प्रधानमंत्री का डर और संसद की गरिमा
संसद सत्र को सत्ता पक्ष की तरफ से ही बाधित करना, एक साथ विपक्ष के सौ से ज्यादा सांसदों का निलंबन, सदन के भीतर एक अल्पसंख्यक सांसद के लिए अपशब्दों का प्रयोग, पूर्व प्रधानमंत्रियों के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल, महिला सांसदों के लिए अभद्र टिप्पणियां, संसद के भीतर रंगीन धुआं उड़ाना, संसद में हिंदू पंडितों से पूजा-पाठ करवाकर धर्मनिरपेक्षता की बलि चढ़ाना और सुबह सत्र संचालित करा रहे राज्यसभा सभापति का अचानक शाम को स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा और उन्हें औपचारिक विदाई तक न देना, मोदी सरकार में संसदीय परंपराओं और मर्यादा को किस तरह बार-बार तोड़ा गया

संसद सत्र को सत्ता पक्ष की तरफ से ही बाधित करना, एक साथ विपक्ष के सौ से ज्यादा सांसदों का निलंबन, सदन के भीतर एक अल्पसंख्यक सांसद के लिए अपशब्दों का प्रयोग, पूर्व प्रधानमंत्रियों के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल, महिला सांसदों के लिए अभद्र टिप्पणियां, संसद के भीतर रंगीन धुआं उड़ाना, संसद में हिंदू पंडितों से पूजा-पाठ करवाकर धर्मनिरपेक्षता की बलि चढ़ाना और सुबह सत्र संचालित करा रहे राज्यसभा सभापति का अचानक शाम को स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा और उन्हें औपचारिक विदाई तक न देना, मोदी सरकार में संसदीय परंपराओं और मर्यादा को किस तरह बार-बार तोड़ा गया, ये उसके चंद उदाहरण हैं। लेकिन अब तो संसदीय इतिहास को मुंह चिढ़ाते हुए मोदी सरकार ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिसका अगला पायदान तानाशाही ही लगता है।
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष की तरफ से चर्चा के बिना ही पारित करा दिया गया। पाठक जानते हैं कि 2 और 3 फरवरी को राहुल गांधी को सत्तापक्ष ने पूरा भाषण नहीं देने दिया। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोद मुकुंद नरवणे की किताब के कुछ अंश कारवां पत्रिका में प्रकाशित हुए थे, जिसे राहुल गांधी ने सत्यापित करने के बाद उद्धृत करना चाहा लेकिन सत्ता पक्ष की टोकाटाकी के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने उन्हें नियम 349 का हवाला देते हुए अनुमति नहीं दी। इसके बाद राहुल गांधी ने कहा भी कि मैं बिना उद्धृत किए ही अपनी बात रखता हूं, लेकिन जैसे ही वे चीन पर बोलने लगे, सत्ता पक्ष की घबराहट देखकर आसंदी ने उन्हें बोलने नहीं दिया। इसके बाद विपक्ष के किसी सांसद ने भाषण नहीं दिया। राहुल गांधी तो सदन में बहादुरी के साथ डटे रहे, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने कायरता की नयी मिसाल देश के सामने पेश की। वे संसद आए और फिर वापस लौट गए। बुधवार शाम पांच बजे उनका भाषण लोकसभा में निर्धारित था, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला का कहना है कि उन्होंने ही प्रधानमंत्री को सदन में आने से मना किया था। उन्होंने बड़ा दावा करते हुए कहा कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि कांग्रेस के सांसद उन पर शारीरिक हमला कर सकते थे। इस बीच हंगामे के चलते लोकसभा की कार्यवाही को शुक्रवार तक के लिए स्थगित कर दिया गया है। ओम बिड़ला ने कहा कि अगर कोई घटना हो जाती तो लोकतंत्र की मर्यादा तार-तार हो जाती। उसे टालने के लिए मैंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि वह सदन में ही ना आएं। अंत में उनके ही भाषण के बिना ही धन्यवाद प्रस्ताव को मंजूर करने का फैसला हुआ। हालांकि संसद टीवी में दिख रहा है कि कांग्रेस की महिला सांसद राहुल गांधी को बोलने से रोकने का विरोध कर रही थीं और उनके हाथों में पोस्टर थे। उनका इरादा प्रधानमंत्री मोदी पर हमले का नहीं था। लेकिन अब उसी घटना की वजह से प्रधानमंत्री के बुधवार को लोकसभा में न आने की सफाई दी जा रही है।
तो कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी हाथ में पोस्टर थामी हुई चंद महिला सांसदों से डर गए। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या सरकार ने इस पर कोई रिपोर्ट थाने में दर्ज कराई है। किन-किन महिला सांसदों पर सरकार का आरोप है, और उन आरोपों के लिए सबूत क्या हैं, यह सब देश को मालूम होना चाहिए, क्योंकि सवाल नरेन्द्र मोदी नहीं प्रधानमंत्री की सुरक्षा का है। क्या इसके बाद अमित शाह और अजित डोभाल को अपने पदों से इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए, क्योंकि जो संसद में प्रधानमंत्री को सुरक्षित न रख पाएं, वो देश की सुरक्षा का क्या खाक करेंगे। वैसे यह भी शायद पहली बार ही होगा कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर संसद के भीतर ही खतरा बने। नरेन्द्र मोदी को अब देश के सामने एक सूची सौंप ही देनी चाहिए कि उन्हें किन-किन बातों से डर लगता है। इनमें चीन, डोनाल्ड ट्रंप, राहुल गांधी, कुछ नाम तो जाहिर हैं, अब शायद विपक्ष की महिला सांसदों का नाम भी जुड़ जाएं, इसके आगे मोदी और भी चीजें जोड़ सकते हैं। वैसे प्रधानमंत्री के संसद में भाषण न देने की असल वजह राहुल गांधी ही लग रहे हैं। बुधवार को राहुल गांधी संसद में मनोज नरवणे की किताब लेकर आए थे, और पत्रकारों से उन्होंने कहा था कि वे इसे प्रधानमंत्री को सौंपेंगे, ताकि वे खुद पढ़ें कि क्या लिखा हुआ है। इस सुपुर्दगी से बचने के लिए ही प्रधानमंत्री मोदी लोकसभा से गायब हो गए।
बुधवार को संसद में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे को ढाल बनाने का पैंतरा भी मोदी के लिए असरकारी नहीं हुआ, बल्कि उसका उल्टा असर हुआ। निशिकांत दुबे ने कम से कम छह किताबों के हवाले से पं.नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी सब पर कीचड़ उछालने की कोशिश की, लेकिन वो आसमान में थूकने जैसी साबित हुई। निशिकांत दुबे ने नेहरू-गांधी परिवार के लिए अय्याशी, मक्कारी, भ्रष्टाचारी जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर हमले किए। इसके बाद गुरुवार को वे राहुल गांधी के कपड़ों पर आ गए कि वे टी शर्ट और ढीली-ढाली पतलून में आ जाते हैं, उनके मन में खादी के लिए सम्मान नहीं है, तो वे संसद का क्या सम्मान करेंगे। निशिकांत दुबे तो यहां तक कह गए कि राहुल गांधी ने तीन दिन से संसद को बंधक बना कर रखा है। इस तरह निशिकांत दुबे ने अपनी ही सरकार की कमजोरी दिखा दी, अगर संसद को विपक्ष ने बंधक बनाया भी तो सरकार में इतना दम नहीं है कि वो संसद को आजाद करा सके। वहीं पं.नेहरू, इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी के चरित्र पर कीचड़ उछाला गया तो पलट कर भाजपा नेता और दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के विवाहिता से प्रेम प्रसंग और संतान से लेकर नरेन्द्र मोदी द्वारा पत्नी का त्याग करना जैसे सारे प्रसंग याद दिलाए गए। इस तरह जो कीचड़ भाजपा ने कांग्रेस पर उछालना चाहा, वो पलट कर उस पर ही गिरा।
इधर राज्यसभा में भी मोदी सरकार के लिए मुसीबतें बढ़ी हुई हैं। यहां नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि भाजपा लोगों को बोलने नहीं देती। भाजपा ने प्रधानमंत्री मोदी को जंजीरों में जकड़ रखा है, उन्हें बोलने नहीं दे रही। उन्होंने बताया कि विपक्ष सत्ताधारी दल की तरह दूसरों को 'पीट-पीटकर गाली-गलौज' नहीं करता। जन प्रतिनिधियों को बोलने न देकर जनता की आवाज को कुचला जा रहा है। इसी तरह प्रियंका गांधी ने भी कहा कि भाजपा के लोग एपस्टीन फाइल्स के खुलासे और अमेरिका से व्यापार समझौते को गुप्त रखने के कारण डरे हुए हैं, इसलिए संसद में विपक्ष को बोलने नहीं दे रहे। कुल मिलाकर मोदी सरकार के संसद की गरिमा को जिस रसातल में पहुंचाया है, उसका जवाब देश को उन्हें देना होगा।


