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आखिर क्यों नहीं सुधर रही बिहार की चिकित्सा व्यवस्था

भारत सरकार की एसआरएस-2026 (सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम-2026) की रिपोर्ट से एक बार फिर बिहार की चिकित्सा व्यवस्था सवालों के घेरे में है. रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 67.8 प्रतिशत मौत की वजह चिकित्सा का अभाव या गलत इलाज है

आखिर क्यों नहीं सुधर रही बिहार की चिकित्सा व्यवस्था
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भारत सरकार की एसआरएस-2026 (सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम-2026) की रिपोर्ट से एक बार फिर बिहार की चिकित्सा व्यवस्था सवालों के घेरे में है. रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 67.8 प्रतिशत मौत की वजह चिकित्सा का अभाव या गलत इलाज है.

राज्य में डॉक्टरों और प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ की भी भारी कमी है. नीति आयोग के हेल्थ इंडेक्स में भी बड़े राज्यों की सूची में बिहार अमूमन निचले पायदान पर ही है. राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी भयावह है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानक प्रति एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर के मुकाबले राज्य में 17-28 हजार की आबादी पर एक डॉक्टर है.

राज्य में डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी है. नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी कहते हैं, ‘‘केवल इमारत बना देने और नियम सख्त करने से व्यवस्था में सुधार नहीं होगा. अभी भी ढांचागत बुनियादी सुविधाओं को मुहैया कराने की दिशा बहुत कुछ किया जाना शेष है. इसके बाद ही सुधार की अपेक्षा की जा सकती है.''

क्वैक पर निर्भरता बरकरार

बिहार में आज भी ग्रामीण इलाके में बड़ी आबादी उन अप्रशिक्षित चिकित्सकों के भरोसे है, जिन्हें झोलाछाप (क्वैक) कहा जाता है. सामाजिक कार्यकर्ता अमरेश कुमार तिवारी कहते हैं, ‘‘यह कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि ये क्वैक अगर नहीं होते तो ग्रामीण इलाकों में ज्यादा लोगों की जानें जातीं. ये प्राथमिक उपचार कर कई मामलों में स्थिति संभाल तो लेते ही है. हां, यह कमी जरूर है कि इनमें से कुछ मरीज की स्थिति बिगड़ने तक उन्हें विशेषज्ञ चिकित्सक के पास जाने की सलाह नहीं देते. जब वे कहते हैं तब तक स्थिति अनियंत्रित हो चुकी होती है.''

स्थिति अधिक बिगड़ जाने के कारण मरीज की जान चली जाती है. अगर, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में डॉक्टर रहते तो तो लोग क्वैक के पास क्यों जाते. फिर शहरों में चिकित्सा के साथ दूसरे खर्चे इतने अधिक हैं कि लोग गांव में ही किसी तरह इलाज करा लेना बेहतर समझते हैं.

ग्रामीण इलाके के अस्पतालों में डॉक्टरों की नियुक्ति तो की गई है, किंतु डॉक्टर वहां जाना नहीं चाहते. प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले डॉ. गौरव कहते हैं, ‘‘ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं, खासकर बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा के अभाव में चिकित्सक वहां रह कर ड्यूटी नहीं करना चाहते हैं. मरीज की स्थिति चाहे किसी भी वजह से ऊपर-नीचे हुई, निशाने पर डॉक्टर ही आ जाते हैं. जब पीएमसीएच जैसे बड़े अस्पताल में मारपीट की घटना हो जाती तो गांवों की स्थिति की कल्पना आप कर सकते हैं.''

संतुलित संसाधनों का है अभाव

राज्य सरकार स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारने की कोशिश कर रही है. डॉक्टर और स्टाफ की नियुक्तियां भी हुई हैं किंतु इन संसाधनों की वास्तविक स्थिति में संतुलन का अभाव है.

अमरेश कहते हैं, ‘‘सरकारी अस्पतालों के भवन बना दिए गए, एक्स-रे व अल्ट्रासाउंड जैसी मशीनें भी लग गईं, लेकिन टेक्नीशियन ही नहीं हैं या उनकी कमी है. जांच (डायग्नॉस्टिक) संबंधी सुविधाओं की स्थिति भी ठीक नहीं है.'' कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (सीएजी) की 2024 की रिपोर्ट भी इस बात की ओर इशारा करती है. इन सबके अलवा दवाओं की मुश्किल भी एक बड़ी समस्या है. पहले की अपेक्षा सरकारी अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता बढ़ी है. सभी तरह की दवाएं जब मिलने लगेंगी, तो निश्चय ही लोगों का भरोसा बढ़ेगा.

अमरेश कहते हैं, ‘‘अच्छी बात है कि हर जिले में मेडिकल कॉलेज व अस्पताल खोलने की दिशा में काम हो रहा है. सभी श्रेणी के चिकित्सकों, नर्स व पैरामेडिकल स्टाफ की नियुक्ति की जा रही है. आशा कार्यकर्ताओं के प्रयासों से संस्थागत प्रसव और टीकाकरण से मातृ व शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आई है.''

पीएचसी का सशक्त होना जरूरी

गांवों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधा से जुड़े सवाल पर प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाली डॉ. सुरभि ठाकुर कहती हैं, ‘‘पीएचसी को सशक्त-सुदृढ़ किए बिना स्थिति में अपेक्षित सुधार की कल्पना बेमानी है. राज्यभर में इन स्वास्थ्य केंद्रों पर एक्सीडेंट, हार्ट अटैक या जटिल प्रसव जैसे गंभीर मामलों में इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी. नर्सों और पॅरामेडिकल स्टाफ को एडवांस्ड ट्रेनिंग देकर इमरजेंसी की स्थिति में बेहतर फर्स्ट रिस्पांस के लिए तैयार किया जा सकता है.''

केवल गंभीर मरीजों को ही बड़े अस्पतालों में रेफर करने का सिस्टम बनाना होगा. कई जगह पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड में एमआरआई व सीटी स्कैन की सुविधा शुरू की गई है. इस व्यवस्था से आम लोगों की जेब पर बोझ कम हुआ है. इसका विस्तार होना चाहिए.

स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर बिहार सरकार ने कई स्तरों पर बड़े फैसले लिए हैं. 2026-27 के लिए राज्य का स्वास्थ्य बजट 21,270 करोड़ कर दिया गया है. साथ ही, इस साल के अंत तक 3200 नए हेल्थ सेंटर खोलने का लक्ष्य रखा गया है. चिकित्सकों सहित सभी स्वास्थ्य कर्मियों की सौ प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए बायोमीट्रिक अटेंडेंस की व्यवस्था की गई है. साथ ही, सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगा दी गई है.

सरकार की सख्ती पर डॉक्टरों से जुड़े संगठनों का कहना है कि डॉक्टरों को बलि का बकरा बनाने से स्थिति नहीं सुधरेगी. सरकार को डॉक्टरों की व्यावहारिक परेशानियों को ध्यान में रख कर नीतिगत निर्णय लेना चाहिए. बिहार मेडिकल सर्विसेज इंफ्रास्ट्रक्चर कारपोरेशन लिमिटेड को सप्लाई चेन को दुरुस्त करने के साथ समय पर दवाएं व दूसरी मशीनें उपलब्ध कराना होगा, इसके लिए सिस्टम को पारदर्शी बनाना होगा.


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