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पूरा हुआ अविश्वास प्रस्ताव का मकसद

बुधवार, 11 मार्च को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने के लिए लाया गया विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव ध्वनिमत से गिर गया, गिरना ही था

पूरा हुआ अविश्वास प्रस्ताव का मकसद
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बुधवार, 11 मार्च को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने के लिए लाया गया विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव ध्वनिमत से गिर गया, गिरना ही था। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। विपक्ष भी इस बात को जानता था कि यह प्रस्ताव सफल नहीं होगा। लेकिन जिस उद्देश्य से विपक्ष ने इस प्रस्ताव को पेश किया, उसमें काफी हद तक उसे सफलता मिल गई है। लोकसभा में अध्यक्ष की आसंदी दलगत राजनीति से ऊपर होती है और उसकी निगाह में पक्ष-विपक्ष का महत्व एक समान होता है। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि लोकसभा की कार्रवाई में पक्षपात न रहे। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सांसदों को जनता ही चुनकर भेजती है, इसलिए दोनों की आवाज को बराबरी से स्थान मिले, यह जरूरी है। अगर विपक्ष की आवाज को दबाया जाए और बहुमत के कारण सारे फैसले सत्ता पक्ष के हक में लिए जाएं, तो यह केवल विपक्षी सांसदों के साथ अन्याय नहीं है, बल्कि उनके क्षेत्र के करोड़ों मतदाताओं के साथ नाइंसाफी है। अगर जनता के साथ नाइंसाफी होती है, तो फिर लोकतंत्र ही अपना अर्थ खो देता है। इस अर्थ को बचाने के लिए बजट सत्र के पहले चरण में विपक्ष ने ओम बिड़ला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था।

विपक्ष के लिए शायद यही आखिरी रास्ता भी बचा था कि किसी तरह अपनी बात को आधिकारिक तौर पर दर्ज करा सके। ध्यान रहे कि संसद सत्र के पहले चरण में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने ही नहीं दिया गया। पहले जनरल मनोज नरवणे की किताब के जिक्र पर उन्हें बोलने से रोका गया और नेता प्रतिपक्ष के भाषण के बिना ही राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित कर दिया गया। इसके बाद एपस्टीन फाइल्स के जिक्र पर फिर से राहुल गांधी की बात को दबाया गया। उनके साथ-साथ कई और सांसदों को बोलने से रोका गया। इन सब में बार-बार निगाहें ओम बिड़ला की तरफ ही जाती थीं कि वे नीर-क्षीर विवेक से निर्णय लेंगे, लेकिन उन्होंने भी संसदीय नियमों का हवाला देते हुए बार-बार विपक्ष को ही टोका। हद तो तब हो गई जब लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्ष की महिला सांसदों पर आरोप लगाया कि वे प्रधानमंत्री की कुर्सी के सामने आ गई थीं और इससे प्रधानमंत्री को खतरा था, लिहाजा उन्होंने नरेन्द्र मोदी को सदन में आने से मना कर दिया।

संसदीय इतिहास में कई बार अमर्यादित आचरण हुए हैं, जिनसे संसद शर्मसार हुई है। लेकिन प्रधानमंत्री को तीन-चार महिला सांसदों से सदन के भीतर खतरा उत्पन्न हुआ, ऐसा वाकया कभी नहीं हुआ। इस बार भी ऐसा कुछ नहीं हुआ, लेकिन जनता का भटकाने अथवा मुद्दों पर चर्चा से बचने के लिए शायद इसे बहाना बनाया गया। जब ऐसी बहानेबाजी बढ़ने लगी और विपक्ष के साथ टोका-टाकी कर केवल सत्ता पक्ष की मनमानी होने दी गई, तो फिर अविश्वास प्रस्ताव लाने के अलावा विपक्ष के पास कोई चारा ही नहीं बचा। हालांकि इस प्रस्ताव पर मंगलवार से जो चर्चा हुई, उसमें फिर से राहुल गांधी, इंदिरा गांधी, पं.नेहरू पर आरोपों की झड़ी लगाई गई, तो सवाल उठा कि आखिर अविश्वास प्रस्ताव गांधी-नेहरू परिवार के खिलाफ था या ओम बिड़ला के खिलाफ।

बता दें कि इस पर चर्चा के दौरान किरण रिजीजू और अमित शाह जैसे नेताओं ने जो बातें कहीं, उन पर विपक्ष ने फिर विरोध प्रदर्शन किया और इस के बीच ही आसंदी पर बैठे जगदंबिका पाल ने ध्वनिमत कराया जिसमें ये प्रस्ताव गिर गया। गौरतलब है कि लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए 118 विपक्षी सांसदों के समर्थन से अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था, यह कोई छोटी संख्या नहीं है। विपक्षी सांसदों का दावा था कि ओम बिड़ला ने 'पक्षपातपूर्ण व्यवहार' दिखाया है और उनका कार्यालय अपेक्षित निष्पक्षता बनाए रखने में विफल रहा है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चर्चा शुरु होने से एक दिन पहले ही एक वीडियो संदेश में ओम बिड़ला की तारीफ कर बता दिया कि वे उनका हर हाल में बचाव करेंगे। वहीं अमित शाह ने कहा कि, 'क़रीब चार दशक के बाद एक बार फिर से लोकसभा अध्यक्ष के सामने अविश्वास प्रस्ताव आया है। यह संसदीय राजनीति और सदन दोनों के लिए अफ़सोसजनक घटना है। स्पीकर का पद पार्टी से ऊपर उठाकर संविधान ने उस पद को एक तरह से मध्यस्थ की भूमिका में रखा है। आपने (विपक्ष) मध्यस्थता करने वालों पर ही शंका के बादल उठा दिए। हम भी विपक्ष में रहे लेकिन कभी भी बीजेपी और एनडीए लोकसभा स्पीकर के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया। हमने स्पीकर के पद की गरिमा का संरक्षण करने का काम किया। इसके बाद आदतन वे राहुल गांधी पर बोलने लगे और कहा कि फ्लाइंग किस करोगे, आंख मटकाओगे, ऐसा कभी नहीं हुआ। अध्यक्ष के आचरण पर सवाल उठा रहे हो। ये किस तरह से आचरण की बात करते हैं। हालांकि, इस पर विपक्ष ने जोरदार हंगामा किया तो अमित शाह ने कहा कि ऐसा कोई शब्द हो जो असंसदीय हो, तो उसे कार्यवाही से हटा सकते हैं।

अपने बयान में अमित शाह ने धड़ल्ले से साला अपशब्द का भी इस्तेमाल किया, इससे पहले दिसंबर 2025 में भी वे सदन के भीतर साला बोल चुके हैं। तो राहुल गांधी को आचरण की सीख देने वाले अमित शाह के आचरण पर ओम बिड़ला और नरेन्द्र मोदी क्या कहते हैं, इसका इंतजार है, क्योंकि अब तक तो इन दोनों ने इस पर न अफसोस न आपत्ति दर्ज कराई है। तो क्या मौन इनके स्वीकार का लक्षण है।

बहरहाल अमित शाह ने सत्र के दौरान राहुल की विदेश यात्रा पर भी सवाल उठाए, जबकि वे जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी भी चलती संसद को छोड़कर विदेश गए और जब देश में रहे, तब भी अहम चर्चाओं में शामिल नहीं हुए। वैसे भी अविश्वास प्रस्ताव ओम बिड़ला के खिलाफ था, तो उस पर बात होनी थी, लेकिन उन्हें तो निंदा से परे बताने का काम अमित शाह पहले ही कर चुके हैं। वैसे कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि यह प्रस्ताव व्यक्तिगत रूप से स्पीकर को निशाना बनाने के लिए नहीं, बल्कि संसद की गरिमा की रक्षा के लिए लाया गया है। वहीं राहुल गांधी ने भी कहा कि यह सदन भारत के लोगों की अभिव्यक्ति है। यह सदन किसी एक पार्टी का नहीं है, यह पूरे देश का प्रतिनिधित्व करता है। जब भी हम बोलने के लिए उठते हैं, हमें बोलने से रोक दिया जाता है।

तो अविश्वास प्रस्ताव भले गिर गया, लेकिन इसका मकसद पूरा हो गया है।


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