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कभी थीं रंगू दीवान... फिर बनीं सिनेमा की सुलोचना, एक नाम जिसने मां के किरदार को किया अमर

मुंबई, हिंदी और मराठी सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री सुलोचना लाटकर का नाम आते ही आंखों के सामने एक मां की तस्वीर उभर आती है। पर्दे पर उन्होंने अमिताभ बच्चन से लेकर धर्मेंद्र और राजेश खन्ना तक, बड़े-बड़े सितारों की मां बनकर दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई।

कभी थीं रंगू दीवान... फिर बनीं सिनेमा की सुलोचना, एक नाम जिसने मां के किरदार को किया अमर
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मुंबई, हिंदी और मराठी सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री सुलोचना लाटकर का नाम आते ही आंखों के सामने एक मां की तस्वीर उभर आती है। पर्दे पर उन्होंने अमिताभ बच्चन से लेकर धर्मेंद्र और राजेश खन्ना तक, बड़े-बड़े सितारों की मां बनकर दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई। इस मशहूर नाम के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। जिस नाम से दुनिया उन्हें जानती है, वह उनके जन्म का नाम नहीं था।

कभी वह फिल्मी दुनिया में रंगू दीवान के नाम से जानी जाती थीं। फिर एक फिल्मकार की नजर पड़ी और उन्हें एक नया नाम मिला... ऐसा नाम जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा की पहचान बन गया।

30 जुलाई 1928 को कर्नाटक के बेलगावी जिले में जन्मी रंगू शंकरराव दीवान का बचपन आसान नहीं था। पिता शंकरराव दीवान पुलिस विभाग में थे, लेकिन कम उम्र में ही माता-पिता का साया उठ गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी मौसी ने किया। परिवार की परिस्थितियों के कारण उनकी पढ़ाई ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकी और उन्होंने सिर्फ चौथी कक्षा तक शिक्षा हासिल की। लेकिन बचपन से ही उन्हें फिल्मों में काफी दिलचस्पी थी। यही सपना उन्हें कोल्हापुर की फिल्मी दुनिया तक ले गया। उस दौर में फिल्मों में काम करना आसान नहीं था। उन्होंने छोटे स्तर से शुरुआत की।

मास्टर विनायक की प्रफुल्ल पिक्चर्स में उन्हें काम मिला और इसके बाद वह जयप्रभा स्टूडियो से जुड़ीं। उन्होंने छोटे-छोटे किरदारों से अपनी जगह बनानी शुरू की। उस समय उनका नाम रंगू दीवान था। उन्होंने शुरुआती दौर में 'महारथी कर्ण' और 'वाल्मीकि' जैसी फिल्मों में छोटे रोल किए। लेकिन, उनकी किस्मत एक नाम से बदलने वाली थी। मशहूर निर्देशक भालजी पेंढारकर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। साल 1949 में आई मराठी फिल्म 'सासुरवास' के दौरान उन्होंने रंगू दीवान को नया नाम दिया... सुलोचना। यह नाम उनकी पहचान बन गया।

इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मराठी फिल्मों में उन्होंने पहले बतौर लीड एक्ट्रेस अपनी मजबूत पहचान बनाई। 'मीठ भाकर', 'वहिनींच्या बांगड्या', 'धाकटी जाऊ' और 'सांगत्ये ऐका' जैसी फिल्मों ने उन्हें बड़ी स्टार बना दिया। इसके बाद उन्होंने हिंदी फिल्मों का रुख किया। शुरुआत में उन्होंने कई अलग-अलग तरह के किरदार निभाए, लेकिन समय के साथ मां की भूमिका उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई।

सुलोचना ने अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, राजेश खन्ना, देव आनंद, सुनील दत्त, दिलीप कुमार और कई बड़े कलाकारों की मां का किरदार निभाया। 'दिल देकर देखो', 'बंदिनी', 'देवर', 'जॉनी मेरा नाम', 'कटी पतंग', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'मजबूर' और 'आजाद' जैसी फिल्मों में उनका अभिनय आज भी याद किया जाता है। खास बात यह भी है कि सुलोचना ने जिन कलाकारों की मां का किरदार निभाया, उनके साथ उनका रिश्ता सिर्फ पर्दे तक सीमित नहीं रहा। अमिताभ बच्चन के 75वें जन्मदिन पर उन्होंने उन्हें हाथ से लिखा एक पत्र भेजा था, जिसमें उन्होंने उन्हें बेटा कहकर संबोधित किया था।

करीब छह दशक के करियर में सुलोचना ने 300 हिंदी और मराठी फिल्मों में काम किया। उनके योगदान के लिए उन्हें कई बड़े सम्मानों से नवाजा गया। साल 1999 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। साल 2004 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला, जबकि 2009 में महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें महाराष्ट्र भूषण सम्मान दिया।


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