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बिना मुकदमे के कैद, लोकतंत्र कहां है

बिना मुकदमे के लंबी कैद लोकतंत्र के अस्तित्व पर सवाल उठाती है। इस समय भारत इसी सवाल से दो-चार हो रहा है

बिना मुकदमे के कैद, लोकतंत्र कहां है
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बिना मुकदमे के लंबी कैद लोकतंत्र के अस्तित्व पर सवाल उठाती है। इस समय भारत इसी सवाल से दो-चार हो रहा है। यूं तो रोजाना ढेरों प्रसंग ऐसे घटित हो रहे हैं, जिनमें लोकतंत्र को लेकर चिंता उपजती है, ऐसे वक्त में न्यायालय से आए कुछ फैसले आस बंधाते हैं कि सत्ता चाहे अपने स्वार्थ के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों और अधिकारों से समझौता कर ले, लेकिन देश की न्याय व्यवस्था हर हाल में लोकतंत्र की रक्षा करेगी। लेकिन सोमवार को उमर खालिद पर आए फैसले ने फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि देश में लोकतंत्र अब किस हाल में पहुंच गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को छात्र नेताओं उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया, जो 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में पांच से ज्यादा वर्षों से जेल में बंद हैं। हालांकि कोर्ट ने अन्य पांच सह-आरोपियों - गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को सशर्त जमानत दे दी है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारी की पीठ ने 10 दिसंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था। पूरे देश की नज़रें सोमवार के फैसले पर थीं। ज्यादातर लोग उम्मीद कर रहे थे कि सभी सात आरोपियों को 5 जनवरी को ज़मानत मिल जाएगी। लेकिन अदालत ने उमर और शरजील को छोड़कर बाकी को ज़मानत दे दी।

उमर खालिद और शरजील इमाम पर सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि इस मामले में अन्य आरोपियों की तुलना में वे 'अलग स्थिति' में हैं। कोर्ट ने कहा कि मामले के शुरुआती सुबूतों से लगता है कि उमर ख़ालिद और शरजील दंगों की योजना और रणनीति बनाने में शामिल थे। ध्यान देने वाली बात ये है कि उमर खालिद पर अब तक मुकदमा शुरु नहीं हुआ है। यानी चाहे जितने भी गंभीर आरोप हों और उसके लिए सबूत हों, अब तक उन्हें पुष्ट करने की प्रक्रिया शुरु ही नहीं हुई है। जब मुकदमा चलेगा और फैसला आएगा, तब पता चलेगा कि उमर खालिद दोषी थे या नहीं, लेकिन अभी उन्हें बिना दोषसिद्धि के ही पांच साल से ज्यादा की जेल तो भुगतनी पड़ ही गई है।

और ये वो पांच साल हैं, जब व्यक्ति में सबसे अधिक ऊर्जा, रचनात्मकता, सकारात्मकता और सक्रियता होती है। 11 अगस्त 1987 को जन्मे उमर खालिद अभी 38 बरस के ही हैं। पीएचडी करने के बाद वे अपना भविष्य संवार सकते थे। लेकिन पढ़ने के दौरान और उसके बाद भी उन्होंने वंचितों के हक में आवाज उठाना जारी रखा, सरकार को परेशान करने वाले सवाल पूछे, नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ अपनी दलीलें पेश कीं, इस कानून के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। और इसके बाद से वो सलाखों में कैद हैं।

2020 से कैद उमर खालिद को एक मामले में अप्रैल 2021 में ज़मानत मिल गई थी, दूसरे मामले में उनके ख़िलाफ़ अनलॉफुल एंड एक्टिविटिज़ प्रिवेंशन एक्ट यानी यूएपीए के तहत आरोप लगाए गए हैं। इस मामले में अब तक दो अदालतें उनकी ज़मानत याचिका ख़ारिज कर चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट में उनकी ज़मानत याचिका अप्रैल 2023 से लंबित थी, जो अब खारिज कर दी गई है। अदालत ने कहा कि इस आदेश के एक साल बाद या गवाहों की छानबीन पूरी होने के बाद उमर ख़ालिद और शरजील इमाम ज़मानत के लिए फिर से अर्जी दाखिल कर सकते हैं। यानी निकट भविष्य में उमर की रिहाई की संभावनाएं नगण्य दिख रही हैं। क़ानून के जानकारों का कहना है कि उमर ख़ालिद के ख़िलाफ़ जो सबूत हैं वो काफ़ी कमज़ोर हैं इसलिए उन्हें ज़मानत पर बाहर आ जाना चाहिए।

लेकिन क्या होना चाहिए और क्या हो रहा है के बीच ही सारी हकीकत बयां हो जाती है। हो ये रहा है कि बलात्कार और हत्या के दोषी गुरमीत राम रहीम सिंह को एक बार फिर 40 दिन की पैरोल मिल गई है। डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम को 2017 में दोषी ठहराया गया था, उसी साल हरियाणा के रोहतक में उसे जेल भेजा गया। तब से लेकर अब तक उसे 15 बार अस्थायी रिहाई मिल चुकी है। इस बार मिली पैरोल के दौरान राम रहीम सिरसा में अपने डेरे के मुख्यालय में रहेगा। बता दें कि 2021 के बाद हर साल क़रीब 90 दिन की पैरोल राम रहीम को मिली है। अब तक वह 350 से ज़्यादा दिन जेल से बाहर रहा है। राम रहीम को अक्सर उसी वक्त पैरोल मिल जाती है, जब चुनावों का वक्त होता है। हरियाणा और दिल्ली के आसपास उसके अनुयायियों की बड़ी संख्या है, उसी का लाभ लेने के लिए शायद उसे किसी न किसी कारण से पैरोल दे दी जाती है। इस मामले में भाजपा पर आरोप भी लगते हैं कि यह सब उसके दबाव में होता है, हालांकि भाजपा नेता बड़ी आसानी से इसे अदालती मामला बताकर टाल जाते हैं। लेकिन यहां मामला केवल कानूनी नहीं नैतिक भी है। क्या भाजपा नेता बलात्कार और हत्या के दोषी को बार-बार की अस्थायी रिहाई से सहमत हैं, अगर ऐसा है तो फिर अपराधियों में कानून का डर किस तरह बैठेगा, ये भी वो बता दें।

उमर खालिद पर तो यूएपीए के तहत आरोप लगाए गए हैं, जो आतंकवाद से जुड़े मामलों में लगाया जाता है। दिल्ली दंगों की साजिश में उमर का हाथ बताया जाता है, हालांकि उमर इसे झूठा बता चुके हैं और उन्हें तभी गलत साबित किया जा सकेगा, जब मुकदमा चलेगा। वैसे ये पहली बार नहीं है जब उमर पर मोदी सरकार में आरोप लगे हैं। 2016 में अफजल गुरु की फांसी के खिलाफ प्रदर्शन आयोजित करने पर उमर खालिद पर राजद्रोह का आरोप लगा। उमर ने जेएनयू छात्र नजीब अहमद के लापता होने के मामले में भी प्रदर्शन किया और भीमा कोरेगांव हिंसा में कथित भड़काऊ भाषण देने के आरोप में केस दर्ज हुआ।

2018 में दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के बाहर उन पर हमला हुआ था, जिसमें हमलावरों ने गिरफ्तारी के बाद कहा कि वे स्वतंत्रता दिवस पर लोगों को 'तोहफा' देना चाहते थे। हमलावर जमानत पर बाहर हैं, जबकि उमर जेल में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए जैसे विशेष कानूनों के तहत भी जमानत को 'नियम' बताया है। लेकिन शायद उमर के मामले में ये नियम अपवाद की श्रेणी में डाल दिया गया है।


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