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जब दामाद के लिए दांव पर लगा दी जिंदगीभर की कमाई: यूसुफ हुसैन

नई दिल्ली, बॉलीवुड की दुनिया में कामयाबी की कई कहानियां हैं लेकिन कुछ किस्से ऐसे होते हैं, जो रिश्तों की अहमियत समझा जाते हैं।

जब दामाद के लिए दांव पर लगा दी जिंदगीभर की कमाई: यूसुफ हुसैन
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नई दिल्ली, बॉलीवुड की दुनिया में कामयाबी की कई कहानियां हैं लेकिन कुछ किस्से ऐसे होते हैं, जो रिश्तों की अहमियत समझा जाते हैं। ऐसी ही एक कहानी दिवंगत अभिनेता यूसुफ हुसैन की है, जिन्होंने अपनी जिंदगी में कई यादगार किरदार निभाए। पर्दे पर भले ही उन्हें ज्यादातर सहायक भूमिकाओं में देखा गया लेकिन असल जिंदगी में उन्होंने ऐसा काम किया, जिसे लोग हमेशा याद रखेंगे। जब उनके दामाद और फिल्म निर्देशक हंसल मेहता का करियर मुश्किल दौर से गुजर रहा था, तब यूसुफ हुसैन ने अपनी जिंदगीभर की जमा पूंजी दांव पर लगा दी। उनकी इस मदद से न सिर्फ एक फिल्म पूरी हुई बल्कि हंसल मेहता के करियर को भी नई दिशा मिली।

यूसुफ हुसैन का जन्म 21 जनवरी 1948 को हुआ था। उन्होंने अपनी जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखे। अभिनय की दुनिया में आने से पहले वह लखनऊ में कपड़ों का कारोबार करते थे।

यूसुफ हुसैन ने साल 2002 में आई फिल्म 'दिल चाहता है' में आमिर खान के पिता की भूमिका निभाई। इसके बाद उन्होंने 'धूम 2', 'कृष 3', 'ओएमजी : ओह माय गॉड' और 'रईस' जैसी फिल्मों में काम किया।

फिल्मों के अलावा यूसुफ टेलीविजन की दुनिया में भी सक्रिय रहे। वह 'सीआईडी' जैसे लोकप्रिय शो में नजर आए और 'कुमकुम : प्यारा सा बंधन' जैसे सीरियल के जरिए घर-घर तक पहुंचे।

यूसुफ हुसैन की जिंदगी का एक महत्वपूर्ण किस्सा उनके दामाद हंसल मेहता की फिल्म 'शाहिद' से जुड़ा है। यह फिल्म वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता शाहिद आजमी की जिंदगी पर आधारित थी। हंसल मेहता इस कहानी को बड़े पर्दे पर लाना चाहते थे, लेकिन फिल्म बनाना उनके लिए आसान नहीं रहा।

फिल्म की शुरुआती शूटिंग के दो शेड्यूल पूरे हो चुके थे। इसके बाद आर्थिक परेशानियों ने पूरी परियोजना को मुश्किल में डाल दिया। फिल्म को पूरा करने के लिए पैसों की जरूरत थी लेकिन इंतजाम नहीं हो पा रहा था। हंसल मेहता के सामने सवाल था कि आखिर वह फिल्म की बची हुई शूटिंग कैसे पूरी करें।

यह उनके करियर का बेहद कठिन दौर था। फिल्म अधूरी रह जाने का डर था और उन्हें लगने लगा था कि शायद उनका करियर भी खत्म हो सकता है। ऐसे समय में अक्सर लोग साथ छोड़ देते हैं लेकिन यूसुफ हुसैन ने अपने दामाद का हौसला टूटने नहीं दिया।

जब यूसुफ हुसैन को हंसल मेहता की परेशानी के बारे में पता चला, तो उन्होंने बिना देर किए उनकी मदद करने का फैसला किया। उन्होंने अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) की रकम इस्तेमाल करने की पेशकश की और हंसल को चेक सौंप दिया। उनकी मदद से फिल्म की बची हुई शूटिंग पूरी हो सकी। बाद में इस फिल्म के लिए हंसल मेहता को सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।


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