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एल. वी. प्रसाद: अभिनय से निर्देशन तक का सफर 'गृह प्रवेशम' से रचा सिनेमा का इतिहास

मुंबई, भारतीय सिनेमा में एल. वी. प्रसाद ऐसे ही फिल्मकार थे, जिन्होंने अभिनय से शुरुआत की, संघर्षों से गुजरे और फिर निर्देशन की दुनिया में मुकाम बनाया। उन्हें सिनेमा के सबसे बड़े सम्मानों में से एक दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 22 जून 1994 को उन्होंने आखिरी सांस ली।

एल. वी. प्रसाद: अभिनय से निर्देशन तक का सफर गृह प्रवेशम से रचा सिनेमा का इतिहास
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मुंबई, भारतीय सिनेमा में एल. वी. प्रसाद ऐसे ही फिल्मकार थे, जिन्होंने अभिनय से शुरुआत की, संघर्षों से गुजरे और फिर निर्देशन की दुनिया में मुकाम बनाया। उन्हें सिनेमा के सबसे बड़े सम्मानों में से एक दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 22 जून 1994 को उन्होंने आखिरी सांस ली। उनके करियर की दिलचस्प बात यह थी कि उनका निर्देशक बनने का सफर किसी प्लानिंग के तहत शुरू नहीं हुआ था, बल्कि एक फिल्म के दौरान बने हालातों ने उन्हें निर्देशक की कुर्सी तक पहुंचा दिया।

एल. वी. प्रसाद का जन्म 17 जनवरी 1907 को आंध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी जिले के सोमवरप्पाडु गांव में हुआ था। उनका असली नाम अक्कीनेनी लक्ष्मी वारा प्रसाद राव था। वे एक किसान परिवार से आते थे। बचपन से ही वे काफी समझदार थे, लेकिन पढ़ाई में उनका मन ज्यादा नहीं लगता था। उन्हें नाटक, अभिनय और फिल्मों की दुनिया अपनी ओर खींचती थी। कम उम्र में ही उन्होंने अभिनय और रंगमंच की तरफ रुचि दिखानी शुरू कर दी थी।

परिवार की आर्थिक हालत खराब होने के बाद उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव आया। उनके पिता कर्ज में डूब गए थे और परिवार को मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इसके बाद एल. वी. प्रसाद ने फिल्मी दुनिया में अपनी किस्मत आजमाने का फैसला किया और मुंबई पहुंच गए।

यहां उन्हें वीनस फिल्म कंपनी में काम मिला। बाद में वह इंपीरियल फिल्म कंपनी का हिस्सा बने, जहां उन्हें अभिनय का मौका मिला। साल 1931 में उन्होंने भारत की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' में काम किया। इसके बाद वे पहली तमिल-तेलुगु द्विभाषी 'टॉकी कालिदास' और पहली तेलुगु टॉकी 'भक्त प्रह्लाद' में भी नजर आए।

फिल्मों में काम करते-करते उनकी दिलचस्पी निर्देशन की तरफ बढ़ने लगी। शुरुआत में वे सहायक निर्देशक के तौर पर काम करने लगे। इसी दौरान साल 1943 में उन्हें फिल्म 'गृह प्रवेशम' में सहायक निर्देशक की जिम्मेदारी मिली, लेकिन फिल्म के निर्माण के दौरान परिस्थितियां ऐसी बनीं कि एल. वी. प्रसाद को ही निर्देशन की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। इतना ही नहीं उन्होंने इस फिल्म में अभिनय भी किया। साल 1946 में रिलीज हुई यह फिल्म सफल रही और यहीं से बतौर निर्देशक उनकी पहचान बननी शुरू हुई।

इसके बाद एल. वी. प्रसाद ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। साल 1949 में उन्होंने फिल्म 'माना देसम' का निर्देशन किया। साल 1950 में आई फिल्म 'शावुकारु' ने उन्हें एक सफल निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया। इसी साल आई 'संसारम' फिल्म में एन. टी. रामाराव और अक्किनेनी नागेश्वर राव साथ नजर आए, और यह फिल्म काफी लोकप्रिय हुई।

एल. वी. प्रसाद ने सिर्फ तेलुगु सिनेमा में ही नहीं, बल्कि हिंदी और तमिल फिल्मों में भी अपनी पहचान बनाई। उन्होंने 'मनोहरा' जैसी चर्चित फिल्म बनाई, जिसमें शिवाजी गणेशन ने अभिनय किया था। हिंदी फिल्मों में उनकी पहचान 'छोटी बहन', 'मिलन', 'खिलौना', 'जीने की राह' और 'एक दूजे के लिए' जैसी फिल्मों से बनी।

फिल्म निर्देशन के साथ-साथ उन्होंने साल 1956 में प्रसाद प्रोडक्शंस की स्थापना की। आगे चलकर प्रसाद स्टूडियो, फिल्म लैब्स और एल. वी. प्रसाद आई इंस्टीट्यूट जैसे संस्थान भी शुरू किए।

साल 1980 में उन्हें रघुपति वेंकैया पुरस्कार मिला और साल 1982 में भारत सरकार ने उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया।


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