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फिर निशाने पर जेएनयू

देश के प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पर एक बार फिर दक्षिणपंथी विचारधारा के लोग हमलावर हैं।

फिर निशाने पर जेएनयू
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देश के प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पर एक बार फिर दक्षिणपंथी विचारधारा के लोग हमलावर हैं। इस संस्थान को टुकड़े-टुकड़े गैंग का अड्डा बताया जा रहा है। मोदी सरकार के आने के बाद से जेएनयू भाजपा और संघ समर्थकों के निशाने पर रहता आया है। खासकर संस्थान के जो छात्र वामपंथी विचारों के हैं, उन्हें किसी न किसी तरीके से देशद्रोही ठहराने की कोशिशें की जाती हैं। वही कोशिशें सोमवार से फिर शुरु हो चुकी हैं।

दरअसल सोमवार 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों में आरोपी बनाए गए उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी, जबकि अन्य पांच सह आरोपियों को जमानत दे दी गई है। जबकि छह साल पहले 2020 में जेएनयू के इतिहास की सबसे बड़ी हिंसक घटना 5 जनवरी को हुई थी। जिसमें विवि परिसर में नकाबपोश लोगों की भीड़ ने हॉस्टलों में घुसकर छात्रों पर लाठी, पत्थर और लोहे की रॉड से हमला किया था। इस हमले में तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष सहित कम से कम 28 लोग घायल हुए थे, इसमें दिल्ली पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठे थे कि आखिर उसके रहते इतनी बड़ी घटना कैसे हुई। आज तक उस घटना के असल दोषियों को सजा नहीं हुई है। इसी पर हर साल जेएनयू में छात्र इक_ा होकर अपने गुस्से का इजहार करते हैं। सोमवार रात भी छात्र एकत्र हुए और जेएनयू परिसर में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के खिलाफ नारेबाजी हुई। इसमें उनके लिए आपत्तिजनक शब्दों के इस्तेमाल की भी खबरें हैं। यह सही है कि किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन में कट्टर से कट्टर विरोधी के लिए भी मर्यादा के दायरे में रहकर शब्दों का इस्तेमाल होना चाहिए। लेकिन फिर यह संतुलन दोनों पक्षों से अपेक्षित होता है।

अभी केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा है कि कुछ लोगों ने जेएनयू को 'टुकड़े-टुकड़े' गिरोह का अड्डा बना दिया है। राहुल गांधी, टीएमसी, कम्युनिस्ट जैसे लोग इस गिरोह का हिस्सा हैं... ये लोग सुप्रीम कोर्ट में विश्वास नहीं रखते। उमर खालिद और शरजील इमाम के समर्थन में और प्रधानमंत्री मोदी व अमित शाह के खिलाफ नारे लगाए जा रहे हैं। ऐसे लोगों पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए। पाकिस्तान जैसी मानसिकता रखने वालों को भारत की जनता ऐसे लोगों को कभी बर्दाश्त नहीं करेगी।

सरकार के विरोध में जब भी कोई आवाज शैक्षणिक परिसरों से उठती है, उसे दबाने या फिर गलत साबित करने की कोशिशें शुरु हो जाती हैं। जेएनयू में तो अब होली-दीवाली जैसे मौकों पर भी खान-पान के नाम पर ही झड़पें होने लगी हैं। एक बार तो विजयादशमी पर एबीवीपी ने रावण दहन में अफजल गुरु, उमर खालिद और शरजील इमाम के चित्र लगाकर पुतला जलाए, जिस पर वामपंथी समूहों ने इसे इस्लामोफोबिया और नफरत फैलाने का आरोप लगाया। ऐसी तमाम झड़पों और हिंसक घटनाओं के पीछे मकसद यही है कि किसी भी तरह विश्वविद्यालय परिसर को हिंदुत्ववादी गतिविधियों का अड्डा बनाया जाए।

सोमवार के विरोध के बाद ही एबीवीपी ने कहा है कि वह इस विरोध प्रदर्शन की शिकायत पुलिस में करेगा। वहीं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ की अध्यक्ष अदिति मिश्रा ने कहा है कि छात्र 5 जनवरी, 2020 को परिसर में हुई हिंसा की निंदा करने के लिए हर साल विरोध प्रदर्शन करते हैं। उन्होंने बताया, विरोध प्रदर्शन में लगाए गए सभी नारे वैचारिक थे और किसी पर व्यक्तिगत रूप से हमला नहीं है। वे किसी को लक्षित करते हुए नहीं थे। बता दें कि जेएनयू में वामपंथी समर्थित छात्र संगठन का कब्जा है और यह भी संघ और भाजपा के लिए एक बड़ी कसक है कि उसकी तमाम कोशिशों के बावजूद जेएनयू में वाममोर्चा पस्त नहीं हो रहा है।

जेएनयू में सोमवार रात लगे नारों पर कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने कहा है कि आप लोगों की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करने का एक तरीका होता है। वहीं राजद सांसद मनोज झा ने पूछा है कि क्या यह चुनिंदा आक्रोश है? हां, लोग स्वाभाविक रूप से गुस्से में हैं। हममें से कई लोगों को भी लगता था कि शरजील और उमर को जमानत मिल जानी चाहिए थी। पांच साल से अधिक समय बीत चुका है और मुकदमे के नाम पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। यह अपने आप में चिंता का विषय है- संवैधानिक सुरक्षा लागू होने से पहले किसी को कितने समय तक जेल में रहना चाहिए? यह एक तरह से आपराधिक न्याय प्रणाली पर भी चोट है।

बता दें कि शीर्ष अदालत के सोमवार के फैसले पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आई हैं, हालांकि कानून के जानकार अधिकतर लोग इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं कि पांच साल से ज्यादा वक्त तक बिना मुकदमा जेल में रखना क्या मूल अधिकारों का हनन नहीं है। क्योंकि अदालत ने ही जेल को अपवाद और बेल को नियम कहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उमर खालिद और शारजील इमाम की जमानत याचिकाएं अभियोजन द्वारा पेश संरक्षित गवाहों की परीक्षा पूरी होने या इस आदेश की तारीख से एक वर्ष की अवधि समाप्त होने पर (जो पहले हो) विचार की जा सकती हैं। इसके बाद दोनों आवेदक जमानत के लिए फिर आवेदन कर सकते हैं। इस आदेश पर भी जानकार सवाल उठा रहे हैं कि जब छह सालों में गवाहों की जांच पूरी नहीं हुई तो क्या एक साल में पूरी हो जाएगी। खासकर तब जबकि जांच का अधिकार दिल्ली पुलिस के पास है और इसमें उसी की मर्जी चलेगी। क्या एक साल फिर से बिना मुकदमे के उमर खालिद को जेल में रहना होगा। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) संवैधानिक व्यवस्था में एक खास जगह रखता है. लेकिन ट्रायल से पहले जेल को सजा नहीं माना जा सकता। इसका मतलब ये कि अगर उमर खालिद दोषी ठहराए जाते हैं तो फिर जो पांच साल उन्होंने कैद में काटे हैं, सजा में उसकी गिनती नहीं होगी।

इस फैसले पर देश भर में मंथन चल रहा है और मुमकिन है कि जेएनयू परिसर में 2020 की हिंसा की बरसी के साथ-साथ इस फैसले पर भी छात्र उद्वेलित हुए और उन्होंने अपनी नाराजगी नारेबाजी में प्रकट की। इसमें शब्दों के चयन पर आपत्ति जतलाई जा सकती है, लेकिन केवल इस वजह से छात्रों को टुकड़े-टुकड़े गैंग जैसे अमर्यादित शब्दों से अपमानित करना ठीक नहीं है। गैंग शब्द से ही आपराधिक प्रवृत्ति की बू आती है, लेकिन खुद नरेन्द्र मोदी खान मार्केट गैंग जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर चुके हैं और उनकी सरकार में टुकड़े-टुकड़े गैंग बार-बार विरोधियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।


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