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पाकिस्तान ने आतंकी नेटवर्क का सहारा लिया

वाशिंगटन, अफगानिस्तान पर कूटनीतिक पकड़ कम होते देख पाकिस्तान पुराने ढर्रे पर लौटने की कोशिशों में जुट गया है। मुल्क ने चुनिंदा आतंकवादी समूहों को बर्दाश्त करने की रणनीति तैयार कर ली है। एक रिपोर्ट इसका संकेत देती है।

पाकिस्तान ने आतंकी नेटवर्क का सहारा लिया
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वाशिंगटन, अफगानिस्तान पर कूटनीतिक पकड़ कम होते देख पाकिस्तान पुराने ढर्रे पर लौटने की कोशिशों में जुट गया है। मुल्क ने चुनिंदा आतंकवादी समूहों को बर्दाश्त करने की रणनीति तैयार कर ली है। एक रिपोर्ट इसका संकेत देती है।

रिपोर्ट के मुताबिक आतंकवादी समूह 'इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रोविंस' (आईएसकेपी) का नेटवर्क खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान प्रांतों में अभी भी सक्रिय है। इनमें से कुछ समूह कथित तौर पर पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र के भीतर मौजूद कुछ लोगों के समर्थन या उन्हें 'बर्दाश्त' करने की वजह से बचे हुए हैं।

तालिबान ने पाकिस्तान पर आरोप लगाया है कि वह अपनी जमीन से आईएसकेपी को फलने-फूलने की इजाजत दे रहा है। आईएसकेपी नेता सनाउल्लाह गफारी की पाकिस्तान के अंदर कथित आतंकी कैंपों में आने जाने का हवाला दिया है। ऑनलाइन मैगजीन 'अमेरिकन थिंकर' की एक रिपोर्ट के अनुसार, जून में तालिबान ने दावा किया कि उन्होंने बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में उन जगहों पर हमले किए जो उनके आईएसकेपी से जुड़े थे।

रिपोर्ट में बताया गया है, "पाकिस्तान की लंबे समय से चली आ रही यह रणनीति कि अफगानिस्तान को उसके अपने सुरक्षा सिस्टम का ही एक हिस्सा माना जाए, अब फेल हो चुकी है। दशकों तक, पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी के नेताओं ने 'स्ट्रैटेजिक डेप्थ' (रणनीतिक गहराई) की नीति अपनाई। उनका मानना ​​था कि काबुल में अपनी सोच के अनुकूल सरकार होने से भारत के खिलाफ पाकिस्तान को अतिरिक्त जगह मिलेगी और पश्चिमी सीमा पर दुश्मनी का खतरा नहीं रहेगा। अब यह सोच गलत साबित हो चुकी है।"

रिपोर्ट में कहा गया, "जब अगस्त 2021 में तालिबान सत्ता में लौटा, तो पाकिस्तानी नेताओं को उम्मीद थी कि वे उनकी बात मानेंगे। वे चाहते थे कि तालिबान डूरंड लाइन को स्वीकार करे, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को दबाए और पाकिस्तानी व्यापार मार्गों और उनकी मदद पर निर्भर रहे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इसके बजाय, तालिबान ने अपनी आजादी को महत्व दिया। इस्लामाबाद और काबुल के बीच रिश्ते बिगड़ गए हैं और अब सीमा पर झड़पें, हवाई हमले, आर्थिक दबाव और आतंकवाद को समर्थन देने के आपसी आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं।"

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तानी अधिकारी अब टकराव वाला रुख अपना रहे हैं। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने फरवरी 2026 में कहा था कि "हमारे सब्र का बांध टूट चुका है" और खुली जंग शुरू हो गई है।

इसमें बताया गया है कि आईएसकेपी तालिबान का सबसे खतरनाक जिहादी दुश्मन बना हुआ है। जहां तालिबान का एजेंडा मुख्य रूप से अफगानिस्तान पर केंद्रित है, वहीं आईएसकेपी इस्लामिक स्टेट की अंतरराष्ट्रीय विचारधारा को मानता है और तालिबान को गैर-कानूनी मानता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2021 से तालिबान इस समूह के खिलाफ आक्रामक अभियान चला रहा है। इसलिए, अगर पाकिस्तान आईएसकेपी के प्रति कोई भी नरमी दिखाता है, तो इससे तालिबान की आतंकवाद-विरोधी कोशिशें कमजोर हो सकती हैं और एक सक्षम क्षेत्रीय आतंकवादी नेटवर्क का खतरा बढ़ सकता है।

'अमेरिकन थिंकर' ने बताया, "इस मुकाबले में वाखान कॉरिडोर एक मुख्य केंद्र बन गया है। जमीन की यह संकरी पट्टी अफगानिस्तान को चीन के शिनजियांग इलाके से सीधे जोड़ती है। चीन की ओर काबुल एक सड़क बना रहा है। मई 2026 में, अफगान अधिकारियों ने बताया कि रास्ते का लगभग 70 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है।"

रिपोर्ट में कहा गया है, "अगर यह कॉरिडोर चालू हो जाता है, तो अफगानिस्तान पाकिस्तानी इलाके पर निर्भर हुए बिना चीन के साथ व्यापार और सामान की आवाजाही कर सकेगा। इससे जमीन से घिरे अफगानिस्तान पर पाकिस्तान का पुराना दबदबा कम होगा और अफगानी सामान के लिए 'चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर' का महत्व भी शायद कम हो जाएगा।"

रिपोर्ट में दी गई जानकारी के मुताबिक, अफगानिस्तान के बदख्शान प्रांत और वाखान कॉरिडोर के आस-पास अस्थिरता से पाकिस्तान को लाभ हो सकता है। इससे बीजिंग को सीधी कनेक्टिविटी में देरी करने का बहाना मिल सकता है और चीन के मुख्य पश्चिमी सहयोगी के तौर पर पाकिस्तान की स्थिति बनी रह सकती है।


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