Top
Begin typing your search above and press return to search.

प्रधानमंत्री मोदी के लिए अच्छे संकेत नहीं

जंतर-मंतर से संसद तक कूच का ऐलान तो 20 जुलाई के लिए किया गया था, लेकिन मोदी सरकार ने प्रदर्शनकारियों के साथ जैसा सलूक किया

प्रधानमंत्री मोदी के लिए अच्छे संकेत नहीं
X

जंतर-मंतर से संसद तक कूच का ऐलान तो 20 जुलाई के लिए किया गया था, लेकिन मोदी सरकार ने प्रदर्शनकारियों के साथ जैसा सलूक किया, उसके बाद 21 जुलाई को फिर हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारी न केवल जंतर-मंतर पर जुटे, बल्कि नागपुर में संघ मुख्यालय के सामने से लेकर और कई शहरों में अपनी नाराजगी के साथ उतरे। अब प्रदर्शनकारियों की मांग केवल धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे तक सीमित नहीं रह गई है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह सब के इस्तीफे की मांग हो रही है। राहुल गांधी के नेतृत्व में तमाम कांग्रेस सांसदों ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर पहुंच कर ही उनके इस्तीफे की मांग की, जो हालिया राजनीति में एक अभूतपूर्व घटनाक्रम है। किसान आंदोलन, शाहीन बाग आंदोलन, महिला पहलवानों का धरना, विपक्ष के प्रदर्शन सब मंचों से उठती विरोध की आवाज को कुचलने का रवैया मोदी सरकार का रहा है। लेकिन इस बार शायद सभी हदें पार हो गई हैं, इसलिए विरोध भी अब शांत होने की जगह और बढ़ गया है।

सोमवार को सरकार ने प्रदर्शनकारियों का क्रूरतापूर्वक दमन किया। लड़कियों, स्कूल जाने वाले बच्चों तक को अपनी लाठियों का निशाना बनाया। लाठी चलाने के भी कुछ उसूल होते हैं, जैसे पैरों पर मारना, ताकि प्रदर्शनकारी को चोट भी पड़े, लेकिन जान को खतरा न बने। लेकिन यहां मोदी सरकार ने 13 अप्रैल 1919 में जलियांवाला बाग में पहुंचे जनरल डायर की भयावह याद ताजा करवाई, जिसने देखा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन चल रहा है, फिर भी निकलने का एकमात्र रास्ता बंद करवा कर पुलिस से गोलियां चलवाईं। सोमवार को भी संसद प्रवेश द्वार पर बंदूकें तैनात किए हुए सुरक्षाकर्मी खड़े थे। बस गोली चलाने की कसर थी। हालांकि गोली चलती तो साफ दिखता कि सरकार की तरफ से चलाई गई है। इसलिए डायर से भी ज्यादा चालाकी से काम लिया गया। सोशल मीडिया पर खबरें आई हैं कि कई बैरिकेड्स में करंट दौड़ाने की खबर है, ताकि कुछ प्रदर्शनकारी घायल हों या मरें तो यह दुर्घटना की तरह दिखे। पुलिस वालों की तरफ से पत्थर चलाने और लड़कियों-बच्चों को मारने, कुछ लोगों के नाजुक अंगों पर प्रहार की तस्वीरें भी सामने आई हैं। चालाकी का एक और उदाहरण यह है कि पुलिस वर्दी पहने कई लोगों के नाम का बैच वर्दी पर नहीं लगा था, यानी यह पता ही नहीं है कि मारने वाले वाकई पुलिसकर्मी थे या उनके भेस में कोई गुंडे। रविवार की रात जिस तरह जंतर-मंतर के बाहर पत्थर से लदे ट्रक और टूटी गाड़ियां खड़ीं थी, वो सारे मामले को और संदिग्ध बना रही हैं। आज तक यह भी तो साफ नहीं हो पाया है कि गोधरा में उसी बोगी में आग कैसे लगी थी, जिसमें कारसेवक थे और उसके बाद वह आग कैसे पूरे गुजरात को जला गई। जिन लोगों ने ऐसी भयावह साजिश रचकर समाज को बांट डाला, वो और क्या कुछ कर सकते हैं, इसका अनुमान क्या आम इंसान कभी लगा पाएगा। जवाब ना में ही होगा। अपने उज्ज्वल भविष्य की चिंता करने वालों पर ऐसा अत्याचार जो सरकार करे, उसे एक पल भी सत्ता में और रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए। लेकिन निर्लज्जता देखिए कि सोमवार को लोकतंत्र के लिए एक और काला दिवस बना देने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने मंगलवार को एनडीए सांसदों के साथ मंगल-मिलन किया।

ऐसे सांसदों पर लानत भेजनी चाहिए जिन्हें ऐसे आयोजन में शिरकत करने लज्जा न आई, बल्कि किरण रिजीजू जैसे मंत्री ने बाहर निकलकर कहा कि प्रधानमंत्री ने नीट पेपर लीक करने वालों को कड़ी सजा देने का निश्चय किया है। उन्होंने दोबारा पेपर भी करवाए। मंत्री जी को लगे हाथ ये भी बता देना चाहिए था कि मंगल-मिलन में जब मोदी पेपर लीक पर बात कर सकते हैं, तो यही बात उन्हें सदन में विपक्ष की मौजूदगी में करने में क्या हर्ज है। क्या अब मंगल-मिलन की बैठकें लोकसभा की आधिकारिक कार्यर्वाही के तौर पर दर्ज होंगी। मंगलवार सुबह ही नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों का दल लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला से मिला था और सोमवार के घटनाक्रम पर अपनी चिंता दर्ज कराते हुए सदन में चर्चा की मांग की थी। राज्यसभा में मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इस मुद्दे पर चर्चा की मांग की तो सत्ता पक्ष ने हंगामा किया। यही सब करने के लिए तो भाजपा दूसरे दलों को तोड़कर संसद में अपना संख्या बल बढ़ाने में लगी है। अब जनता का एक बड़ा वर्ग अफसोस मना रहा है कि उसने भाजपा को वोट दिया, अब टीएमसी, शिवसेना या एनडीए का साथ देने वाले दूसरे दलों को वोट देने वाले भी पछता ही रहे होंगे। हालांकि अब देश का माहौल जिस तरह मोदी सरकार के खिलाफ बन गया है, उसमें अब भाजपा के साथ खड़े होने वालों को अपने फैसलों पर पुनर्विचार करना चाहिए। क्योंकि लोकसभा में भाजपा के पास बहुमत अब भी नहीं है और 243 सीटें विपक्ष के पास हैं, टीएमसी, शिवसेना सांसदों की बगावत के बाद आंकड़ा कुछ और कम हो सकता है, लेकिन गैर- भाजपाई सांसद संविधान और लोकतंत्र का लिहाज करते हुए विचार करें तो 272 का जादुई आंकड़ा इस पाले से उस पाले में जा सकता है। बहरहाल, सत्ता परिवर्तन अभी दूर की कौड़ी लग रही है, पर राजनीति में असंभव शब्द भी तो नहीं है।

दरअसल जिस तरह से नरेन्द्र मोदी इस देश को चला रहे हैं, उसमें अब कमजोर, पीड़ित, दमित जनता के लिए इंसाफ की गुंजाइश कम होती जा रही है। मंगलवार को ही जब दिल्ली हाईकोर्ट में लाठीचार्ज के खिलाफ याचिका दर्ज कर तत्काल सुनवाई की मांग की गई, तो इस मांग को खारिज करते हुए जवाब मिला कि हमें इसमें मत घसीटिए। अब आम अवाम अदालत में इंसाफ की गुहार न लगाए तो कहां लगाए। घूम-फिरकर उम्मीद विपक्ष पर ही जा टिकती है। सोमवार को समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने जिस तरह कई घायल प्रदर्शनकारियों का ख्याल रखा, उनके लिए पुलिस से भिड़ गईं, वो वीडियो खूब वायरल हुए हैं। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, संजय राउत समेत बाकी विपक्षी नेताओं ने भी सरकार को इस मामले में खूब घेरा। और मंगलवार को यह देखकर अच्छा लगा कि श्रीनिवास बी वी के नेतृत्व में कांग्रेस सेवादल के लोग भोजन-पानी-दवाइयों के साथ प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंच गए। इधर राहुल गांधी, प्रियंका गांधी राममनोहर लोहिया अस्पताल जाकर घायल प्रदर्शनकारियों से मिले। अरविंद केजरीवाल ने वीडियो जारी कर मोबाइल नंबर भेजा ताकि जिन्हें मदद की जरूरत हो, वो सीधे संपर्क कर सकें। विपक्ष ने दिखा दिया कि वह केवल सरकार की आलोचना के लिए नहीं बैठा है, आंदोलनकारियों की मदद भी कर रहा है।

इस पूरे आंदोलन का सूत्रपात कॉकरोच जनता पार्टी ने किया, लेकिन सोमवार को अभिजित दिपके उस समय वाहन के अंदर बैठे थे, जब प्रदर्शनकारियों पर लाठियां चल रही थीं। गनीमत है कि वे मंगलवार को फिर से जंतर-मंतर पर बैठे थे, सीजेपी प्रवक्ता विजेता दहिया की तरह बर्गर खाने नहीं निकल गए थे।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it