इस सरकार को राजनीतिक दंड जनता देगी - अभिषेक मनु सिंघवी
राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील, लेखक और कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी से देशबंधु समूह के एडिटर इन चीफ राजीव रंजन श्रीवास्तव की ताज़ा बातचीत
राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील, लेखक और कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी से देशबंधु समूह के एडिटर इन चीफ राजीव रंजन श्रीवास्तव की कुछ अदालती फैसलों, एसआईआर, चुनाव आयोग और मनरेगा समेत कई राजनीतिक मुद्दों पर ताज़ा बातचीत
राजीव रंजन श्रीवास्तव - सिंघवी साहब, स्वागत है इस कार्यक्रम में.... आज कार्यपालिका हो, न्यायपालिका, हो या विधायिका, तीनों पर एक तरह से नियंत्रित करने की कोशिश हो रही है ... संविधान दिवस की बातें तो हो रही हैं, लेकिन उसी संविधान का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है. आपलोगों ने संविधान बचाने की मुहिम छेड़ी और काफी हद तक उसमें सफल भी हुए, खासकर 2024 चुनाव में भाजपा को 240 सीटों पर रोक दिया आपलोगों ने... लेकिन बातचीत की शुरुआत करते हैं उमर खालिद और शरजील इमाम मामले से, पिछले दिनों दिल्ली दंगों के मामले से कम से कम एक गुलफिशा फातिमा को ज़मानत मिल गई है.. चूंकि आपने उसका केस लड़ा था तो इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे
अभिषेक मनु सिंघवी – जहां तक आपने पहले कहा और मुझे अच्छा लगा कि संविधान बचाओ मुहिम का असर हुआ और भाजपा को विपक्ष ने 240 पर रोक दिया। गुलफिशा वाले केस के बारे में यही कहना चाहूंगा कि केस जीतने के बाद वो घर आईं, इससे पहले मैंने उन्हें देखा तक नहीं था...एक छोटी सी लड़की है.. मुझे बड़ा अच्छा लगा कि वो अपनी पढ़ाई कर सकती है, अपना काम कर सकती है, ऊर्जावान हैं, मुझे खुशी है कि हम ये केस जीत गए लेकिन दुख इस बात का है कि बाकी जो कुछ केसेज थे, खासकर शरजील इमाम और उमर खालिद वाला, उसपर मेरी यही टिप्पणी है कि मैं सकारात्मक हूं। मैं ऐसा सिर्फ उसका खंडन करने के लिए नहीं कह रहा हूं। पहली बात तो यह कि अगर किसी भी मापदंड से जो कन्विक्शन के पहले का समय है कारावास का जिसमें आप सिर्फ संदिग्ध हैं आरोपित हैं। लेकिन आप एक्चुअली किसी रूप से कटघरे में नहीं खड़े हैं क्योंकि कोई निर्णय आया नहीं है। मैं सिर्फ इस केस की बात नहीं कर रहा हूं। एक मापदंड के रूप में 5 वर्ष बहुत ज्यादा होता है। 5 वर्ष में आपने वह जो सिद्धांत है जिसके अंतर्गत आप सिर्फ आरोपित हैं और आप कन्विक्टेड व्यक्ति नहीं है उसको आप अपने सर पर खड़ा कर देते हैं। अगर आप 5 वर्ष से ज्यादा बेल की मनाही करते हैं। ये पहली बात। बल्कि मैं समझता हूं तीन साल की एक आम कसौटी होनी चाहिए। इसके अपवाद हो सकते हैं। अब जैसे कसाव को देखा आपने कैमरा के ऊपर। वहां ऐसी चीज है जो राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधा एक जोड़ रखती है। कैमरा में देखा है आपने। वहां ऐसे कुछ बहुत ही कम अपवाद वाले क्षण हो सकते हैं जिसके अंतर्गत आप उनको 5 साल से ज्यादा रख सकते। लेकिन उसके अलावा 5 साल की जो समय सीमा है सिर्फ आरोपित की हैसियत से कभी भी तीन साल के बाद या चार साल के बाद उसको रिहा कर देना चाहिए बेल पर। नंबर दो, जो विशेष कानून हैं. उनमें जो प्रावधान हैं बेल के विरुद्ध, वो करीब करीब समान हैं। टाडा में, यूएपीए में भी समान हैं। बल्कि पीएमएलए और नारकोटिक्स एक्ट में भी समान हैं। इन सब में अब हमारे पास उच्चतम न्यायालय के निर्णय हैं। सिर्फ कोरा जो कानून है उसका अक्षर नहीं है। उसको किस प्रकार से देखा है उच्चतम न्यायालय ने वो भी हमारे लिखित रूप से व्यापक निर्णयों में प्राप्त है। उपलब्ध है। उन सब ने यह कहा है नजीब का उदाहरण दे रहा हूं। यूएपीए का केस है। पीएमएलए के जितने भी निर्णय हैं, अरविंद केजरीवाल या मनीष सिसोदिया के निर्णय हैं और भी जो भी निर्णय हैं, टाडा के भी, उनमें यह कहा गया है कि यद्यपि यह विशेष कानून है, बेल के विरुद्ध है लेकिन जहां ज्यादा विचित्र विशेष अतिशयोक्ति वाला विलंब है वहां पर यह मामला सीधा अनुच्छेद 21 से संबंध रखता है संविधान के। और संविधान का अनुच्छेद 21 इन विशेष कानूनों के ऊपर होता है। इसका मतलब है अति विलंब के केसेस में 21 के कारण यह कानून दब जाते हैं और विजय 21 की होनी पड़ती है और इस कारण से हम इस पर रिहाई का आदेश देते हैं। तो जब ये कानून था तो इसके आधार पर इन दोनों को रखना मैं समझता हूं कानूनी रूप से गलत है। तीसरा, इनमें से एक की विचित्रता ये थी कि वो पूरे इस वारदात में, पूरे समय सीमा में यानी दो तीन महीने की जो हुई है वारदात उस वक्त पूरे समय वो जेल में था। तो जेल में रहकर अगर आप गिरोह या कान्स्पेरेसी की भी बात करते तो वो कान्स्पेरेसी ऐसी नहीं हो सकती जिसमें आपने कुछ किया या कोई आपने बम छोड़ा या आप जाकर प्रदर्शन में खड़े हो गए या आपने किसी को चमाटा मारा या किसी को गोली दी। जेल की सलाखों के पीछे से आप कितनी प्लानिंग कर सकते हैं? तो यह मानी हुई बात है कि भाई आप जेल के पीछे से फिर भी 5 साल बाद भी आप नहीं छोड़ रहे हो। और आखरी बिंदु इसमें कि मुझे दुख इसका है कि उच्चतम न्यायालय के जो विभिन्न निर्णय है उनमें एक कंसिस्टेंसी का अभाव है जिसका मैं विरोध करता हूं। कहने को या सेमिनार में कहने में, वक्तव्यों में या कुछ निर्णयों में सिद्धांत के रूप से कहा जाता है कि बेल नॉट जेल। लेकिन यह सिर्फ कहावत रह जाए, सिर्फ एक वक्तव्य रह जाए। यह कार्यान्वित नहीं होता क्योंकि अलग-अलग विभिन्न बेंचेस द्वारा विभिन्न निर्णयों में वो कंसिस्टेंसी नहीं दिखाई जाती है। तो ये चार बिंदु पर मैं समझता हूं कि ये दुखद प्रसंग है।
राजीव - इसमें एक बात बताइए कि क्या जो आप आर्टिकल 21 का जिक्र कर रहे हैं तो क्या उसके हवाले से, आर्टिकल 21 के हवाले से, इस निर्णय को चुनौती दी जा सकती है कि एक साल तक आप अब बेल के लिए अप्लाई नहीं करेंगे, याचिका दायर नहीं कर सकते।
सिंघवी – नहीं, नहीं। आज अनुच्छेद 21 की ही बहस थी इस मामले में। इस निर्णय के बाद उस निर्णय को अब आप चुनौती नहीं दे सकते 21 पर। 21 की जो यह याचिका थी वह यह थी कि इसमें विशेष रूप का एंटी बेल प्रावधान जो है वह 21 से नीचे दब जाता है। 21 सर्वोपरि है, वह नीचे है। और 21 के अंतर्गत अगर 5 वर्ष का विलंब है सिर्फ एक ट्रायल शुरू होने में। अभी तो शुरू हुई अभी तो चार्जेस चल रहे हैं। अभी तो बहुत चलेगा और तो कितना भी कोई हो इस ये जो विशेष कानून है इसका इसको लागू करने का तरीका यह होगा कि आप विलंब के आधार पर उनको छोड़ देंगे। अब यह निर्णय आने के बाद इसकी कोई अपील नहीं होती 21 के ऊपर। इसके बाद तो अब रिव्यू हो सकता है या क्यूरेटिव हो सकता है। और जैसे जैसे आप रिव्यू में जाते हैं, क्यूरेटिव में जाते हैं तो आपकी सफलता की जो प्रोबेबिलिटी है, क्षमता है वो बहुत कम हो जाती है। तो मुझे लगता है कि एक वर्ष एक इनको और न्यूनतम बिताना पड़ेगा। उस एक वर्ष के बाद क्या होता है वो अलग कहानी है। लेकिन एक वर्ष बहुत लंबा समय होता है। जो व्यक्ति 5 वर्ष कारावास में बिता चुका है ऑलरेडी।
राजीव - लेकिन जिस केस में इन लोगों को जेल में रखा गया है, गिरफ्तार किया गया है उस केस की मैक्सिमम सजा कितनी है सिंघवी साहब।
सिंघवी – देखिए, अमूमन कई विशेष कानूनों में ये सात वर्ष होती है। लेकिन इसमें थ्योरेटिकल रूप से आजीवन कारावास हो सकता है थ्योरेटिकल। लेकिन थ्योरेटिकल मतलब है कि आप कन्विक्ट होंगे और उसमें आपको मैक्सिमम सेंटेंस दिया जाएगा। यह मापदंड नहीं होता बेल देने के लिए। बेल में देखा जाता है कि आज आप जब 5 वर्ष बिता चुके हैं, आरोपित की हैसियत है। कन्विक्ट नहीं हुए है। और जो तीन कसौटियां होती हैं, आप भगोड़े हैं। निश्चित रूप से ये नहीं हो सकता। आप निकलेंगे बाहर तो भाग कहां सकते हैं आप। नंबर दो, आप सहयोग के लिए हर हफ्ते दो बार बुलाए जा सकते हैं। अगर इतना ही डर है तो आप हर दिन बुलाए जा सकते हैं। नंबर तीन, पासपोर्ट का तो सवाल नहीं उठता कहीं जाने का। तो इन कसौटियों पर वह जो मैक्सिमम सेंटेंस आजीवन कारावास का हो सकता है यूएपीए में, वो बात सही नहीं होगी लागू करना।
राजीव - अगर ऑलरेडी 5 साल से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है जेल में... इसलिए मैं जानना चाह रहा था कि 7 साल की सजा है अमूमन, और 7 साल में से जबकि इस फैसले में यह भी लिखा गया है कि अभी तक जितने दिन ये हैं उसको शायद सजा में नहीं माना जाएगा। ऐसा भी लिखा गया है न शायद जहां तक मुझे लगता है।
सिंघवी - नहीं नहीं, अगर उनको जो भी मिलता है अब। अभी तो देखिए ट्रायल में बहुत दूरी है। ट्रायल में तीन साल तक खत्म नहीं होगी। लेकिन जब वह होती है अगर, उसके बाद आप कन्विक्ट होते हैं। यह दूसरा ‘इफ’ है। उसके बाद आपको सेंटेंस होता है। हम जानते नहीं है। निश्चित रूप से अगर 14 साल होता है, 10 साल होता है, 12 साल होता है तो जो 5 साल घटाए जाएंगे वो मुद्दा नहीं है। हां, घटाए जाएंगे वो तो करना ही पड़ेगा। लेकिन मुद्दा यह है कि पांच साल पर्याप्त है वो भी तब जब अगर आप यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि राजीव रंजन किसी रूप से ना भगोड़े बन सकते हैं, ना विदेश ट्रेवल कर सकते हैं। ना वो यह कह सकते हैं कि जब मुझे बुलाया जाएगा तो मैं सहयोग के लिए आऊंगा नहीं। तो इसमें एक संतुलन का खेल होता है। यह मैं मान रहा हूं अभी कि आप आरोपित हो। राष्ट्रीय सुरक्षा को आपको संतुलित करना होगा उसकी जो निजी स्वायत्तता है उससे। तो राष्ट्रीय सुरक्षा और निजी स्वायता और स्वतंत्रता को एक पलड़े में रखने से यही हो सकता है कि आप उनको कंट्रोल कंडीशन में रिहा करिए।
राजीव - सिंघवी साहब इसी से जुड़ा एक सवाल है कि अभी पिछले दिनों एक इंटरव्यू में पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ साहब से पूछा गया था इसी मसले पर तो उन्होंने कहा कि बेल इज रूल और जेल इज एक्सेप्शन...
सिंघवी - मैंने भी यही कहा ना आपको कि मुझे दुखद ये प्रसंग लगता है कि यह एक बड़ा इनकंसिस्टेंसी है वक्तव्यों में। जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल में जहां का यह वक्तव्य आप कोट कर रहे हैं या और भाषणों में या कई निर्णयों में सिद्धांतत: तो आपने कह दिया जो आपने भी सही कहा। उसको कार्यानवित करने में अलग-अलग बेंच अलग-अलग निर्णय अलग-अलग केसेस में बहुत ज्यादा इनकंसिस्टेंसी है। यह ना उच्चतम न्यायालय के लिए अच्छा है ना यह सिद्धांत के लिए अच्छा है और ना ये एक जो निजी स्वतंत्रता होती है या पर्सनल लिबर्टी उसके लिए अच्छा है।
राजीव -- जी जी बिल्कुल। आप सही कह रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच जस्टिस भुइयां का जो बयान अभी आया है पुणे में... उन्होंने बयान दिया है उसको कैसे देखा जाए। वो कह रहे हैं कि कोर्ट के अंदर कोर्ट की बात भी कह रहे हैं वो। दूसरी चीज कि जस्टिस अतुल श्रीधरण के ट्रांसफर को लेकर जिन्होंने सोफिया कुरैशी वाले मामले में स्वतः संज्ञान उन्होंने लिया था और विजय शाह पर जिन्होंने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। उसके बाद उनका ट्रांसफर होता है छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में और फिर कॉलेजियम में भी लिखा हुआ है कि सरकार की मंशा के अनुसार उनका ट्रांसफर अब इलाहाबाद हाईकोर्ट किया जा रहा है, इन्होंने कोट किया है।
सिंघवी – देखिए राजीव जी... पहली बात तो मैं पूरी तरह से समर्थन करूंगा कि यह बात कहनी आवश्यक थी, इस सिद्धांत को प्रादुर्भाव करना आवश्यक था और माननीय न्यायाधीश भून साहब ने यह स्पष्टीकरण किया इसके लिए मैं सैल्यूट करूंगा उन्हें। ये आवश्यक ही नहीं होता है लेकिन सब लोग कहते नहीं है। जो आवश्यक चीज है सच बोलना। वो लोग कह नहीं पाते हैं। और जब इन न्यायाधीश ने इतनी स्पष्ट रूप से कहा है तो मैं निश्चित रूप से सैल्यूट करूंगा उन्हें। नंबर दो इसके पीछे विडंबना देखिए आप। एक तो हुआ सोफिया कुरैशी का केस। आप दिन भर राष्ट्रवाद का लेक्चर देते हैं। आप नेशनलिज्म सिखाते हैं। राष्ट्रवाद से ऊपर कोई बड़ी चीज नहीं है। यह बताइए सोफिया कुरैशी से कोई बड़ी राष्ट्रवाद का उदाहरण हो सकता है? सिर्फ इसलिए कि आपकी पार्टी के एक व्यक्ति ने उनका अपमान किया, उनका मजाक उड़ाया। तो जो शुरुआत में आपने देर करवाई उसके प्रोसीक्यूशन में, जिस प्रकार से उसको हटाया नहीं, वो अपने आप में राजनीतिक रूप से बहुत ही दुर्भाग्य का विषय और भर्त्स्नायोग्य चीज है। तीसरा, जब वो कारवाई उच्चतम न्यायालय ने की और मैं शुरुआत के जो ऑर्डर है उच्चतम न्यायालय के, उसको भी मैं गलत मानता हूं कि उन्होंने पूरी तरह से वो कारवाई निचले अदालत में होने नहीं दी। जो उच्च न्यायालय ने सही किया उसमें हस्तक्षेप उच्चतम न्यायालय का सही नहीं था। यह पुरानी बात हो गई है। अब चौथा कि जिस व्यक्ति ने, उनका नाम शायद अतुल श्रीधरन है कुलकर्णी नहीं। तो श्रीधरन ने जो निर्णय लिया, देखिए, हर जज अपने हिसाब से निर्णय ले सकता है। आप गलत हो सकते हैं। इसमें कोई आपत्ति नहीं है। आप सही हो सकते हैं। आप निर्णय को पुनर्विचार नहीं कर सकते। सिर्फ उच्चतम न्यायालय का ये अधिकार क्षेत्र है। लेकिन आपने जो निर्णय लिया उसके बाद प्रस्ताव आता है आपका छत्तीसगढ़ जाने का, वही अपने आप में गलत है। आगे की बात छोड़िए जो आप कह रहे हैं। मैं तो कहता हूं कि यह कैसा हस्तक्षेप है कि आपका तुरंत स्थानांतरण का एक आदेश आता है, इसका मतलब क्या हुआ? इससे क्या संदेश दे रहे हैं आप? इतने लेक्चर आप देते हैं। इंडिपेंडेंस ऑफ जुडिशियरी, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, तीसरा स्तंभ। हमारे संविधान का अनुच्छेद 51 ये कहता है सेपरेशन इत्यादि। पांचवा बिंदु भी विचित्र है। आपने एक तरफ तो पूरा अधिकार क्षेत्र यानी मोनोपोली ले ली नियुक्तियों की। आप यानी न्यायपालिका। उसके बाद बिना अधिकार क्षेत्र के आप उसकी तरफ देखते हैं जिसका कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है और उनसे इंस्ट्रक्शंस लेते हैं और अंतिम, कि छत्तीसगढ़ क्योंकि छोटा हाईकोर्ट है, जिसका प्रभाव ज्यादा होता है तो वहां से आगे स्थानांतरण किया ये लिखकर। यह लिखित है कि मैं राजीव रंजन का स्थानांतरण कर रहा हूं, क्योंकि सरकार चाहती है। उसके बाद यह शायद आपको पता नहीं हो कि यह जो स्टेटमेंट आता है कोजियम का, इसमें यह पैराग्राफ है। एक दूसरा स्टेटमेंट आता है इसमें पैराग्राफ लिप्त हो जाता है कि हम सिर्फ ट्रांसफर कर रहे हैं छत्तीसगढ़ से इलाहाबाद, ये नहीं कहते हैं कि उसमें आदेश के अनुसार कर रहे हैं। तो ये सब जानते हुए ये हिम्मत की बात है, हौसले की बात है. समर्थन की बात है। मैंने जैसा कहा कि मैं सैल्यूट करूंगा कि एक जज ने कम से कम ये स्पष्टीकरण तो किया कि भाई ये क्या हो रहा है? या तो आप कोलेजियम का देखिए ना। यह नहीं कर सकते आप कि पूरा अधिकार क्षेत्र या मोनोपोली आपके पास है और सिलेलेक्टिवली जब आप चाहें तो आप वो मुझे दे दें और नहीं तो मेरे ऊपर धौंस जमाएं।
राजीव - जी बिल्कुल। और इसी से संबंधित संभल का भी मामला है। संभल में देखिए, अपने आप में यह अजूबा है क्योंकि एक जज जो फैसला देते हैं उसके बाद उनका ट्रांसफर होता है। फैसले में वह 22 पुलिसकर्मियों के ऊपर एफआईआर दर्ज करने का आदेश देते हैं। संभल की घटना के बाद की बात है। आप अच्छी तरह से जान रहे हैं जुडिशरी को। जरा इस पर भी आपकी टिप्पणी चाहूंगा।
सिंघवी - ये सैद्धांतिक रूप से एक व्यापक प्रश्न उठाता है। संभल का तो खैर बहुत ही चर्चित केस है और आपके समक्ष है उसके तथ्य लोगों को मालूम है। लेकिन इसका ज्यादा बड़ा सैद्धांतिक प्रारूप क्या है? यह जानना जरूरी है। देखिए जब तक यह तीन विंग्स में, बल्कि तीन नहीं दो ही विंग होती है क्योंकि कार्यपालिका विधायिका का एक सबसेट है। वो अलग नहीं है। अगर अलग स्वतंत्र निष्पक्ष और भारी चीज है तो वो न्यायपालिका है। ये हमारे अनुच्छेद 51 में लिखा हुआ भी है। लिखने की आवश्यकता नहीं है। ये इंडिपेंडेंस ऑफ जुडिशरी को आपने बेसिक स्ट्रक्चर यानी मूल ढांचे का अभिन्न अंग माना है। केशवानंद भारती के बाद हजारों सैकड़ों केसेस में। कई सरकारों ने, मिसेज़ इंदिरा गांधी की सरकार ने भी, ये प्रावधान संविधान संशोधन द्वारा किए। ये ध्यान से सुनें आप, संविधान संशोधन द्वारा। इन मामलों में न्यायिक पुनरीक्षण यानी जुडिशियल रिव्यू को हम प्रतिबंधित करते हैं। राजीव रंजन ने लाल टाई पहनी है या काली टाई पहनी है, इस पुनरीक्षण के मुद्दे को न्यायपालिका नहीं देख सकती। यह संविधान में लिखा गया। उस संवैधानिक प्रावधान को उच्चतम न्यायालय ने निरस्त किया, संविधान को। इस ग्राउंड पर कि न्यायपालिका की निष्पक्षता, निर्भीकता और अलग होना एक मूल ढांचे यानी बेसिक स्ट्रक्चर का अंग है। तो एक तरफ तो आप उन ऊंचाइयों पर कूद रहे हैं कि हमने ऐसे 40 सेकंड में या 44 वाले अमेंडमेंट का ये किया वो किया और एक तरफ जब आपने जज मेड कानून के अंतर्गत ये न्यायपालिका का कानून है। संविधान का नहीं है। अनुच्छेद 124 में यह होल्ड किया कि... कंसल्टेशन का मतलब होता है कनकरेंस। प्रावधान है कंसल्टेशन। आपने उसका इंटरप्रेटेशन किया कनकरेंस। और उस एक शब्द के इंटरप्रेटेशन द्वारा 1992 से लेकर आज तक टोटल मोनोपोलाइज अधिकार क्षेत्र न्यायपालिका के विषय में आपने ले लिया। उसके बाद अगर आप इस प्रकार की घिनौनी चीजों पर, जहां कि अपना एक विवेक का दर्शन करते हुए कोई जज एक निर्णय देता है। आप सरकार हैं, आपको पसंद नहीं है तो क्या चीथड़े हो जाएगी आपकी पूरी निष्पक्षता? अरे भाई जज का तो मुख्य काम ही है कि सरकार के विरुद्ध निर्णय दे जहां पर अन्याय हो रहा है। अगर वह सरकार के विरुद्ध नहीं देगा तो आज 50 से 75% केसेस में सीधे या परोक्ष रूप में सरकार अवतरित होती है। तो यह कौन सा सिद्धांत है कि जहां आपको पसंद नहीं है आप जो मर्जी कर लें। तो यह जो हो रहा है वह तो बहुत ही घिनौना है और देखिए किस-किस वारदात में हुआ। कितने लोगों की मृत्यु हुई, अत्याचार हुआ, उस वारदात में हुआ। लेकिन उससे ज्यादा बड़ा है जो व्यापक सिद्धांत है। सिर्फ वारदात ही घिनौनी नहीं है उसका सिद्धांत और ज्यादा घिनौना बना रहे हैं आप।
राजीव - जी बिल्कुल सही आप कह रहे हैं आप... और क्योंकि एक ट्रांसफर होता है दो दिन बाद फिर ट्रांसफर कर दिया जाता है वहां के जज का तो...
सिंघवी – एक बात और। उसे संदेश क्या दे रहे हैं आप। संदेश दे रहे हैं कि आप भय से रहो राजीव रंज्जन जी। आप सिर्फ जज हो, मैं कार्यपालिका हूं। आप क्या समझते हो अपने आप को... निष्पक्षता किसी और को दिखाओ, स्वतंत्रता किसी और को दिखाओ। मैं आपको बता रहा हूं कि आपकी जगह क्या है यह आपके बारे में नहीं है। यह संदेश हम सबको मिलता है। और उसमें से 50% अगली बार निडर नहीं रहते हैं।
राजीव – बिल्कुल, इसलिए ये गंभीर चिंता का विषय है। क्योंकि आने वाले समय में अगर इस ढंग से ऐसी परिस्थितियां निर्मित होती रही तो एक दबाव में रहेंगे जजेस जितने भी हैं वो दिखाई दे रहा है। और इसी से रिलेटेड एक और सवाल है। अभी दो दिन पहले सीजेआई साहब जस्टिस सूर्यकांत साहब पहुंचे मुंबई और उनको रिसीव करने पहुंचे महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे। ये आरोप है शिवसेना उद्धव गुट का। प्रोटोकॉल है कि सीजीआई को रिसीव करने शायद चीफ सेक्रेटरी जाते हैं। शिंदे साहब ने उन्हें रिसीव किया या क्या किया यह मायने नहीं रखता। लेकिन वो थे वहां पर मौजूद। और उसके बाद उस होटल में भी थे जहां पर वह ठहरे हुए थे। अब आरोप यह है कि चूंकि एक केस है। आप अच्छी तरह से जान रहे हैं कि शिवसेना ओरिजिनली किसकी है और फिर एनसीपी ओरिजिनली किसकी है? इस केस पर सुनवाई भी होनी है। जो सुनवाई 23 तारीख को होनी थी जो उसदिन नहीं हुई है। एक तरह से आरोपी जो है और इसमें से एक पार्टी, आरोपी ना कहें। पार्टी हैं शिंद साहब। कितना प्रभाव पड़ता है ऐसी चीजों का जब पॉलिटिकल इन्फ्लुएंस चाहे वो सीजेआई हो या जज हो इनके ऊपर होता है। ये जरा समझना चाहता हूं आपसे।
सिंघवी - इसके भी कई पहलू हैं जो समझाना आवश्यक है। पहला तो यह है राजीव जी, कि हमको सब्सटेंस पे जाना पड़ता है। एक जमाना था जब जज के बेटे भी, सुपुत्र भी उनके सामने बहस कर सकते थे और कोई उनपर उंगली नहीं उठाता था। लोग भी उस मौलिक और नैतिक तत्व के बने थे और माहौल भी वह था। आपको आश्चर्य लगेगा लेकिन ये सच्चाई थी। एक ज़माना था कि जब चागला और नेहरू। उदाहरण दे रहा हूं, नाम ले रहा हूं मैं। चाय पर मिलते थे। नेहरू मुख्य न्यायाधीश थे मुंबई के। और राजीव देसाई भी मिलते थे। मुख्यमंत्री थे पुराने मुंबई स्टेट के। लेकिन कोई उंगली नहीं उठा सकता था चागला साहब पर। आज का जो आप माहौल देख रहे हैं उसमें माहौल के अनुसार आपको ये नहीं होने देना चाहिए। ये मेरा पहला बिंदु है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप मेरे को मिले एयरपोर्ट में रिसीव करें, ठीक है। प्रोटोकॉल में चीफ सेक्रेटरी होता है मुख्यमंत्री चले गए, उप मुख्यमंत्री चले गए, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जरूरी नहीं कि कोई गड़बड़ी हो रही हो। लेकिन आज के पूरे वातावरण में जो परसेप्शन है। आपको ऐसा स्कोप नहीं छोड़ना चाहिए कि कोई आरोप लगा सके। ये है मेरा मुद्दा। दूसरा विशेष रूप से जब आप वही केस सुन रहे हैं। मैं तो कहता हूं वैसे भी नहीं। लेकिन जब आप उस केस को सुन सकते हैं या सुनने का निकट भविष्य में होने वाला है तो और ज्यादा आवश्यक हो जाता है क्योंकि जो कहा गया है कि परसेप्शन बहुत विशेष रोल प्ले करता है इन चीजों में। और तीसरा, यह पूरी संस्था की मजबूती के लिए, इंटिग्रिटी के लिए भी आवश्यक है कि किसी रूप से संदिग्ध एक प्रश्न चिन्ह नहीं होना चाहिए। इसके लिए आपको विशेष ध्यान रखना चाहिए आज।
राजीव - जी बिल्कुल, सही कह रहे हैं आप। लेकिन थोड़ा सा एसआईआर का जिक्र यहां करना चाहूंगा। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन। उस केस में आप भी हैं और लगभग 7 महीने से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है। इसमें अब उसकी संवैधानिकता की पहचान की जा रही है कि संवैधानिक रूप से वह सही है या गलत है। जहां तक इस केस को मैं समझ पा रहा हूं। अलग से भी याचिका दायर की गई है पश्चिम बंगाल की तरफ से। शायद आपके पास होगी वो याचिका और मैं समझना चाहता हूं कि इस केस में कहां पर सुप्रीम कोर्ट है और कहां पर इलेक्शन कमीशन है क्योंकि इलेक्शन कमीशन पर सिंघवी साहब, बहुत सारे आरोप लग रहे हैं। आपने ही यह सलाह दी थी, सुझाव आपने दिया था कोर्ट को। सबसे पहले मुझे जहां तक याद है, क्योंकि आप लोग जब वहां दलील पेश करते हैं तो हम उस समय एट दी सेम टाइम लाइव करते हैं। आपकी दलीलों को हिंदी में अपने दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं। घंटों आपकी दलीलें आती हैं और घंटों पैरेलली हम लोग यहां से लाइव करते हैं। और काफी संख्या में, हजारों, लाखों की संख्या में लोग उसको देखते हैं कोर्ट की इस प्रोसीडिंग को। मैं समझना चाहता हूं कि आपने आधार कार्ड का जिक्र किया। आधार कार्ड को आर्डर में लाने में चार बार, चौथी बार, तीन बार तो मौखिक रूप से और चौथी बार लिखित रूप से आर्डर आया। अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सवा करोड़ जो ऐसे नाम हैं जिस पर कहीं ना कहीं कंफ्यूजन है उस नाम को पश्चिम बंगाल के हवाले से मैं जिक्र कर रहा हूं इसका। उस नाम को आप सार्वजनिक कर दीजिए। पब्लिक कर दीजिए। गांव तक, ग्राम पंचायतों तक। आज की तारीख तक पश्चिम बंगाल में यह काम नहीं हुआ है। इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया को करना था क्योंकि एसआईआर इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया कंडक्ट करवा रहा है। इसलिए आज तक नहीं हुआ। ममता बनर्जी ने बड़ा सा, लंबा सा ट्वीट किया। उससे पहले 24 तारीख की शाम को अभिषेक बनर्जी ने ट्वीट किया। बाकी वहां के टीएमसी के नेताओं ने भी किया है। क्या इसको एक अवमानना के रूप में, कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट के रूप में देखा जाएगा? अगर इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को नहीं मानता है, उसकी अवहेलना करता है तो इसको कैसे देखा जाए... और क्यों नहीं मानता है? जरा यह भी समझना चाहूंगा।
सिंघवी - राजीव जी, इसके लिए आप थोड़ा पीछे हट के देखिए। पीछे हटने का मतलब यह है कि सुशासन का मतलब यह नहीं होता है कि मैं राजीव रंजन को हर चीज आदेश से करवाऊं। राजीव रंजन कब उठेंगे, कब उस दिशा में जाएंगे, कब दूसरी दिशा में जाएंगे, कब खाना खाएंगे, कब सोएंगे हर चीज न्यायपालिका की नहीं होती है। दूसरा, अक्षर से सब चीज नहीं होती है। स्पिरिट से होती है। किसी भी कानून में, किसी भी ज्यूडिशियरी में, किसी भी निर्णय में, हर वो चीज नहीं लिखी होती है जो किसी संस्था को करनी होती है। तो दूसरा मेरा पॉइंट यह है कि इस पूरे मुद्दे पर, एसआईआर पर, कहीं ना कहीं चुनाव आयोग ने एक जिद का कुशासन चला रखा है। स्पिरिट वाला सुशासन बनाम जिद वाला कुशासन। मेरी जैसे कोई राजनीतिक जिद है। मैं जैसे आपका राजनीतिक प्रतिद्वंदी हूं। करना तो है मुझे, लेकिन मैं डंडे खाकर, मैं बार-बार आदेश लिखित रूप से देखकर,. उस आदेश को पढ़ने के बाद, और उसके अक्षर की बाल की खाल उतारने के बाद में निर्णय करूंगा। ये हमने बार-बार देखा है एसआईआर में। अब ये शोभा दे सकता है प्राइवेट पार्टी को। अभिषेक सिंघवी वर्सेस राजीव रंजन वाले केस में ये शायद हो सकता है। लेकिन अभिषेक सिंघवी वर्सेस चुनाव आयोग में नहीं हो सकता। क्योंकि अभिषेक मनु सिंघवी चुनाव आयोग का कोई डायरेक्ट प्रतिद्वंदी नहीं है। वह है हमारे जनहित का कस्टोडियन। हमने यह देखा आपके आधार कार्ड वाले मुद्दे पर, जो आपने कहा कि तीन ऑर्डर के दौरान मैंने खुद बहस की। उसके बाद चौथे में जाकर हुआ। हमने देखा इसमें, कि जल्दबाजी में हर स्टेट में, दो महीने में करना है, एक महीने में करना है, तीन महीने में करना है। जबकि कुछ स्टेट्स में चुनाव एक साल बाद है। हमने देखा कि एक ही चीज को बार-बार कह कर कि हम करेंगे, हम देखेंगे अगली बार। लेकिन करते नहीं हैं। जो आपने अभी उदाहरण दिया। इसमें कोई दो राय नहीं है। मुझे शक और संदेह नहीं है कि ये होने वाला है जो आप कह रहे हैं। लेकिन इसको रगड़ रगड़ के, घसीट घसीट कर क्यों कर रहे हो आप? और एक चीज और बताऊं मैं आपको कि देखिए मानहानि में कुछ रखा नहीं है। मेरे को क्या मिल जाएगा? मानहानि का केस करके कोई उच्चतम न्यायालय चुनाव आयोग को जेल तो भेजने वाला नहीं है। चुनाव आयोग को खड़ा तो करने वाला नहीं है कटघरे में। उच्चतम न्यायालय का, चुनाव आयोग का और मेरा, तीनों का उद्देश्य तो एक ही है कि थोड़ा सा सुशासन हो जाए। जब आपको मालूम है कि सुशासन होने वाला है दो हफ्ते बाद, आदेश के बाद, आदेश आने पर, तो आज ही क्यों नहीं करते हो आप। तो मैं इस पूरे अप्रोच की निंदा कर रहा हूं। आज पिछले कई वर्षों से लेकिन विशेष रूप से पिछले कुछ महीनों से इस चुनाव आयोग के गठन में यह राजनीतिक तत्व वाली जिद आ गई है। ईगो के तत्व वाली जिद आ गई है। जो किसी भी संवैधानिक संस्था में हो ही नहीं सकती। आप चिरायु संस्था हैं। राजीव रंजन स्थाई हो सकता है। कुछ समय के लिए हो सकता है अध्यक्ष उसका। लेकिन ये संस्था चिरायु है।
राजीव - लेकिन ऐसे में जो भरोसा खोते जा रहा है चुनाव आयोग और खासकर जो भरोसा अब मतदाताओं को नहीं रह रहा है। क्योंकि कई लोगों से बात होती है सिंघवी साहब और कई लोग मैसेज करते हैं डीबी लाइव के कमेंट बॉक्स में। वोटर्स भरोसा खो रहे हैं। उस भरोसे को आखिर कैसे वापस लाया जाए... हम अपने मतदाताओं के अधिकार का अगर यहां उसको सुरक्षित नहीं रख पा रहे हैं। घुसपैठियों का जिक्र अब सुप्रीम कोर्ट तक में हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट में बेंच पर जो बेंचेज हैं वो घुसपैठिया शब्द का इस्तेमाल उस ढंग से खुलेआम कर रहे हैं। जिससे ये लग रहा है कि इस देश में पता नहीं कितने घुसपैठिए आ गए। एक माहौल इसको राजनीतिक तौर पर बनाने और सत्ता पक्ष की झोली में डालने की जो कोशिश दिखाई दे रही है उस पर आखिर लगाम विपक्ष के नेता के रूप में भी ये सवाल मैं आपसे कर रहा हूं, ना सिर्फ एक एडवोकेट होने के नाते। ये लगाम आखिर कैसे लगे
सिंघवी – देखिए, ये प्रश्न आपको पहले पूछना चाहिए चुनाव आयोग से। अपने पूरे विश्वास को खो देने से उनकी क्या हालत होगी। वो विरासत में अगले चुनाव आयोग के गठन को क्या देकर जाएंगे या क्या दे सकते हैं। नंबर दो, आपने कहा कैसे वापस लाएं विश्वास को? बड़ा आसान है। मैं एक हफ्ते में वापस हासिल करवा सकता हूं वो विश्वास। आप सही, सच्चे रूप से निष्पक्ष होइए। स्वतंत्र होइए। हर अंग को, हर स्टेक होल्डर को कॉन्फिडेंस में लीजिए। और उसके बाद सही करिए। यह नहीं कि स्टेक होल्डर अगर राजीव है तो हमेशा सही होगा वो। गलत भी होगा वो। यह नहीं कि सिंघवी अगर स्टेक होल्डर है तो उसके पक्ष में होल्ड करना है आपको। लेकिन वह मालूम पड़ जाता है। हम लोग कोई बच्चे नहीं है। देश बच्चा नहीं है। घास नहीं खाती है जनता जनार्दन। एक से दो हफ्ते में मालूम पड़ जाता है कि कितने सच्चे रूप से आप निर्णय दे रहे हैं। कितने निर्भीक रूप से स्वतंत्रता दिखा रहे हैं। तो कोई मुश्किल नहीं है। यह आपकी सोच की प्रॉब्लम है। और घुसपैठियों का नाम लिया आपने। आज टोटल मिलाके पिछले 1 वर्ष से जो अगर यह शब्द का दुरुपयोग हो रहा है। चुनाव आयोग से लेके कुछ न्यायपालिका के अंगों में, कार्यपालिका के कुछ मुख्यंत्रियों से लेकर, और प्रदेशों में, तो आपने उसका ऐसा हवा बनाया है कि उसमें आक्रमण हो गया है इतने घुसपैठियों का। इन घुसपैठियों ने आपके प्रदेशों को, प्रदेशों के हिस्सों को टेकओवर कर लिया है। हमारे एक व्यक्ति हैं नॉर्थ ईस्ट के एक प्रदेश में वो तो ऐसा बोलते हैं कि आपके घर में हर मिनट आने वाले हैं घुसपैठिए। कल आपके दरवाज़े पर दस्तक देकर, आपके घर को ले लेंगे। अरे भाई, ठीक है। हम भी नहीं चाहते घुसपैठियों को। लेकिन कितने को.. एसआईआर में कितने मिले? और एसआईआर के अलावा कितने मिले.... और अगर इतने सैकड़ों की तादाद में हैं तो सबसे बड़ी असफलता गृह मंत्रालय की है या राजीव रंजन या अभिषेक सिंघवी की है... पहली बात तो है ही नहीं। दूसरी बात, आप एक हव्वा क्रिएट कर रहे हैं। राजनीतिक हव्वा। देखिए, आपने बंगाल का नाम लिया। मेरा मानना है मैं राजनीतिक रूप से आपका प्रश्न का जवाब दे रहा हूं कि बंगाल में उद्देश्य सिर्फ दो चीजों का है। जहां तक सत्तारूढ़ पार्टियों का सवाल है। पैसा बेशुमान, बिना काबू के, बिना सीमा के खर्चा। और पोलराइजेशन। एम एंड पी - ये दो स्लोगन है। मनी एंड पोलराइज। अब पोलराइजेशन का, बिल्कुल सब जानते हैं कि ये घुसपैठिया वाला शब्द उसका एक तौर तरीका है तो इससे आप बड़ी सस्ती राजनीति खेल रहे हैं।
राजीव - जी सिंघवी साहब। एक आखिरी सवाल। मनरेगा को लेकर जो कांग्रेस पार्टी अभी जिस उत्साह के साथ लगी है, आप लोग लगे हुए हैं। मनरेगा बचाओ संग्राम आपलोगों ने छेड़ रखा है। इसमें कितनी सफलता मिलने की उम्मीद जताई जाए? कितनी उम्मीद है आप लोगों को अगर ये सवाल सीधे पूछूं तो। और क्योंकि ये ऑलरेडी वीबी यानी विकसित भारत जी राम जी एक्ट बन चुका है और ऐसे में मनरेगा को वापस लाने की जो आपकी जिद्द है वो कितना आप समझते हैं कि उसमें आप लोग सफलता हासिल कर पाएंगे।
सिंघवी – देखिए, ये राजनीतिक प्रश्न है और राजनीतिक प्रश्न का उत्तर भी राजनीतिक क्षेत्र से ही आएगा। इसमें कोई संदेह नहीं है राजीव जी कि तुरंत, या निकट भविष्य में सत्य को ग्रहण करना अपनी गलती मानना और जी राम जी वापस लेना और पुराने प्रारूप को स्थापित करना इस सरकार की वो सोच भी नहीं है। इस सरकार की वो एक पहचान भी नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमको इसमें कोई ज्यादा आशावान होना चाहिए, ये मूर्खता होगी। लेकिन ऐसे ही शुरू हुआ था कृषि कानूनों के विषय में। ऐसे ही बात शुरू हुई थी और मुद्दों पर भी। लैंड एक्विजिशन वाले एक्ट पर भी। अंतत: जब राष्ट्रीय अभियान चला उसमें एक में तीन साल लगे। एक में चार साल लगे। लेकिन आपने अंतिम रिजल्ट तो देखा। यह दूसरा बिंदु है। तो ऐसे राजनीतिक अभियानों को असफल समझना ठीक नहीं। क्योंकि इसमें प्रेस बटन वाला निर्णय या परिणाम नहीं आता है। वो गलत होगा। चौथा ये चीजें कहीं ना कहीं जनता आत्मसात करती है धीरे-धीरे। यह राजनीतिक अभियान है ना कि कोई केस है, ना कि कोई एक प्रोग्राम है सिर्फ। कि उनको जाकर बताया जाता है कि भाई ये पांच तत्व हैं आपके प्रदेश में। इतने लोगों को रोजगार मिलता था। अब इतने लोगों को मिलने की संभावना है। इतनी कमी है रुपयों की प्रदेशों में, और इस प्रकार से इसमें कटौतियां हुई हैं। गणतंत्र का मतलब होता है कि इसको ग्रहण करेगी जनता। हमारा पूरा विश्वास है। हमें हौसला है और उसका आप कहीं ना कहीं एक रिएक्शन देखेंगे। आखिर पिछले कुछ ऐसे अनुसंधानों में वो रिएक्शन सरकार ने भी समझा। यद्यपि बहुत विलंब के साथ समझा। बहुत जिद के बाद समझा। बहुत झगड़ने के बाद समझा। लेकिन वह समझा। कहीं ना कहीं जनता जो है इसके लिए हमको दंडित करेगी। यह सरकार, देखिए, दंड के आभास के बिना कुछ नहीं करती है। अपने आप या स्वतः सही चीज करना इनकी पहचान ही नहीं है। इनकी आदत ही नहीं है। लेकिन चलो, आप दंड के सहारे करो तो भी कुछ अच्छा होगा। तो यह राजनीतिक दंड जनता देगी। ये आभास हम फैला रहे हैं। बाकी देखिए क्या होता है सफलता कतनी मिलती है, ये तो भविष्य की बात है।
जी बिल्कुल। तो बहुत-बहुत शुक्रिया सिंघवी साहब इस चर्चा के लिए।


