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बांग्लादेश में अल्पसंख्यक फंसाए जा रहे, लगाया जा रहा ईशनिंदा का आरोप

ढाका, बांग्लादेश में अल्पसंख्यक अधिकारों पर काम करने वाले एक प्रमुख संगठन ने शनिवार को चेतावनी दी कि देश में ईशनिंदा (ब्लासफेमी) के आरोपों का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के खिलाफ “हथियार” के रूप में किया जा रहा है।

बांग्लादेश में अल्पसंख्यक फंसाए जा रहे, लगाया जा रहा ईशनिंदा का आरोप
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ढाका, बांग्लादेश में अल्पसंख्यक अधिकारों पर काम करने वाले एक प्रमुख संगठन ने शनिवार को चेतावनी दी कि देश में ईशनिंदा (ब्लासफेमी) के आरोपों का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के खिलाफ “हथियार” के रूप में किया जा रहा है।

ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज (एचआरसीबीएम) ने कहा कि जनवरी से जून के बीच ऐसे 17 मामले दर्ज किए गए हैं, जो एक “खतरनाक पैटर्न” को दर्शाते हैं।

संगठन के अनुसार, "हाल ही में सुनामगंज जिले के ताहिरपुर उपजिला में हिंदू अल्पसंख्यक युवक दीप्तो राय पर लगाए गए ईशनिंदा के आरोप ने इस प्रवृत्ति को फिर उजागर किया है।"

संगठन ने कहा कि सोशल मीडिया पर आरोप सामने आते ही भीड़ जुट जाती है, पुलिस कार्रवाई करती है, और डिजिटल फोरेंसिक जांच पूरी होने से पहले ही आरोपी और उसके परिवार पर भारी सामाजिक दबाव बन जाता है।

एचआरसीबीएम ने पीड़ित परिवार और प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से कहा कि यह आरोप “झूठा और आधारहीन” था।

एफआईआर का हवाला देते हुए संगठन ने बताया कि मामले में सोशल मीडिया पोस्ट, पुलिस हिरासत, मोबाइल फोन जब्ती और साइबर कानून से जुड़े प्रावधान शामिल हैं, लेकिन गिरफ्तारी के समय यह स्पष्ट नहीं था कि संबंधित सामग्री वास्तव में आरोपी ने पोस्ट की थी या उसका नियंत्रण उसी के पास था।

संगठन ने कहा कि इस घटना के बाद आरोपी के परिवार, उनकी आजीविका और स्थानीय धार्मिक स्थल पर भी हमले और दबाव की स्थिति बनी।

एचआरसीबीएम ने कहा, “बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों के लिए यह अब कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि एक दोहराई जाने वाली सामाजिक हिंसा की प्रक्रिया बन गई है।”

संगठन ने दावा किया कि पिछले वर्ष भी ईशनिंदा के आरोपों में 73 अल्पसंख्यक युवाओं की गिरफ्तारी हुई थी।

एचआरसीबीएम ने कहा कि असली समस्या केवल आरोप नहीं है, बल्कि आरोप लगते ही सजा जैसा माहौल बन जाना है जबकि अदालत या फोरेंसिक जांच से पहले ही परिवारों, संपत्तियों और समुदायों को निशाना बनाया जाता है।

संगठन ने बांग्लादेश सरकार, पुलिस, न्यायपालिका, मानवाधिकार आयोग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से इस स्थिति को “राष्ट्रीय अल्पसंख्यक सुरक्षा आपातकाल” के रूप में देखने की अपील की।

उन्होंने कहा कि यदि यह चक्र नहीं तोड़ा गया, तो ईशनिंदा के आरोप अल्पसंख्यकों के लिए भय, विस्थापन और सामूहिक दमन का माध्यम बने रहेंगे।


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