ये सबकुछ इस बार खुल कर हुआ। खुला खेल फरुखाबादी हुआ बिहार के चुनाव में। और ये सब चुनाव आयोग की देखरेख में, उनके निर्देशन में हुआ है। एसआईआर को ले पूरे देश में अभियान चल रहा है। हर जगह लोग परेशान है। बंगाल, केरल सब जगह से बीएलओ में सुसाइड और मौत की खबरें आ रही हैं, लंबी लंबी छुट्टियां ले रहे हैं बीएलओ। इससे समझा जा सकता है कि उनपर कितना दबाव है। हमारे संविधान में 18 साल के ऊपर के लोगों को वोट डालने का अधिकार है। यह जो यूनिवर्सल अधिकार है उस यूनिवर्सल अधिकार के ऊपर हमला है और वोटर पर ही दबाव डाला जा रहा है कि आप साबित करो कि आप वोटर होने लायक हो। ये राज्य का काम है कि कोई वोटर ना छूटे। अभी लगता है कि वोटरों को छांटने पर ही पूरा जोर है। यह तो कांस्टिट्यूशन के और डेमोक्रेसी के स्पिरिट के खिलाफ है।

राजीव - लेकिन एक बात बताइए दीपांकर जी कि ये आपके सामने एक फ्रेम है। एक पिक्चर सामने है कि बिहार में क्या कुछ हुआ? एसआईआर से लेकर 10-10 हजार रुपए जीविका दीदियों को देना, जीविका दीदियों की ड्यूटी लगाना चुनाव में, ये तमाम चीजें आप लोगों ने देखे। लेवल प्लेइंग फील्ड की जो बात आप कर रहे हैं वो बिल्कुल आपके पक्ष में नहीं दिखाई दिखाई दे रहा। लेकिन आगे पांच राज्यों के चुनाव हैं और जो बिहार में प्रयोग किया गया इसी प्रयोग को वहां भी आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है ये भी आप देख रहे हैं आपका गठबंधन देख रहा है, ऐसे ही बंगाल में भी एसआईआर की जारही है तो क्या सिर्फ और सिर्फ विरोध कर, कुछ बयान देकर आप इस लड़ाई को जीत लेंगे.. यह बात मैं इसलिए मैं आपसे पूछ रहा हूं कि आपलोगों ने आंदोलनों से निकले हुए जमीनी कार्यकर्ता के रूप में काम किया, आपकी पार्टी ने काम किया है। गठबंधन में आपकी पार्टी की एक महती भूमिका रही है। क्या आप लोग किसी आंदोलन के लिए भी तैयार हैं आने वाले समय में? क्या इसके लिए लीड लेने के लिए दीपांकर भट्टाचार्य तैयार हैं?

दीपांकर – बिल्कुल। इसमें सिर्फ बयान देकर चुप बैठने की कोई बात ही नहीं है। ये बिल्कुल एक आंदोलन है क्योंकि ये वोट लोगों का बुनियादी अधिकार है। तो जितना लोगों के लिए रोटी कपड़ा मकान महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण एक लोकतंत्र में एक वोट डालने का अधिकार है जो लोगों के अस्तित्व से जुड़ा हुआ सवाल है। इसलिए हमें लगता है कि इस सवाल पर तो बिल्कुल लड़ाई होगी और जैसा हमने आपको कहा कि ऐसा नहीं है कि बिहार में लोगों ने लड़ाई नहीं लड़ी, हम लोग लड़े। बाद में ये परिणाम आया है। कुछ लोग कह रहे हैं कि लड़ाई छोड़ ही दीजिए, इस लड़ाई का कोई मतलब नहीं रह गया। छोड़ दीजिए। बाहर चले जाइए। तो हम बाहर जाने वाले लोग नहीं है। हमें लगता है। सरकार तो यही चाहती है कि लोग बाहर हो जाएं। हमें बाहर करने के लिए कोशिशें हो रही है। हमें लगता है कि लोग लड़ेंगे और ठीक है कि बिहार का चुनाव परिणाम उम्मीदों के मुताबिक नहीं आया लेकिन हम लोग उम्मीद कर रहे थे कि लोग देख रहे हैं सबकुछ और पहले से ज्यादा संगठित होंगे। तो इसलिए लड़ाई तो और आगे बढ़ेगी। बंगाल हो, असम हो, तमिलनाडु हो, केरल हो, सब जगह पूरी ताकत के साथ लड़ेंगे और इन्हें बाहर करेंगे। लोगों पर भरोसा रखना होगा। आंदोलन पर भी भरोसा रखना होगा।

राजीव - जी, आगे के चुनाव की रणनीतियां क्या हैं दीपांकर भट्टाचार्य जी.. क्योंकि बंगाल और केरल दो जगह और दोनों जगहों पर इंडिया गठबंधन का क्या रुख होगा, ये सवाल अभी बहुत उठेंगे। आप लोगों का क्या रुख होगा?

दीपांकर – देखिए, बंगाल में हमें लगता है कि हमारी जो कोशिश रहेगी कि वहां एक थर्ड फोर्स भी जरूरी है। बंगाल में लेफ्ट का एक रिवाइवल भी जरूरी है। तो हमें लगता है कि तृणमूल कांग्रेस सत्ता में है और वो अपने ढंग से बीजेपी के खिलाफ लड़ाई लड़ रही है। लेकिन इस सरकार को भी बहुत समय हो गया। 2011 से करीब 15 साल तक। तो आप वैसे ही समझ सकते हैं कि 15 साल से भी ज्यादा सरकार अगर है तो उसकी भी काफी एंटी इनकंबेंसी है। और बंगाल में तो खासतौर पर है। बहुत सारी घटनाएं हैं। भ्रष्टाचार हो, नौकरी को लेकर धांधली हो, बलात्कार की घटनाएं हों, लोकतंत्र पर बहुत सारे हमले हों। इसलिए हमें लगता है कि बंगाल में इंडिया गठबंधन, टीएमसी, कांग्रेस सब लोग मिलकर लड़ें ऐसा मुझे संभव नहीं दिखता। और मुझे लगता है कि शायद अच्छा भी नहीं होगा। तो बंगाल में हम कोशिश करेंगे कि संघर्ष त्रिकोणात्मक हो और यहां एक तीसरी ताकत खड़ी हो। फिलहाल तीसरा मोर्चा तो बहुत कमजोर है और इसीलिए वहां खतरा रहता है कि कहीं हालत उड़ीसा जैसी न हो जाए। अचानक एक दिन वो नवीन पटना की सरकार चली गई और बीजेपी आ गई। और वैसे ही बीजेपी वाले बिहार के बाहर थोड़ा ज्यादा उत्साहित हैं। और अंग बंग कलिंग की बात हो रही है कि कलिंग के बाद बंग की भी हमलोग चर्चा करते हैं। तो हमें लगता है बंगाल में तो ये हमारे सामने लक्ष्य आएगा कि भाजपा को जरूर रोकना है लेकिन यहां जो संघर्ष है वो त्रिकोणात्मक हो तो अच्छा रहेगा। और जहां तक केरल की बात है वहां भी वैसे ही है। वहां तो निश्चित तौर पर सत्ता में लेफ्ट फ्रंट है। कांग्रेस का लोकसभा में बेहतर प्रदर्शन रहा लेकिन विधानसभा में कांग्रेस विपक्ष में है तो वहां भी हमें लगता है कि ट्रायंगुलर फाइट होगी। लेकिन ट्रायंगुलर फाइट में भी बीजेपी और ज्यादा कमजोर हो। ये उम्मीद भी है और यही कोशिश हम लोग करेंगे। तो आने वाला चुनाव जो है बहुत दिलचस्प होने वाला है।

राजीव – बेशक आने वाले सभी चुनाव बहुत दिलचस्प होने जा रहे हैं। हमसे बात करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद दीपांकर जी। आपको और आपकी पार्टी को आने वाले चुनावों के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं। हम आपसे फिर विस्तार से बात करते रहेंगे।

दीपांकर – जी, बहुत धन्यवाद आपाका भी।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it