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इस संसद सत्र के पीछे महिला आरक्षण नहीं परिसीमन – अभिषेक मनु सिंघवी

अगर मोदी इज़राइल नहीं जाते तो शांति वार्ता इस्लामाबाद की जगह दिल्ली में होती

Abhishek Manu Singhvi Latest Interview




कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, सांसद और जाने माने वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने डीबी लाइव और देशबंधु समूह के एडिटर इन चीफ राजीव रंजन श्रीवास्तव के साथ अपने पाक्षिक पॉडकास्ट में साफ कहा है कि विधानसभा चुनाव के बीच अचानक संसद सत्र बुलाने के पीछे सरकार की मंशा कुछ और है। वह महिला आरक्षण बिल को लागू करना नहीं, परिसीमन कानून लागू कराना है। उन्होंने कहा है कि इसके लिए न तो सर्वदलीय बैठक बुलाई गई, न विपक्ष की राय ली गई। दूसरी तरफ अभिषेक मनु सिंघवी मानते हैं कि अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी युद्ध के 48 घंटे पहले इजराइल न गए होते और नेतन्याहू से मिलकर नहीं आए होते तो शांति के लिए दो बातचीत आज पाकिस्तान की पहल पर हो रही है, वह भारत में होती। तब हम विश्वगुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ सकते थे। उन्होंने ये भी कहा कि 70 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि इतने बड़े पैमाने पर इस युद्ध से दुनिया प्रभावित हो रही है और भारत की कोई भूमिका ही नहीं है। ऐसे तमाम अहम सवालों पर अभिषेक मनु सिंघवी के साथ इस बातचीत में राजीव रंजन श्रीवास्तव का साथ दिया वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन ने भी। पेश है बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण हिस्से ---

राजीव रंजन श्रीवास्तव - सिंघवी साहब, डेढ़ महीने से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है और पश्चिम एशिया में जो अशांति का जो आलम है उसे आप कैसे देख रहे हैं। एक अच्छी पहल हुई थी पाकिस्तान की तरफ से औऱ बेशक इसकी तारीफ करनी होगी कि कम से कम इस्लामाबाद पीस टॉक्स हुआ हालांकि वो असफल रहा। असफलता के कई कारण गिनाए जा रहे हैं। लेकिन आपके जरिए भी समझना चाहूंगा कि इसे आप किस तरह देखते हैं?

अभिषेक मनु सिंघवी - देखिए सही कारण तो मैं समझता हूं कोई नहीं दे सकता सिवाय दो तीन लोगों के। राष्ट्रपति यूएसए के या उपराष्ट्रपति। लेकिन मैं समझता हूं कि ये पूरा जो युद्ध चल रहा है उसमें इजराइल ने अपने आप को गिरवी कर दिया है। ट्रंप यूएसए नहीं हैं। यूएसए बहुत बड़ा देश है लेकिन इजराइल को ट्रंप ने गिरवी कर दिया है। जब आप शुरुआत से मध्यस्थता में पहुंच जाते हैं किसी और के और एक कठपुतली वाले तार खींचने वाले व्यक्ति के साथ, तो इमीडिएटली उससे हटना असंभव हो जाता है। कब करना है, कहां करना है, कितनी जोर से अटैक करना है, क्या-क्या मांग करनी है, ये सब निर्देशित कर रहे हैं। एक बहुत चालाक लेकिन पागल व्यक्ति हैं यानी इजराइल के जो सुप्रीम हैं।

यूरेनियम को एनरिच करना आपका मानव अधिकार है। किसी भी देश का निजी रूप से। अगर एनर्जी के लिए एनरिच करे और आपको किसी रूप से उसका सैनिक दुरुपयोग नहीं दिख रहा हो जो आज तक नहीं मिला है। तो वैसे आपका अधिकार है। फिर भी अगर सार्वजनिक रूप से कहा गया कि पांच साल का ऑफर किया है ईरान ने। यूएस को क्या फर्क पड़ता है? 5 साल कम नहीं होते हैं। तो निश्चित रूप से नेताओं ने कहा है। अब आप ऐसी कोई सीमा लगाएंगे 20 साल का। मतलब नष्ट करना अपने प्रोग्राम को जबकि ऊर्जा का एक ये महत्वपूर्ण सोर्स है। उसके कई कई नए कारण आ गए हैं इस्तेमाल करने के। तो कौन बच पानेगा इतनी आसानी से? तो ये मुद्दा नहीं है। इजराइल को भी 20 साल नहीं चाहिए। इजराइल को इंटरेस्ट है कि युद्ध चले। अब युद्ध चलाने के लिए तो कोई ना कोई बहाना निकालना पड़ेगा। सीज फायर नहीं हो या सीज फायर हो और वे भी कुछ समय के लिए हो लेकिन युद्ध चलता रहे। भाई आप समझते हैं कि ऊपर उत्तर में लेबनान है। नीचे यह है। वहां हिजबुल्ला है। तो यह है कि उसको न्यूट्रलाइज करो। मैं कठोर शब्द में विश्वास नहीं करता लेकिन मैं समझता हूं कि विदेश नीति में और अपनी विदेश नीति को हर क्षण बदलने में, इससे ज्यादा पागलपन कोई पूर्व यूएस के राष्ट्रपति ने दिखाया नहीं है। उसका दुरुपयोग किया है। तो इसलिए मुझे लगता है कि जब तक यूएस के हस्तक्षेप का समय आएगा और जब उनको लगेगा कि सब उनके आपे से बाहर जा रहा है तो शायद वो इजराइल को दरकिनार कर देंगे कुछ हद तक। लेकिन जब तक वो नहीं करेंगे तो इजराइल किसी रूप में इसमें एक संतुलित सीज़फायर नहीं होने देगा और हमेशा ऐसी एक कंडीशन डाल देगा कि ईरान मान ही नहीं सकता।

राजीव - तो यह तो दिख रहा है ना सिंघवी साहब कि इजराइल लीड कर रहा है।

सिंघवी – लीड ही नहीं कर रहा है। पूरा कंट्रोल उसका है जो इस फिल्म का निर्देशन कर रहा है, उसकी एडिटिंग, उसके एक्टरों को चुनना, उसकी लेंथ, उसके चित्र. उसका सिनेमा विज़न सबकुछ। निर्माता निर्देशक सब वो हैं। लेकिन फिल्म बनाने का सारा इक्विप्मेंट सप्लाई कर रहा है अमेरिका।

प्रशांत टंडन -- हां। तो जो हमारे एक बड़े निर्माता निर्देशक हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी। युद्ध के 48 घंटे पहले ये नितन्याहू के पास थे। मेडल भी ले आए कोई। और पहली बार देख रहा हूं मैं पिछले 40, 50 साल, 70 साल के इतिहास में कि इतने बड़े पैमाने पर दुनिया दुनिया प्रभावित हो रही है भारत का कोई रोल नहीं है इंडिया का।

अभिषेक मनु सिंघवी – बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है प्रशांत जी आपका। एक महा ब्लंडर इसको कह सकते हैं आप। अगर आपको मालूम नहीं था जब आप गए कि 36 घंटे बाद मैं आप पर आक्रमण करने वाला हूं तो आपकी विदेश नीति, कूटनीति, इंटेलिजेंस फेलियर है। उसी कारण से आप निंदित और घृणित हो सकते हैं। अगर आपको मालूम था और फिर भी आप गए तो ये उतनी ही घृणात्मक बात है। आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ है। पहले ये सब चीजें फॉरेन मिनिस्ट्री के सोर्सेज थे उसके जरिये आपस में बात हो जाती है। कभी ऐसा नहीं हुआ है कि मैं आप पर आक्रमण होने वाला है। उसके 10 घंटे या एक दिन पहले आप आ जाए वहां पर। तो ये मेडल की लोलुपता बाद के लिए रखी जा सकती थी। खैर, मेरी बात पहले ही बोल दी आपने। दोहराऊंगा नहीं। लेकिन इसका एक बहुत दुष्परिणाम हुआ है, बहुत बड़ा। मैं चाहता हूं और अभी भी मेरी लालसा थी अभी तक कि यही टॉक्स या पीस टॉक भारत में होनी चाहिए। दुख इस बात का नहीं कि चले गए। ठीक है, मेडल मिल गया अच्छी बात है। प्रधानमंत्री को बधाई। लेकिन ये इसी कारण से नहीं हुआ है।

आज भूगोल में साउथ साउथ में, नॉर्थ नॉर्थ में जीडीपी जो भारत की है, साइज भारत की है, जो पावर भारत का है, जो अधिकार क्षेत्र भारत का है, जो बाउंड्री भारत की है, जो विश्व भर में वह अपनी साइज की वजह से। मार्केट है हमारा। कोई तुलना है भला पाकिस्तान से?

पाकिस्तान को आपने जहां एफएटीएफ में दसों साल से टेररिस्ट नेशन, कभी ग्रे कैटेगरी में डालते हैं, कभी ब्लैक में डालते हैं, कभी रेड में डालते हैं। भला वो होस्ट कर रहा है पीस टॉक्स?

आप आतंकवादी देश में पीस टॉक्स होस्ट कर सकते हैं कभी? और सबसे बड़ा स्पॉन्सर कहा गया पाकिस्तान को, मोर दैन अफगानिस्तान एंड मोर दैन अदर प्लेसेस। अब उन्होंने कर दिया। मैं दावा के साथ एक नई बात कह रहा हूं आपके सामने कि अगर ये गलत समय की गलत यात्रा नहीं होती तो हम होस्ट करते, करना चाहिए था। और वो होता कुछ हद तक विश्व गुरु की तरफ अग्रसर होना। प्रशांत टंडन -- तो अगर प्रधानमंत्री मोदी इजराइल न गए होते तो यह बातचीत इस्लामाबाद की जगह नई दिल्ली में हो रही होती।

सिंघवी - एक गलती तो वो थी। बहुत बड़ी भयंकर गलती थी। यात्रा गलती नहीं है। विश्वास खो देना गलती है। अब ये नहीं हो सकता कि मैं आपको विजिट कर रहा हूं। उसके डेढ़ दिन में आप इनको आक्रमण कर रहे हैं तो विश्वास होगा। दूसरी गलतियां क्या रही है कि आपने एक टिल्ट दिखाया। अब आपने टिल्ट सही करने का प्रयत्न बहुत किया है। ऐसा नहीं है। सरकार भी चालाक है। माननीय मोदी सब समझते हैं। लेकिन आपकी टिल्ट इस युद्ध के तुरंत पहले तक टिल्ट थी अमेरिका और इजराइल की तरफ। इसलिए एक दिन में कौवा हंस नहीं बन सकता ना। तो आपने उसके बाद उसको बैलेंस करने की कोशिश की। आपने बात की बार-बार यूएई देशों से, सऊदी अरेबिया से वगैरह वगैरह। लेकिन एक बात तो बैठ गई कि आपका अलाइनमेंट जो है वो इतना ओपनली नहीं होना चाहिए। खासतौर से विस्फोटक सिचुएशन...

प्रशांत टंडन - खामनेई साहब की हत्या पर अभी तक अफसोस नहीं किया उन्होंने

सिंघवी - अफसोस नहीं किया उन्होंने। उस वक्त नहीं गए। तो आप किस मुंह से कह सकते हैं कि हम बनेंगे एक मिडिएटर। अच्छा देखिए, सिर्फ एक वेन्यू होना या एक दलाली की बात करना पाकिस्तान द्वारा या वो दलाल है ये कह देना, ये चीज़ छोटी है। मुख्य बात ये है कि अगर हमने कोई ब्रोकर किया होता.. देखिए, ईरान से हमारे अच्छे रिश्ते हैं, यूएसए से अच्छे रिश्ते हैं और इजराइल से अच्छे रिश्ते हैं, पर क्या पाकिस्तान से अच्छा रिश्ता है? त्रिकोण है, त्रिकोण। यहां तो द्विपक्षीय हो रहा है सब... तो त्रिकोण में सिर्फ एक देश था जो त्रिकोण में बैठता था, लेकिन त्रिकोण में आप टिल्ट नहीं कर सकते ज्यादा। और 100%। ये बहुत दुखद प्रसंग है। यात्रा गलत थी आपका प्री-कंसीव्ड, पहले का टिल्ट गलत था। और बाद में कौवा से हंस बनने का तरीका दुनिया देख रही है।

राजीव रंजन - अब इसमें आगे भारत के हिसाब से क्या हो सकता है? भारत अमेरिका के साथ दिखाई दे रहा है। इजराइल के साथ दिखाई दे रहा है। ईरान के साथ भले भारतीयों की, यहां की जनता का जो संबंध है बना हुआ, लेकिन सरकार आज भी इससे दूर दिखाई देती है।

सिंघवी - अब आप अंतरराष्ट्रीय चीज की बात कर रहे हैं राजीव जी। मैं आपको तीसरा पहलू देता हूं।

क्योंकि मैंने आपको बताया त्रिकोण। और हम एक ही देश हैं जिनका बहुत निकट संबंध एक तरह से है तीनों से। हमने दिखाया नहीं निकटता ईरान से, लेकिन है निकट हमारा। चाबहार पोर्ट। आखिर हमने वहां पर ऐसे थोड़ी कर लिया इतना बड़ा पोर्ट था। वहां पर चीन के इन्फ्लुएंस के बावजूद। दो चीज और भूल रहे हैं। रूस हमारा बहुत अच्छा दोस्त है और ब्रिक्स के हम अध्यक्ष हैं।

तो मैं तो यह कहूंगा कि यद्यपि बहुत बड़ी गलती हुई है। बहुत नुकसान हुआ है भारत के इमेज का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर। लेकिन अभी भी मैं चाहूंगा करेक्टिव करके, जो दौर टू है पीस टॉक्स का, उसे यहां होना चाहिए। कहीं ना कहीं या कभी ना कभी दौर टू तो होगा पीस टॉक्स का। कब हो, नहीं हो, मैं नहीं जानता। उसको आप उस तरह से क्यों नहीं कर सकते। आज के बाद से आप ऐसा रवैया रखिए जिससे सेट टू स्टेज टू यहां बने और उसको उस स्टेज टू के स्टेज टू बी में इजराइल भी आ जाएगा।

प्रशांत टंडन -- तो इसके लिए जैसे मान लीजिए इस्लामाबाद की जगह अब वेन्यू दिल्ली शिफ्ट हो जाए।

सिंघवी - वेन्यू की बात नहीं है सिर्फ। देश की बात है। वेन्यू तो बॉम्बे हो, दिल्ली हो, ठीक है।

प्रशांत टंडन - और वो जो भी हो, भारत में हो। टॉक्स में भारत का एक रोल हो और ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास है। रूस हमारे साथ है। वो तीन चार चीजें मोदी जी को क्या करनी चाहिए कि ये हो?

सिंघवी - अब देखिए, इतना आसान तो है नहीं। प्रेस बटन जैसी कोई चीज़ तो है नहीं। गलतियां जो हो गईं, ये अंतरराष्ट्रीय रिलेशन में रिवाइंड नहीं होती। लेकिन इतनी आसानी से अंतरराष्ट्रीय रिश्ते में पॉलिसी नहीं बदल सकते। डोमेस्टिक आर्थिक पॉलिसी बदल देते हैं, ये नहीं बदल सकते इतनी आसानी से। तो आपको भरोसा जीतना होगा, ट्रस्ट बिल्ड अप करना पड़ेगा। आपको स्ट्रेट जाना पड़ेगा और मैं तो कहूंगा कि अगर करना है तो इसको बैक चैनल से तीनों देशों को कहिए कि पहले हम द्विपक्षीय करते हैं यूएस और ईरान की। एंड टॉप लेवल। टॉप लेवेल मैन शुड गो टू ईरान एंड ऑफर इट। ऐसे नहीं होगा ये। एंड टॉप लेवल मैन शुड गो टू यूएसए आल्सो और इसमें बैक चैनल से रशिया से भी बात हो। उससे बहुत असर पड़ता है। क्योंकि वो तो प्रतिद्वंदी है यूएसए का। जब वो भी कहेगा। और ब्रिक्स में इसका समर्थन करेगा चीन। बल्कि चीन इतना चालाक है कि चीन चाहेगा कि उसके घर में हो लेकिन चीन में हो नहीं सकता ये क्योंकि कमिटेड है उसे आर्म्स देता है। इसलिए भारत एक नेचुरल जगह है। तो ये उनको सीधा एक डिप्लोमेसी, पहले बैक चैनल से एक दो हफ्ते उसके बाद डायरेक्ट भिजवा के। और मैं समझता हूं कि सबसे खराब होगा कि नहीं होगा। तो क्या फर्क पड़ता है? प्रयत्न तो किया आपने और अगर हो गया तो ये बहुत दूरगामी हो सकता है क्योंकि उसके तीसरे पक्ष में इजराइल भी आएगा। आने के लिए विवश हो जाएगा। जब अमेरिका बदलेगा तो इजराइल का आना आवश्यक होगा और वो सिर्फ भारत आ सकता है। इजराइल चीन नहीं जा सकता। रशिया नहीं जा सकता। पाकिस्तान नहीं जा सकता। कौन सा देश बचा है? यूएसए में टॉक्स होंगी नहीं। ईरान में टॉक्स होंगी नहीं। वो बहुत जगह नहीं जा सकता। वो ठीक है। यूएई जैसे देशों में ट्रांजिट स्टॉप कर लो वहां कर लो। वहां भी उन्होंने सपोर्ट किया इतने ओपनली यूएसए को के चाहेगा ईरान मोर कंफर्ट लेवल जो होगा ईरान का भारत में। और मैं आपके प्रोग्राम के द्वारा आह्वान करता हूं। अगर हुआ तो भारत के लिए अच्छा है। आपके विश्व गुरु के वक्तव्यों के लिए सबसे बड़ी चीज ये है।

राजीव रंजन श्रीवास्तव - लेकिन लगता है क्या आपको अभी तक बहुत अभी तक कोई अपनी तरफ से एफर्ट दिखाई दे रहा है?

सिंघवी - नहीं नहीं। वही तो मैं कह रहा हूं कि करना पड़ेगा। अगर आपकी सोच बदलेगी तब। आपको इसके लिए सोच बदलनी होगी। अब आप सिर्फ एक क्राइसिस मैनेजमेंट कर रहे हैं इस वक्त। उसकी मैं निंदा भी नहीं कर रहा हूं। ये आवश्यक है कि आप तेल को भी आने दें। आप इजराइल को भी नाराज ना करें। हमारे आर्म्स आते हैं, कृषि का आता है हमारा सामान। और साथ-साथ यूएसए से झगड़ा नहीं ले सकते पागल आदमी है। वहां पर कुछ भी कह सकते हैं। तो उसकी मैं सराहना करता हूं मैं उसकी निंदा नहीं कर रहा हूं। लेकिन अगर आप पीस ब्रोकर के रोल में, जो मैंने कहा है करना शुरू करेंगे तो इसमें कोई अपवाद नहीं। कोई विरोधाभास नहीं है। और मैं समझता हूं कि अगर इसे लेकर पर्सिस्टेड एफर्ट हो तो अवसर है अभी भी। यद्यपि इसका पाकिस्तान विरोध करेगा। लेकिन हमारे लिए बहुत बड़ी चीज होगी। लेकिन मैं नहीं देख रहा हूं कि ऐसी कोई सोच है। हमारी सोच अभी है क्राइसिस मैनेजमेंट। हमारी शिप्स निकल आए, थोड़ा युद्ध का विराम हो, रशिया से भी ऑयल ले ले और अमेरिका को को खुश रखे वो अच्छी बात है। साथ-साथ ये विदेश नीति नहीं कर रहे हैं आप।

राजीव रंजन श्रीवास्तव - दूसरा है कि अपने यहां के इलेक्शन पे ज्यादा फोकस है।

सिंघवी - वो तो आपने कहा ही खैर। देखिए, वो तो कुछ हद तक अल्पसमय का होता है। बट वो यू आर राइट। अभी दो हफ्ते और बचे हैं। तो फोकस तो पूरा ज्यादा नहीं, पूरा वहां है। पिछले दो हफ्ते से फोकस सिर्फ आर्थिक मैनेजमेंट पर और निजी पॉलिटिक्स पर है।

राजीव रंजन श्रीवास्तव - संसद का सत्र भी बुलाया जा रहा है। थोड़ा सा मैं डायवर्ट कर रहा हूं। लेकिन ये एक मुद्दा आ गया। संसद का स्पेशल सेशन अभी बुलाना और वो भी अल्पकालिक, इसे क्या माना जाए? क्योंकि बहुत सारी बातें आ रही हैं इसमें।

सिंघवी - ये एक व्यापक मुद्दा है जिसे आपको मैं संक्षिप्त में बता रहा हूं कि अपने आप में पूरा प्रोग्राम का समय आपका खा सकता है। मैं सीनियर्स में भी हूं। हमने भी इस बहुत दो तीन घंटे चर्चा की अभी। तो सरल करने के लिए आपके दर्शकों के लिए नंबर एक मैं गलत हो सकता हूं लेकिन आपको स्पष्ट बता रहा हूं। इसका कोई वुमेन रिजर्वेशन बिल से कनेक्शन ही नहीं है। वुमेन रिजर्वेशन बिल हमने इस सरकार द्वारा सर्वसम्मति से बिना डिसेंट के पास कर दिया है। आपको ये मालूम है कि संवैधानिक संशोधन है ऑलरेडी। संविधान में विमेन रिजर्वेशन बिल है। उसको कार्यान्वित करने का तरीका भी लिखा है। तो ये वो संशोधित करने के लिए ला रहे हैं। हमारा स्टैंड है कि हम उस बिल के साथ खड़े हैं। हमको चाहिए। हम आरक्षण महिला आरक्षण के विरुद्ध बिल्कुल नहीं है। बदल तो आप रहे हो। अब आप क्या कह रहे हो? इसलिए ये सेशन है कानून डीलिमिटेशन के बारे में। एक, 2011 के आधार पर आप आरक्षण करेंगे अभी आपको कोई तर्क के हिसाब से सही लगता है?

2029 में लागू होगा पहली बार। 2011 का आ रहा है। 18 साल का क्या मतलब है। दुनिया बदल जाती है दो साल में। तो उन आंकड़ों का वैल्यू क्या है? नंबर टू, आपका करंट सेंसस भी उसके छह महीने या एक साल बाद तैयार हो जाएगा। अगर आप चाहेंगे तो जल्दी भी हो सकता है। तो आप 18 साल पुराने आंकड़े क्यों ले रहे हैं और इस 2029 के छह महीने बाद आपको नए आंकड़े भी मिल जाएंगे या उसके पहले भी मिल सकते हैं। तो इसका मतलब कोई ना कोई तो आपका एक दूसरा उद्देश्य है ना। कौन कहेगा कि मैं 18 साल के आंकड़ों को मानूंगा। तीसरा, ये उद्देश्य डिलीमिटेशन का क्यों है? क्योंकि ये बात सही है कि अनुपात सबका बराबर रहेगा। आज अगर 540 में तमिलनाडु के 20 सीटें हैं। मैं उदाहरण दे रहा हूं। एक्चुअल आंकड़े नहीं दे रहा हूं। तो 20 सीट 545 में x% होती है। बाद में आरक्षण के बाद भी 20 सीट या 30 सीट अगर होंगी तो पूरे हाउस पे प्रपोशन वही x% रहेगा। ये आपको कहा जाता है। लेकिन इसमें कैच क्या है? 20 सीट बदलेंगी तमिलनाडु की। 40 सीट बढ़गी उत्तर प्रदेश की। तो जो नया हाउस होगा 840 वाला या 816 वाला उसमें अगर आप एक लाइन ड्रा करें पूरे उत्तर प्रदेश, बिहार जिसको आप एक बीमारू स्टेट कहते हैं, हिंदी बेल्ट कहते हैं या काऊ बेल्ट कहते हैं तो ये पूरा डेक्कन तक या डेक्कन से ऊपर और कश्मीर के नीचे तक इसमें जो वृद्धि होगी। तो जो छोटे हैं उसमें छोटी सी वृद्धि होगी। जो बड़े हैं उसमें बहुत बड़ी वृद्धि होगी।

नए हाउस में, चलाने में, वोट मांगने में, वोट लेने में। आज कट ऑफ है 273 तब कट ऑफ होगा 400 या 405 या 407। अब ये आप अपनी राजनीति के हिसाब से देखो। आपका डेक्कन में कोई अस्तित्व नहीं है। आपका क्या अस्तित्व है डेक्कन में बताइए आप? एक स्टेट में है अस्तित्व। वह भी जा रहा है, कम हो गया है एक स्टेट में। तमिलनाडु में आप देख लीजिएगा। अभी केरल में। तेलंगाना में आप कोशिश करके थक गए। खर्चा भी बहुत कर दिया आपने। आंध्र में आप पिगी बैक कर रहे हो नायडू जी पर। आपका तो जीरो है। तो, अब आप समझिए इसका उद्देश्य। वुमस रिजर्वेशन। तो हम किसके साथ हैं कि आप इसी वो जो रिजर्वेशन आया था पहले इसी 540 में नए सेंसेस के आधार पर करिए।

यही तो था। ये तो हम लाए थे प्रस्ताव के रूप से। हमने कानून नहीं किया था। हमारे प्रस्ताव को उन्होंने पारित कर दिया। हमारा प्रस्ताव सोनिया गांधी जी की अध्यक्षता में कितना साल पुराना है? दो सरल सेंसस और 543 में 33% महिलाएं। उसको पारित कर दिया है सरकार ने। अब आप उसका संशोधन कर रहे हैं। संशोधन जो है उसका उद्देश्य यह नहीं कि वो तो मिलेगा ही आरक्षण। इस प्रकार से आरक्षण दो कि हमारी वोट की पॉकेट्स ज्यादा मजबूत हो। और जहां हम भी हैं वहां पर हमारा आश्रित कम हो जाए।

हम मानते हैं, नहीं होना चाहिए। बाकी तो देखिए येन केन प्रकारेण बीजेपी के पास बहुत सारे तथ्य हैं आपको पर्सुएट करने के लिए। राजीव रंजन जी आईडियोलॉजी पर्सुएट नहीं होते। किसी और तरीके से हो सकते। लेकिन आज के आंकड़े में दो तिहाई कहां है? अगर सब लोग उपस्थित हों तो आप क्या करोगे? आप कुछ लोगों से एक्सटेंशन कराओगे। उससे हाउस का नंबर कम हो जाएगा। कुछ लोगों को आप पर्सुएट करोगे कि भाई, अचानक बीजेपी प्रेम जागा है। ये जो है फेडरल संघीय राशि के विरुद्ध है। नए हाउस में तमिलनाडु 30 का रहेगा। लेकिन उत्तर प्रदेश के सामने बच्चा लगेगा बिहार के सामने चाइल्ड लगेगा।

प्रशांत टंडन - तो क्या कांग्रेस पार्टी कोई अल्टरनेटिव फार्मूला दे रही है? जैसे मान लीजिए एक उदाहरण दूं आपको, कि जर्मन पार्लियामेंट है या यूरोपियन यूनियन की पार्लियामेंट है तो वो प्रोपोशनल रिप्रेजेंटेशन है।

सिंघवी - कुरैशी साहब ने एक आर्टिकल लिखा है इस पर कि आप जो बढ़ा रहे हैं उसको 540 को ऐसे रखिए और 250 जो है आपका जो 300 है उसके लिए पहले इलेक्शन कर लीजिए उससे वोट शेयर आ जाएगा। 543 के इलेक्शन वोट से आ जाएगा। आपकी पार्टी के 10% वोट है। आपकी 20 से मेरी 30 है। फिर इसी रेशियो पे 10, 20 और 30 के रेशियो में वो पार्टी वो 300 सीट्स नॉमिनेट करेगी। ये उनका है। लेकिन हमारा जो जवाब है बड़ा आसान है। पुराना वाला करिए। सबको सफर करना पड़ेगा। भाई, आप यह समझने प्रयत्न करिए कि आज संविधान में लिखा है कि सेंसस लेटेस्ट सेंस के आधार पर 543 की एक तह महिलाएं होंगी। उसमें एक ही नुकसान है। आप जो पुरुष है आप हल्ला करेंगे और रोएंगे। मैं जो पुरुष हूं मैं रोऊंगा कि मेरी सीट महिला को चली गई। सैक्रिफाइस हम सब कर रहे हैं। उसमें उसमें ये तो पारित कानून है। हम कहेंगे कि हम विरोध कर रहे हैं इस कानून का। आप वोट करेंगे इसके अगेंस्ट क्योंकि हम तो आपके संविधान के साथ खड़े हैं। ये हमारा स्टैंड है। अब प्रोपोशनल जो आप बात कर रहे हैं वो एक नवीनतम मॉडल है। वो तो होने वाला नहीं भारत में 20 साल तक 50 साल तक उसमें तो पूरा संविधान बदलना पड़ेगा ना। 250 और करिए। फिर उसको वोट का परसेंटेज लेके करिए। उन्होंने एक मॉडल एक एक्सपेरिमेंटल मॉडल दिया है। कुरैशी साहब ने लिखा है आर्टिकल उसपर। लेकिन यह जो बात है कि जब आपने कानून पारित करवाया सर्वसमति से। आपकी सरकार ने। उसको क्यों नहीं लागू कर रहे हैं? यह कह के कि हम ये जरा गुस्सा कम करना चाहते हैं कि भाई पुरुष की वो सीट गई। क्यों? पुरुष सैक्रिफाइस करे ना महिलाओं के लिए।

राजीव रंजन श्रीवास्तव -- हां बिल्कुल। इस वक्त इस स्पेशल सेशन का मतलब क्या है?

सिंघवी – डिमिलिटेशन। अच्छा, जहां तक इस समय का सवाल है। इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी

इनकी सोच है। और देखिए यही बात की गई थी कि पिछले सेशन को एक्सटेंड करेंगे वो कैंसिल किया गया, ये लगाया गया। इनकी सोच है। सही है, गलत है, कौन जानता है। वो चाहते हैं कि हम एक संदेश भेजेंगे तमिलनाडु में और पश्चिम बंगाल में कि हम महिलाओं के लिए कर रहे हैं। और हम तो ये भी कहेंगे कि आपका परसेंटेज सेम रख रहे हैं। अब यह सोच सही है गलत है, ये तो भगवान जानता है लेकिन इस वक्त तो करना पूरी तरह अनुचित है, अनुपयुक्त है। चुनाव की आखरी तिथि क्या है.. 29 अप्रैल। आप इसे मई में कर लेते। दो हफ्ते के लिए जिद की आपने। कितनी चिट्ठी लिख दी खरगे साहब ने। अच्छा एक और इसमें है। प्रोसेस देखना बहुत जरूरी है। मैंने आपको सब्सटेंट ही बता दिया। प्रोसेस सोचिए आप, इतना बड़ा चेंज कि आपके हाउस में 300 लोग और बैठेंगे। इतना बड़ा चेंज कि उत्तर प्रदेश का 80 से 120 हो जाएगा। कैलकुलेशन 120 हो जाएगा। इसके लिए सर्वदलीय बैठक, दो दिन 48 घंटे पूरी कब हुई? आप देश का नक्शा बदल रहे हो भैया? पार्लियामेंट का नक्शा बदल रहे हो कि नहीं आप? किसी कंट्री में होता है गणतंत्र में कि आपने सर्वदलीय बैठक एक दिन दो दिन करनी चाहिए थी पहले। उसमें भड़ास निकालिए। आप नहीं मानिए, मानिए, वो अलग बात है। आप ही की बहुमत है। जहां तक कानून लाने की बात है। जीतने हारने की, तो दो तिहाई मैं नहीं मानता है उनके पास है। लेकिन लाने में तो आपका ही बहुमत है। वो नहीं किया आपने। दूसरा, आपने ये दो साल लगा दिए इसमें। वन नेशन वन इलेक्शन में कमेटी पूरे देश में घूम रही है। और भी आपने कमेटी वक्फ पे लगाई। इसमें कोई आपने सेलेक्ट कमेटी लगाई? सेलेक्ट, जेपीसी... कुछ भी नाम दे दीजिए इसको। और फिर, जब आप चुनाव में बंगाल भाग रहे हैं, केरला भाग रहे हैं, मैं इधर भाग रहा हूं। उधर भाग रहा हूं। तब इन्होंने बीच में यह रख लिया। तीनों चीज सोचिए आप। प्रोसेस कहां है इसमें? नेचुरल जस्टिस कहां है? समय कहां है? सोच कहां है? पार्टिसिपेशन कहां है? सबको साथ लेने की परमिशन कहां है। एक सरप्राइज एलिमेंट का खेल है। लुका छुपी हो रही है। आप छुप रहे हो मैं ढूंढ रहा हूं। मैं ढूंढ चुप रहा हूं आप छुप रहे हो। ये ज़िद की राजनीति है। ईगो की राजनीति है।

राजीव रंजन - इस बीच एसआईआर का चैप्टर अभी तक क्लोज हुआ नहीं है।

सिंघवी - एसआईआर क्लोज हो गया है और इसका एक बहुत दुखद प्रसंग बच गया है। बहुत दुखद प्रसंग है। टोटल आपने 12 स्टेट्स में 5 करोड़ 80 लाख नाम डिलीट हुए। उसमें एक बड़ा इंटरेस्टिंग फैक्ट छुप जाता है। वो 7 करोड़ हटे हैं और 2 करोड़ जुड़े हैं, तो हम उसको पांच कहते हैं।

ये पांच मिसलीडिंग फिगर है। पांच करोड़ 80 लाख वगैरह जो हट गए हैं आपने दो आपको हटा दिया इनको ऐड कर दिया। उससे आपको क्या राहत मिली? 7 करोड़ हटे हैं। बंगाल में एक करोड़ से थोड़ा कम हटाए गए हैं। देखिए इसका मूल प्रॉब्लम है कि चुनाव आयोग ने जान बूझकर हर प्रदेश में तीन महीने पहले ये प्रक्रिया शुरू की। कोई आपत्ति नहीं है एसआईआर के विरुद्ध। लेकिन एक साल पहले या आठ महीने पहले ये होनी चाहिए हर स्टेट में। उसका ये सबसे क्रूर उदाहरण दे रहा हूं मैं जानबूझ कर, क्यों आपने 91 हटाए, उसमें कई लोगों ने अपील फाइल करने की मांग की। एक अपील तो होती है ना। कोई भी चीज ऐसी नहीं हमारे एक्ट में, कोई एक्ट नहीं है कानून में जिसके तहत एक बार आदमी अपील न कर सके। आपकी पहली अपील अगर 50 लाख लोग भी कर रहे हैं, सबको कहा गया कि आप सुनेंगे, नोटिस देंगे, निर्णय देंगे और निर्णय में होल्ड करेंगे कि प्रशांत जी को गलत हराया गया है, लेकिन प्रशांत जी कृपया आप अगले इलेक्शन में वोट कर सकेंगे। इस इलेक्शन में नहीं करेंगे आप। ये बड़ा क्लेवर है। कूटनीति है ये। आपने बिहार में तीन महीने पहले क्यों किया? बताइए मेरे को।

राजीव रंजन श्रीवास्तव -- लेकिन ऐसे फिर लोकतंत्र जिंदा कैसे रहेगा फिर ये इस ढंग से तो सारे चुनाव ये जीत के आ जाएंगे..

सिंघवी - तो अब इसका तो यही है ये तो उच्चतम न्यायालय आ गया। तो कुछ हद तक कुछ लाख आंकड़े बच गए। अगर कोई अंकुश नहीं होता तो कुछ भी, एक भी चीज जो सुधरी नहीं सुधर सकती थी। ये द्वेष की भावना दिखाता है। अगर आप सच होते तो 90% जो चीजें कही है बिना आदेश के कर सकते थे आप। कि भाई हमने शुरू किया एसआईआर। हमको एसआईआर के दौरान ये तकलीफें दिखीं तो हम इसको सुधार कर लें। वो अप्रोच ही नहीं है। असम में क्या हुआ। देखिए, मैंने पवन खेड़ा का केस किया। मैं पेश हुआ। उनको जो अभी राहत मिली है कुछ समय के लिए मैंने दिलवाई।

तो उसके ऊपर मैं बात नहीं करूंगा। एक व्यापक मुद्दा है जिसके बारे में बहुत दुख है। देखिए, मेरा मानना है कि जो बेहूदापन माननीय मुख्यमंत्री ने दिखाया पिछले चुनाव के वक्त इस चुनाव में पिछले कई सालों से जब वो एक संवैधानिक पदासीन व्यक्ति हैं बेहूदापन बोलने में, बेहूदापन एक्शन लेने में.... कहीं भी अगर जाना है किसी भी पुलिस को तो असम पुलिस जाएगी। जिस प्रकार की अभद्र भाषा का प्रयोग किया है। मतलब मैं नहीं जानता कि इतिहास में कोई भी संवैधानिक पदासीन मुख्यमंत्री ने ऐसा किया हो। अब मेरा मुद्दा दूसरा है। मेरी टिप्पणी दूसरी है। 15 साल या 20 साल पहले तक अगर आप ऐसा करते तो आप चुनाव हारते।

आप चुनाव से, पद से हटते। ये दिखाता है हमारे इलेक्टोरल सिस्टम को। ये दुख के साथ कहना पड़ता है कि आज इन्हीं वक्तव्यों से वो जीत सकते हैं। और अगर वो जीतते हैं तो ये उनकी गलती मैं कम मानता हूं, हमारा माहौल, हमारी सोच, हमारा समाज कितना बदल गया ये भी सोचना चाहिए आज वही समाज आपको वोट देने को तैयार है इसलिए कि आप अभद्र ज्यादा हो। और वही समाज 15 - 20 साल पहले भारत यही था। तो यह नया भारत का जो आप निर्माण कर रहे हैं उसमें आपने सोच बदली है। आपकी सफलता है। लेकिन वो सोच जो बदली है वो नेगेटिव की तरफ बदली है।

(पूरा इंटरव्यू देखने के लिए डीबी लाइव के इस लिंक को क्लिक करें)


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