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मोदी के भाषण में गायब छात्र

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषणों और बयानों को सुनकर ऐसा आभास होने लगा है कि उनके दिलों दिमाग पर सत्ता खोने का डर बुरी तरह छा गया है

मोदी के भाषण में गायब छात्र
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषणों और बयानों को सुनकर ऐसा आभास होने लगा है कि उनके दिलों दिमाग पर सत्ता खोने का डर बुरी तरह छा गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार को दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह में छात्रों को संबोधित किया। उनकी कोशिश थी कि इंस्टाग्राम रील बनाकर जिस जेन ज़ी को अपने साथ न किया जा सका, कम से कम उसे आमने-सामने संबोधित कर प्रभावित किया जाए। लेकिन वहां भी मोदी नाकाम दिखे। उन्होंने इस संस्थान के पूर्व छात्रों को जेन ज़ी की भाषा में ओजी यानी ओरिजनल गैंग्स्टर बताया और कहा कि वे धुरंधर भले न हों, पर दुनियाभर में धूम तो मचाई है। यह बात समझ से परे है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति किस तरह इतने हल्के अंदाज में बात कर सकता है। मोदी को तो किसी भी तरह राहुल गांधी से होड़ करनी है। लेकिन मोदी भूल रहे हैं कि राहुल गांधी अपनी भाषा का स्तर नहीं गिराते, कोई छिछोरेपन की बात युवाओं से नहीं करते। बल्कि वे छात्रों से जुड़ने के लिए सीधा संवाद करते हैं। छात्रों की गूंज हो या फिर कोई और मंच राहुल के साथ अपने विचार साझा करने के लिए युवाओं में उत्साह देखा जाता है, जो मोदी के कार्यक्रमों में नदारद रहता है।

इसलिए शायद जब मोदी एसआरसीसी गए तो मेट्रो से सफर किया, कुछ वीडियो आए हैं, जिसमें वो छोटे बच्चों यानी जेन अल्फा से बात कर रहे हैं, लेकिन क्या बात कर रहे हैं, यह पता नहीं क्योंकि वीडियो से आवाज हटा दी गई है। अगर मोदी को आम लोगों की तरह खुद को दिखाने का शौक है तो फिर उन्हें अपने प्रचार के तरीके भी बदलने पड़ेंगे। खैर मोदी जब एसआरसीसी पहुंचे तो उनका पूरा भाषण चुनावी अंदाज में राहुल गांधी, पिछली कांग्रेस सरकार और बाकी विपक्ष पर हमले में बीता। प्रधानमंत्री मोदी ने इस बार स्वतंत्रता दिवस भाषण में इस्तेमाल किए गए 'दिमागी नक्सल' शब्द को दोहराया और कहा कि लाल किले से उन्होंने इस नाम की जैसे ही 'होम्योपैथी की गोली' दी, वैसे ही देश में मौजूद 'दिमागी नक्सल' एक-एक करके सामने आने लगे। वहीं मोदी ने राहुल के छात्र संवाद अभियान 'छात्रों की गूंज' पर भी तंज कसते हुए उसे 'झूठ की गूंज' करार दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें विश्वास है कि ''सच की हुंकार के आगे झूठ की गूंज टिक नहीं सकेगी।

लेकिन समस्या ये है कि मोदी तय नहीं कर सकते हैं कि सच क्या है और झूठ क्या। यह तो देश की जनता देख रही है कि मोदी की प्राथमिकताओं में छात्र कहीं हैं ही नहीं। अगर होते तो न जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की जरूरत पड़ती और न दिल्ली से लेकर बिहार तक छात्रों पर पुलिस अत्याचार की खौफनाक कहानियां सामने आतीं। राहुल गांधी को भी छात्रों की गूंज करने की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन अब इसी कार्यक्रम को लेकर नरेन्द्र मोदी की बौखलाहट कई तरह से सामने आ रही है। जब कोटा में पहली बार राहुल गांधी ने छात्रों की गूंज किया था, तब नीट पेपर लीक का मुद्दा गर्म था। भाजपा को उम्मीद ही होगी कि वक्त बीतने के साथ यह मुद्दा पुराना पड़ेगा तो फिर छात्रों की गूंज भी दब जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

कोटा, देहरादून, प्रयागराज और पुणे इन चार जगहों पर अब राहुल गांधी ने छात्रों की गूंज कार्यक्रम किया है और 19 सितंबर को इंदौर में राहुल गांधी फिर से छात्रों की गूंज के लिए पहुंच रहे हैं। हालांकि जहां राहुल नहीं जा रहे हैं, या नहीं गए हैं, वहां के छात्रों की समस्याओं को भी वो उठा ही रहे हैं। हाल ही में राहुल गांधी ने महाराष्ट्र के आदिवासी छात्रों के प्रदर्शन को न केवल समर्थन दिया, बल्कि उनसे मिलने नासिक भी पहुंचे। वहीं राहुल गांधी ने बिहार में पुलिसिया दमन के शिकार छात्रों से भी मुलाकात का वीडियो शेयर किया है और लिखा है कि सोचिए, ऐसा क्या गुनाह किया था इन बच्चों ने कि इन्हें गोली मार दी गई? इन्होंने सरकार से सिफ़र् तीन चीज़ें माँगी थीं - शिक्षा, रोज़गार, और जवाबदेही। ये अपराधी नहीं थे। ये ग़रीब घरों के वो बच्चे थे जो अपने परिवार के सपने लेकर पढ़ने निकले थे - किसी को अच्छी नौकरी चाहिए थी, किसी को अपने घर के हालात बदलने थे।

गोली के घाव भर जाएंगे - पर जो डर इन बच्चों के भीतर बैठ गया है, उसका इलाज किस अस्पताल में होता है? प्रधानमंत्री जी, मुख्यमंत्री जी - इनकी टूटी हड्डी तो जुड़ जाएगी। क्या इनका टूटा हुआ सपना आप लौटा सकते हैं?

मोदी राज में देश के भविष्य यानी नयी पीढ़ी की क्या दुर्गति की जा रही है, इसके रोजाना नए-नए उदाहरण सामने आ रहे हैं। यह विडंबना ही है कि शनिवार को मोदी ने छात्रों के सामने बताया कि उनकी सरकार ने देश को खुशहाल बनाने के लिए क्या-क्या किया है और रविवार को दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैम्पस के पास सत्य निकेतन में एक जर्जर अवस्था की पांच मंजिला इमारत बारिश में गिर गई और उसमें कई छात्र दब गए जो इस इमारत के छोटे-छोटे कमरे में रहते थे। लेकिन अपनी सरकार में हो रही ऐसी घटनाओं की जिम्मेदारी लेने की जगह नरेन्द्र मोदी अब भी कांग्रेस की पिछली सरकारों को कोसने में लगे हैं। मोदी ने एसआरसीसी में 2008 में ताज पर हुए आतंकी हमले, नॉर्थ ईस्ट में अशांति, वैश्विक मंदी आदि पर कांग्रेस की नाकामी को दिखाने की कोशिश की, लेकिन इस समय देश के क्या हालात हैं, इस पर कुछ नहीं कहा। हकीकत ये है कि पुलवामा और पहलगाम जैसे आतंकी हमले पिछले सालों में हुए हैं, देश में बेरोजगारी चरम पर है, महंगाई इतनी बढ़ चुकी है कि खुद मोदी अपील कर रहे हैं कि सोना न खरीदो, विदेश न जाओ। कॉलेज छात्रों से अगर इन मुद्दों पर बात नहीं करनी थी, तो कम से कम मोदी उनकी समस्याओं पर ही बात करते, लेकिन मोदी ने ऐसा नहीं किया।

सोचिए डॉ.मनमोहन सिंह अगर छात्रों के बीच जाते तो उन्हें अर्थव्यवस्था की गहराइयों और नए आयामों से वाकिफ कराते, अटल बिहारी बाजपेयी जाते तो छात्र उनसे सीखते कि सभ्य भाषा में संवाद कैसे किया जाता है, राजीव गांधी अगर आज होते और कॉलेज छात्रों के बीच जाते तो निश्चित तौर पर एआई, ड्रोन जैसे विषय उनके भाषण का हिस्सा होते। लेकिन मोदी के पास शायद न ऐसा कोई ज्ञान है, न दूरदर्शिता और न उनकी नीयत छात्रों से जुड़े मुद्दों पर बात करना है, उन्हें केवल चुनावी भाषण देना आता है और एसआरसीसी में मोदी ने यही किया।


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