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टॉम अल्टर ने अभिनय में भी रच दिया इतिहास

नई दिल्ली, टॉम अल्टर का जन्म 22 जून 1950 को मसूरी में हुआ। उनके दादा-दादी एम्मेट और मार्था अल्टर नवंबर 1916 में अमेरिका के ओहियो से बतौर ईसाई मिशनरी भारत आए थे। 1947 के विभाजन ने इस परिवार को भी बांट दिया।

टॉम अल्टर ने अभिनय में भी रच दिया इतिहास
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नई दिल्ली, टॉम अल्टर का जन्म 22 जून 1950 को मसूरी में हुआ। उनके दादा-दादी एम्मेट और मार्था अल्टर नवंबर 1916 में अमेरिका के ओहियो से बतौर ईसाई मिशनरी भारत आए थे। 1947 के विभाजन ने इस परिवार को भी बांट दिया। दादा-दादी नवनिर्मित पाकिस्तान के लाहौर में ही रह गए जबकि टॉम अल्टर के माता-पिता भारत आ गए और मसूरी के पास राजपुर में बस गए।

फिल्म 'आराधना' की प्रेरणा ने उन्हें पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (एफटीआईआई) पहुंचाया, जहां से वे 1974 में अभिनय का स्वर्ण पदक लेकर निकले। मुंबई की फिल्मी दुनिया ने उनकी गोरी रंगत को देखकर उन्हें 'विदेशी खलनायक' या 'ब्रिटिश अधिकारी' के सांचे में ढालने की कोशिश की लेकिन टॉम अल्टर ने अपनी संवाद अदायगी और शुद्ध हिंदी-उर्दू के दम पर इन किरदारों को एक अभूतपूर्व मानवीय गरिमा दी।

सत्यजीत रे की मास्टरपीस 'शतरंज के खिलाड़ी' (1977) में कैप्टन वेस्टन के रूप में अवध की तहजीब और शायरी से प्यार करने वाले अंग्रेज अफसर का उनका किरदार हो या फिर 'क्रांति' (1981) और 'गांधी' (1982) के ऐतिहासिक रोल, टॉम अल्टर ने हर जगह अपनी अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने 'परिंदा' (1989) में खूंखार अंडरवर्ल्ड डॉन मूसा और 'राम तेरी गंगा मैली' (1985) में एक ठेठ भारतीय ग्रामीण करम सिंह की भूमिका निभाई।

साल 1977 में उन्होंने नसीरुद्दीन शाह और बेंजामिन गिलानी के साथ मिलकर 'मॉटली' थियेटर ग्रुप की शुरुआत की। 29 जुलाई 1979 को पृथ्वी थिएटर में प्रदर्शित नाटक 'वेटिंग फॉर गोडोट' में उनके द्वारा निभाया गया 'लकी' का मूक किरदार आज भी भारतीय थियेटर का एक मील का पत्थर है।

टॉम अल्टर खेल के भी उतने ही दीवाने थे। 1983 में भारत के ऐतिहासिक विश्व कप जीतने के तुरंत बाद उन्होंने दिग्गज सुनील गावस्कर के नेतृत्व वाली 'इंडियन इलेवन' की तरफ से अमेरिका में एक प्रदर्शनी मैच खेला और एक विकेट भी चटकाया।

बतौर खेल पत्रकार टॉम अल्टर के नाम एक ऐसा ऐतिहासिक गौरव दर्ज है जिसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। 19 जनवरी 1989 को बंबई के सीसीआई नेट्स पर उन्होंने ही दुनिया के सामने मात्र 15 वर्ष के एक शर्मीले और घुंघराले बालों वाले लड़के का पहला टीवी वीडियो इंटरव्यू लिया था। वह लड़का कोई और नहीं बल्कि भावी क्रिकेट सम्राट सचिन तेंदुलकर था।

टेलीविजन के सुनहरे दौर में टॉम अल्टर घर-घर में लोकप्रिय हुए। 'जबान संभाल के' के चार्ल्स स्पेंसर्स, 'जुनून' के खतरनाक केशव कालसी और बच्चों के पसंदीदा धारावाहिक 'शक्तिमान' के 'महागुरु' के रूप में उन्होंने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया।

साल 2016 में टॉम को त्वचा के दुर्लभ और आक्रामक कैंसर (स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा) का पता चला। उन्होंने कैंसर के चौथे चरण में भी मार्च 2017 में अपने नाटक 'संस ऑफ बाबर' का मंचन किया। 29 सितंबर 2017 को इस महान फनकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया।


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