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'शोला जो भड़के' फेम भगवान दादा से डांस सीखते थे अमिताभ और गोविंदा

नई दिल्ली, 1 अगस्त 1913 को महाराष्ट्र के अमरावती में जन्मे भगवान आबाजी पालव का बचपन बेहद गरीबी में बीता। उनके पिता मुंबई की एक कपड़ा मिल में काम करते थे और भगवान आबाजी पालव ने भी अपने जीवन की शुरुआत एक मिल मजदूर के रूप में ही की थी। मूक फिल्मों के दौर में उन्होंने मात्र एक जूनियर आर्टिस्ट के रूप में सिनेमा जगत में अपना पहला कदम रखा।

शोला जो भड़के फेम भगवान दादा से डांस सीखते थे अमिताभ और गोविंदा
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नई दिल्ली, 1 अगस्त 1913 को महाराष्ट्र के अमरावती में जन्मे भगवान आबाजी पालव का बचपन बेहद गरीबी में बीता। उनके पिता मुंबई की एक कपड़ा मिल में काम करते थे और भगवान आबाजी पालव ने भी अपने जीवन की शुरुआत एक मिल मजदूर के रूप में ही की थी। मूक फिल्मों के दौर में उन्होंने मात्र एक जूनियर आर्टिस्ट के रूप में सिनेमा जगत में अपना पहला कदम रखा।

भगवान दादा को कुश्ती का बहुत शौक था, और अपनी इसी सुडौल कद-काठी के कारण उन्होंने स्टंट फिल्मों में काम करना शुरू किया। शुरुआती दिनों में वह 65,000 रुपए के बेहद कम बजट में फिल्में बनाते थे, जिनमें कलाकारों के लिए भोजन और वेशभूषा की व्यवस्था भी वह स्वयं ही करते थे। काम के प्रति उनका समर्पण ऐसा था कि लगातार कई घंटों तक कड़क रोशनी में शूटिंग करने के कारण वह सेट पर खड़े-खड़े ही सोने की कला सीख गए थे।

भारतीय सिनेमा में भगवान दादा के योगदान को उनकी प्रमुख फिल्मों से समझा जा सकता है। 1938 में 'बहादुर किसान' से उन्होंने सह निर्देशक के रूप में शुरुआत की। 1941 की तमिल फिल्म 'वन मोहिनी' ने उन्हें पहचान दी। 1949 की 'भेदी बंगला' सस्पेंस-हॉरर का अनूठा प्रयोग थी। 1951 की 'अलबेला' ब्लॉकबस्टर रही। 1953 में 'झमेला' आई और 1958 में 'भला आदमी' से उन्होंने आनंद बख्शी को पहला ब्रेक दिया।

1951 में राज कपूर की सलाह पर उन्होंने एक सामाजिक फिल्म 'अलबेला' बनाई। सी. रामचंद्र के संगीत से सजा इसका गीत 'शोला जो भड़के' और भगवान दादा का डांसिंग स्टाइल पूरे देश में मशहूर हो गया। उनके इसी बेफिक्र डांसिंग स्टाइल से बाद में अमिताभ बच्चन, गोविंदा और ऋषि कपूर जैसे दिग्गज सितारे भी प्रेरित हुए। 'अलबेला' की सफलता ने भगवान दादा को रातों-रात प्रसिद्धि दिलाई। उन्होंने कई नए कलाकारों को भी मौका दिया। मशहूर गीतकार आनंद बख्शी को उनका पहला ब्रेक भगवान दादा ने ही अपनी फिल्म 'भला आदमी' (1958) में दिया था।

'अलबेला' के बाद उनकी 'झमेला' (1953) बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप रहीं। जीवन के अंतिम वर्षों में गुजारा करने के लिए उन्होंने फिल्मों में एक-एक सीन के छोटे-मोटे रोल भी किए। दिलीप कुमार, सी. रामचंद्र और ओम प्रकाश अक्सर उनसे मिलने चॉल में जाते थे। ऐसा कहा जाता है कि इंडस्ट्री में उनके प्रति सम्मान का आलम यह था कि एक बार एक गाने की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन भी उनके कहने पर बिना किसी शिकायत के अपनी शिफ्ट खत्म होने के बावजूद रुके रहे थे।

सिनेमा के इस महान और अलबेले सितारे ने 4 फरवरी 2002 को दिल का दौरा पड़ने से दादर की चॉल में अपनी अंतिम सांस ली। साल 2016 में उनके संघर्षपूर्ण जीवन पर आधारित एक मराठी बायोपिक 'एक अलबेला' रिलीज हुई, जिसमें मंगेश देसाई ने उनका जीवंत किरदार निभाया।


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