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इलेक्शन : वोटों की गिनती में कांटे की टक्कर

नई दिल्ली, आइसलैंड में यूरोपीय संघ (ईयू) से जुड़ने की दिशा में अगला कदम उठाने को लेकर हुए जनमत संग्रह के वोटों की गिनती जारी है। शुरुआती रुझानों में दोनों पक्षों के बीच बेहद करीबी मुकाबला देखने को मिल रहा है।

इलेक्शन : वोटों की गिनती में कांटे की टक्कर
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नई दिल्ली, आइसलैंड में यूरोपीय संघ (ईयू) से जुड़ने की दिशा में अगला कदम उठाने को लेकर हुए जनमत संग्रह के वोटों की गिनती जारी है। शुरुआती रुझानों में दोनों पक्षों के बीच बेहद करीबी मुकाबला देखने को मिल रहा है।

इस जनमत संग्रह में लोगों से सीधे ईयू की सदस्यता पर फैसला करने के लिए नहीं कहा गया है। सवाल यह है कि क्या आइसलैंड को यूरोपीय संघ की सदस्यता के लिए लंबे समय से रुकी बातचीत फिर से शुरू करनी चाहिए। यानी ‘हां’ की जीत होने पर भी आइसलैंड तुरंत ईयू का सदस्य नहीं बनेगा, बल्कि ब्रसेल्स के साथ सदस्यता वार्ता का नया दौर शुरू होगा।

शुरुआती मतगणना में ‘हां’ और ‘नहीं’ के बीच अंतर बेहद कम रहा। स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 1.52 लाख वोटों की गिनती के बाद ‘नहीं’ पक्ष को 50.1 प्रतिशत और ईयू सदस्यता वार्ता दोबारा शुरू करने के पक्ष में पड़े वोटों को 49.9 प्रतिशत समर्थन मिला। ऐसे में अंतिम नतीजे को लेकर उत्सुकता बनी हुई है।

अपना वोट डालने के बाद प्रधानमंत्री क्रिस्त्रून फ्रॉस्टाडॉटिर ने मीडिया वेबसाइट 'एमबीएल डॉट आईएस' से बात की। उन्होंने कहा, “यह एक अच्छा दिन है। अब हम उस मोड़ पर पहुंच गए हैं जहां यह फैसला देश के हाथ में है। या तो हम इन बातचीत में शामिल हों, एक अच्छा समझौता करने की कोशिश करें और फिर देखें कि क्या होता है, या फिर यूरोपीय संघ के बारे में चर्चा को कुछ समय के लिए एक तरफ रख दें। मैं बस यह जानने के लिए उत्सुक हूं कि देश का क्या कहना है, मुझे पता है कि देश सही फैसला करेगा।”

आइसलैंड ने 2009 के वित्तीय संकट के बाद ईयू की सदस्यता के लिए आवेदन किया था। उस समय देश की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट से गुजर रही थी। हालांकि, बाद में राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और 2013 के बाद सदस्यता को लेकर बातचीत ठंडे बस्ते में चली गई।

अब एक बार फिर यह मुद्दा देश की राजनीति के केंद्र में है। समर्थकों का मानना है कि यूरोपीय संघ के साथ गहरे संबंध आइसलैंड को आर्थिक स्थिरता और बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल में मजबूती दे सकते हैं। वहीं विरोधी पक्ष का कहना है कि ईयू की सदस्यता से देश की स्वतंत्र आर्थिक नीतियों और महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों पर उसका नियंत्रण कमजोर हो सकता है।

इस बहस में मछली पालन सबसे बड़ा और संवेदनशील मुद्दा है। आइसलैंड की अर्थव्यवस्था और पहचान में मत्स्य उद्योग की अहम भूमिका है। ईयू में शामिल होने के विरोधियों को आशंका है कि यूरोपीय संघ की साझा मत्स्य नीति लागू होने से देश को अपने समुद्री संसाधनों और मछली पकड़ने के अधिकारों पर समझौता करना पड़ सकता है।

मतदान से पहले हुए सर्वेक्षणों में भी देश की जनता बंटी हुई नजर आई थी। कुछ सर्वेक्षणों में बातचीत दोबारा शुरू करने के विरोध में मामूली बढ़त दिखी, जबकि कुछ में समर्थक पक्ष आगे था। यही वजह है कि जनमत संग्रह के नतीजों को बेहद अहम माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री क्रिस्त्रून फ्रॉस्टाडॉटिर की सरकार ने कहा है कि वह जनता के फैसले का सम्मान करेगी। अगर ‘हां’ पक्ष जीतता है तो आइसलैंड और यूरोपीय संघ के रिश्तों में एक नया अध्याय शुरू हो सकता है। वहीं ‘नहीं’ की जीत देश के ईयू से दूरी बनाए रखने के मौजूदा रुख को मजबूती देगी।


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