मध्यावधि चुनाव में ट्रंप को सबक सिखाने को प्रवासी भारतीयों ने ठोंकी ताल, भारतीय हिस्सेदारी बढ़ाने का प्रयास
तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव में समुदाय की नजर केवल भारतीय मूल के उम्मीदवारों की जीत पर नहीं, बल्कि उन नेताओं को समर्थन देने पर भी है, जो भारतीय प्रवासियों के मुद्दों के प्रति सहानुभूति रखते हैं।

वॉशिंगटन: US midterm elections 2026: अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के बीच भारतीय-अमेरिकी समुदाय ने अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने की रणनीति पर काम तेज कर दिया है। तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव में समुदाय की नजर केवल भारतीय मूल के उम्मीदवारों की जीत पर नहीं, बल्कि उन नेताओं को समर्थन देने पर भी है, जो भारतीय प्रवासियों के मुद्दों के प्रति सहानुभूति रखते हैं। इस बदलाव को अमेरिकी सत्ता में अपनी भागीदारी मजबूत करने की व्यापक कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। भारतीय-अमेरिकी समुदाय के राजनीतिक नेताओं का मानना है कि अमेरिका में आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत मौजूदगी के बावजूद राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए अधिक एकजुटता जरूरी है। उनका कहना है कि उम्मीदवारों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण कई बार समुदाय की राजनीतिक ताकत का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। ऐसे में इस बार समर्थक उम्मीदवारों के पक्ष में संगठित होकर काम करने पर जोर दिया जा रहा है।
आपसी प्रतिस्पर्धा से प्रतिनिधित्व पर असर
कैलिफोर्निया और टेक्सास जैसे राज्यों में भारतीय-अमेरिकी समुदाय की मजबूत मौजूदगी है। इसके बावजूद निर्वाचित पदों पर समुदाय का प्रतिनिधित्व उसकी आबादी और राजनीतिक सक्रियता के अनुपात में बढ़ नहीं पाया है। समुदाय के एक नेता के मुताबिक, अतीत में कई भारतीय-अमेरिकी उम्मीदवार एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर चुके हैं। इससे उनके बीच वोटों का बंटवारा हुआ और जीतने वाले उम्मीदवारों की संख्या सीमित रह गई। इस अनुभव से सबक लेते हुए समुदाय के नेता अब व्यापक राजनीतिक गठजोड़ की जरूरत महसूस कर रहे हैं। उनकी कोशिश है कि भारतीय मूल के उम्मीदवारों के साथ उन अन्य नेताओं को भी समर्थन मिले, जो उनकी चिंताओं को अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में प्रभावी ढंग से उठा सकते हैं।
प्रतिनिधि सभा में घट सकती है भारतीय मूल के सांसदों की संख्या
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में मौजूदा कार्यकाल के दौरान भारतीय मूल के छह सदस्य रहे हैं। हालांकि, आगामी चुनावी मुकाबलों और प्राइमरी चुनावों के नतीजों के कारण यह संख्या घटकर चार रहने की आशंका जताई गई है। इलिनोइस से राजा कृष्णमूर्ति और मिशिगन से श्री थानेदार प्राइमरी चुनाव में जीत हासिल नहीं कर सके। वहीं, कैलिफोर्निया के 17वें निर्वाचन क्षेत्र से रो खन्ना, वाशिंगटन के सातवें क्षेत्र से प्रमिला जयपाल, कैलिफोर्निया के तीसरे क्षेत्र से एमी बेरा और वर्जीनिया के 10वें क्षेत्र से सुहास सुब्रमण्यम दोबारा चुनाव लड़ रहे हैं। इसके अतिरिक्त रिपब्लिकन नेता विवेक रामास्वामी ओहायो के गवर्नर पद के चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
मध्यावधि चुनाव से तय होगा कांग्रेस का समीकरण
अमेरिका में मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच आयोजित होते हैं। तीन नवंबर को होने वाले चुनाव में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 100 सीटों में से लगभग एक-तिहाई सीटों पर मतदान होना है। इसके साथ कई राज्यों में गवर्नर, विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के पदों के लिए भी चुनाव होंगे। इन चुनावों के नतीजे तय करेंगे कि अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में किस दल की स्थिति मजबूत होगी। इसका सीधा असर राष्ट्रपति की विधायी प्राथमिकताओं, सरकारी नीतियों और प्रस्तावित विधेयकों को पारित कराने की क्षमता पर पड़ सकता है। इसी वजह से भारतीय-अमेरिकी समुदाय के लिए यह चुनाव राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है।
समर्थकों को साथ लाने पर जोर
कैलिफोर्निया के हृदय रोग विशेषज्ञ और अमेरिकन्स4हिंदूज पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (पीएसी) के संस्थापक रोमेश जापरा ने कहा कि केवल भारतीय-अमेरिकी उम्मीदवारों का समर्थन करना पर्याप्त नहीं है। उनके मुताबिक, ऐसे उम्मीदवारों और नेताओं को भी साथ लाना चाहिए, जो भारतीय प्रवासियों के प्रति सकारात्मक रुख रखते हों। जापरा ने राजनीतिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि समुदाय को निर्णय लेने वाली मेज पर अपनी जगह बनानी होगी। उनका मानना है कि राजनीतिक रूप से संगठित नहीं होने पर समुदाय की चिंताओं और हितों को पर्याप्त महत्व नहीं मिल पाएगा।
स्थानीय मतदाताओं के मुद्दों पर भी ध्यान देने की सलाह
व्हाइट हाउस के पूर्व सलाहकार अजय जैन भूटोरिया ने भारतीय-अमेरिकी उम्मीदवारों को सलाह दी है कि वे केवल प्रवासी समुदाय से जुड़े मुद्दों तक सीमित न रहें। उनके अनुसार, उम्मीदवारों को उन निर्वाचन क्षेत्रों के सभी मतदाताओं की आकांक्षाओं, जरूरतों और प्राथमिकताओं को समझना चाहिए, जहां से वे चुनाव लड़ रहे हैं। कैलिफोर्निया, टेक्सास, न्यूजर्सी, न्यूयॉर्क, वाशिंगटन, इलिनोइस, पेनसिल्वेनिया और जॉर्जिया में भारतीय-अमेरिकी समुदाय की अच्छी मौजूदगी है। वहीं, जॉर्जिया, मिशिगन और नॉर्थ कैरोलाइना जैसे राज्यों में बेहद कम अंतर से भी चुनावी नतीजे बदल सकते हैं। ऐसे में समुदाय के संगठित मतदान और रणनीतिक समर्थन की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। कुल मिलाकर, भारतीय-अमेरिकी समुदाय इस मध्यावधि चुनाव को केवल अपने प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाने के अवसर के रूप में नहीं, बल्कि अमेरिकी राजनीति में दीर्घकालिक प्रभाव स्थापित करने की चुनौती के तौर पर देख रहा है। उम्मीदवारों के चयन, राजनीतिक गठजोड़ और स्थानीय मतदाताओं के मुद्दों पर ध्यान देने की रणनीति इस दिशा में निर्णायक साबित हो सकती है।


