डीयू में साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान प्रो. एस इरफान हबीब पर हमला, कैंपस सुरक्षा पर उठे सवाल
घटना उस समय हुई, जब प्रो. हबीब ‘पीपुल्स लिटरेचर फेस्टिवल: समता उत्सव’ में छात्रों को संबोधित कर रहे थे। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, पानी से भरी बाल्टी परिसर की दीवार के पार से फेंकी गई। बाल्टी सीधे प्रो. हबीब को नहीं लगी, लेकिन पानी उन पर गिरा।

नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के कला संकाय परिसर में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान 94 वर्षीय वरिष्ठ इतिहासकार प्रो. एस इरफान हबीब पर पानी से भरी बाल्टी और कूड़ेदान फेंके जाने की घटना ने विश्वविद्यालय परिसर की सुरक्षा और छात्र राजनीति के माहौल को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। घटना बुधवार को गेट नंबर-4 के पास उस समय हुई, जब प्रो. हबीब ‘पीपुल्स लिटरेचर फेस्टिवल: समता उत्सव’ में छात्रों को संबोधित कर रहे थे। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, पानी से भरी बाल्टी परिसर की दीवार के पार से फेंकी गई। बाल्टी सीधे प्रो. हबीब को नहीं लगी, लेकिन पानी उन पर गिरा। घटना के बाद कुछ समय के लिए कार्यक्रम स्थल पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
“बाल्टी में कुछ भी हो सकता था”: प्रो. हबीब
घटना के बाद प्रो. एस इरफान हबीब ने कहा कि यह अनुभव उनके लिए चौंकाने वाला था। उन्होंने बताया कि वे कुछ मिनटों तक स्तब्ध रह गए थे। उन्होंने कहा, “बाल्टी सीधे मुझे नहीं लगी, लेकिन पानी मुझ पर गिरा। चिंता की बात यह है कि उसमें पानी की जगह कोई खतरनाक वस्तु भी हो सकती थी।” उन्होंने इस घटना को अभूतपूर्व बताते हुए कहा कि वे पहले भी कई बार दिल्ली विश्वविद्यालय में व्याख्यान दे चुके हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ।
आयोजकों का आरोप
कार्यक्रम का आयोजन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) द्वारा किया गया था। आयोजकों ने आरोप लगाया कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम को बाधित करने की कोशिश की। हालांकि, एबीवीपी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। संगठन की ओर से कहा गया है कि उनका इस घटना से कोई लेना-देना नहीं है। घटना के बाद छात्र संगठनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।
कैंपस सुरक्षा पर उठे सवाल
इस घटना ने विश्वविद्यालय परिसर में सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस स्थान पर कार्यक्रम आयोजित हो रहा था, वह कला संकाय परिसर का एक प्रमुख क्षेत्र है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि बाल्टी और कूड़ेदान दीवार के पार से फेंके गए, जिससे यह आशंका जताई जा रही है कि सुरक्षा में चूक हुई। छात्रों और शिक्षकों के एक वर्ग ने मांग की है कि विश्वविद्यालय प्रशासन घटना की निष्पक्ष जांच कराए और दोषियों की पहचान सुनिश्चित करे।
डी. राजा ने की कड़ी निंदा
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के महासचिव डी. राजा ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा कि यह कोई असहमति या बहस नहीं, बल्कि “कायरतापूर्ण धमकी और डराने की कोशिश” है। उन्होंने कहा, “विचारों का मुकाबला विचारों से होना चाहिए, हिंसा या गुंडागर्दी से नहीं।” डी. राजा ने आगे कहा कि देश के विश्वविद्यालयों में असहिष्णुता का माहौल बनता जा रहा है, जहां सवाल उठाने और आलोचनात्मक सोच पर हमले हो रहे हैं। उन्होंने प्रो. हबीब के साथ एकजुटता जताते हुए कहा कि लोकतंत्र में विचारों का खुला प्रवाह आवश्यक है।
Absolutely atrocious that @irfhabib saab was attacked today for just speaking his mind. And this is in the heart of Delhi University. It's not easy for historians who go out there and freely advocate the cause for Indian history and education, brave of Irfan saab to continue his… pic.twitter.com/0LD2ItxDhC
— Dr. Ruchika Sharma (@tishasaroyan) February 12, 2026
इतिहासकारों और शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया
इतिहासकार रुचिका शर्मा ने भी घटना पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि यह बेहद शर्मनाक है कि सिर्फ अपने विचार रखने के कारण एक वरिष्ठ इतिहासकार पर हमला किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय इतिहास और शिक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर खुलकर बोलना आसान नहीं है, लेकिन प्रो. हबीब ने हमले के बावजूद अपना भाषण जारी रखा, जो उनके साहस को दर्शाता है। लेखक और शिक्षाविद अपूर्वानंद ने भी इस घटना की आलोचना करते हुए कहा कि यह बुद्धिजीवियों को चुप कराने की कोशिश है।
कौन हैं प्रो. एस इरफान हबीब?
प्रो. एस इरफान हबीब देश के जाने-माने इतिहासकार हैं। वे मध्यकालीन और आधुनिक भारतीय राजनीतिक इतिहास के अध्ययन में सक्रिय रहे हैं और मार्क्सवादी दृष्टिकोण से इतिहास लेखन के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कई चर्चित पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें ‘टु मेक द डेफ हियर: आइडियोलॉजी एंड प्रोग्राम ऑफ भगत सिंह एंड हिज कॉमरेड्स’, ‘जिहाद ऑर इज्तिहाद: रिलीजियस ऑर्थोडॉक्सी एंड मॉडर्न साइंस इन कंटेम्पररी इस्लाम’ और ‘मौलाना आजाद: ए लाइफ’ शामिल हैं। वे अकादमिक बहसों और सार्वजनिक विमर्श में सक्रिय भागीदारी के लिए भी जाने जाते हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस
यह घटना ऐसे समय में हुई है जब विश्वविद्यालय परिसरों में वैचारिक टकराव और छात्र राजनीति को लेकर पहले से ही बहस जारी है। एक पक्ष का कहना है कि विश्वविद्यालयों में बहस और असहमति लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और उन्हें हिंसा या डराने-धमकाने से नहीं दबाया जा सकता। दूसरी ओर, कुछ छात्र संगठनों का तर्क है कि आरोपों को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है और घटना की निष्पक्ष जांच के बाद ही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।
सुरक्षा की समीक्षा
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अभी तक विस्तृत बयान सामने नहीं आया है, लेकिन सूत्रों के अनुसार घटना की जानकारी ली गई है और सुरक्षा की समीक्षा की जा रही है। घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या विश्वविद्यालय परिसर विचारों के मुक्त आदान-प्रदान के सुरक्षित स्थल बने रह पाएंगे।


