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जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज में GST पर कार्यशाला, आर्थिक व्यवहार, जेंडर प्रभाव और GST 2.0 सुधारों पर विमर्श

इस कार्यशाला का उद्देश्य भारत में GST के आर्थिक व्यवहार पर प्रभाव को बहुस्तरीय दृष्टिकोण से समझना और विश्लेषणात्मक क्षमता का विकास करना था। कार्यक्रम में शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं, विशेषज्ञों, फैकल्टी सदस्यों और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही।

जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज में GST पर कार्यशाला, आर्थिक व्यवहार, जेंडर प्रभाव और GST  2.0 सुधारों पर विमर्श
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नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय के जानकी देवी मेमोरियल (जेडीएम) कॉलेज में शुक्रवार को गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स (जीएसटी) के बहुआयामी प्रभावों पर केंद्रित एक दिवसीय कैपेसिटी बिल्डिंग वर्कशॉप का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन कॉलेज के इकोनॉमिक्स विभाग और सेंटर फॉर जेंडर इक्विटी स्टडीज ने सेंटर फॉर विमेन डेवलपमेंट स्टडीज़ (सीडब्ल्यूडीएस), दिल्ली के सहयोग से किया। वर्कशॉप को आईसीएसएसीआर द्वारा प्रायोजित किया गया था। इस कार्यशाला का उद्देश्य भारत में जीएसटी के आर्थिक व्यवहार पर प्रभाव को बहुस्तरीय दृष्टिकोण से समझना और विश्लेषणात्मक क्षमता का विकास करना था। कार्यक्रम में शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं, विशेषज्ञों, फैकल्टी सदस्यों और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही।

उद्घाटन सत्र: नीति और शोध के बीच संवाद की आवश्यकता

कार्यक्रम की शुरुआत जेडीएम कॉलेज की प्रिंसिपल प्रो. स्वाति पाल के स्वागत भाषण और उद्घाटन टिप्पणियों से हुई। उन्होंने कहा कि जीएसटी जैसे व्यापक कर सुधारों को समझने के लिए अकादमिक शोध और नीति-निर्माण के बीच सार्थक संवाद आवश्यक है। इसके बाद सेंटर फॉर विमेन डेवलपमेंट स्टडीज़ की निदेशक प्रो. एन. मणिमेकलाई ने उद्घाटन भाषण दिया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आर्थिक नीतियों का प्रभाव केवल राजस्व संग्रह तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनका सामाजिक और जेंडर आयाम भी महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने कहा कि जीएसटी जैसे सुधारों के प्रभाव को समझने के लिए अंतर्विषयक दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।





जीएसटी फ्रेमवर्क पर विस्तृत प्रस्तुति

वर्कशॉप के पहले तकनीकी सत्र में जीएसटी काउंसिल के निदेशक और भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) अधिकारी सौरभ कुमार ने भारत के जीएसटी ढांचे पर विस्तृत प्रस्तुति दी। उन्होंने जीएसटी के विकास, इसके प्रशासनिक ढांचे और केंद्र-राज्य समन्वय की प्रक्रिया को स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि जीएसटी का उद्देश्य ‘वन नेशन, वन टैक्स’ की अवधारणा को साकार करना था, जिससे कर प्रणाली को सरल और पारदर्शी बनाया जा सके। सौरभ कुमार ने कर अनुपालन (कम्प्लायंस) प्रणाली, डिजिटल प्लेटफॉर्म और राजस्व संग्रह में आए बदलावों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी बताया कि जीएसटी काउंसिल राज्यों और केंद्र के बीच सहमति आधारित निर्णय लेने की एक अनूठी व्यवस्था है, जिसने संघीय ढांचे को मजबूत किया है।

जीएसटी 2.0 और जेंडर प्रभाव पर विश्लेषण

दूसरे तकनीकी सत्र में जेडीएम कॉलेज के इकोनॉमिक्स विभाग की प्रो. शिल्पा चौधरी ने जीएसटी के विकासक्रम का विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने विशेष रूप से सितंबर 2025 में लागू किए गए जीएसटी 2.0 सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया। प्रो. चौधरी ने बताया कि जीएसटी 2.0 के तहत दर संरचना में संशोधन, डिजिटल अनुपालन में सुधार और छोटे व्यापारियों के लिए प्रक्रियात्मक सरलीकरण जैसे कदम उठाए गए। उन्होंने इन सुधारों के वितरणात्मक (डिस्ट्रीब्यूशनल) प्रभावों की चर्चा करते हुए कहा कि कर नीतियों का असर आय समूहों और सामाजिक वर्गों पर अलग-अलग पड़ता है। उन्होंने जेंडर आयाम पर भी प्रकाश डाला और कहा कि अप्रत्यक्ष कर प्रणाली का महिलाओं की खपत, घरेलू बजट और छोटे महिला-उद्यमों पर विशेष प्रभाव पड़ सकता है। इस संदर्भ में उन्होंने नीति निर्माण में जेंडर-संवेदनशील विश्लेषण की आवश्यकता पर बल दिया।

पैनल चर्चा: उद्योग और बाजार की चुनौतियां

तकनीकी सत्रों के बाद “इंडस्ट्री, सर्विसेज़ और ई-कॉमर्स सेक्टर्स के नजरिए: कम्प्लायंस अनुभव, प्राइसिंग और मार्केट प्रभाव” विषय पर एक पैनल चर्चा आयोजित की गई। पैनल में एनआईपीएफी के डॉ. श्रीहरि नायडू, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) के पूर्व विशेष सचिव और जीएसटी सदस्य शशांक प्रिया, तथा एनीओ रिसर्च सेंटर के मुख्य अर्थशास्त्री और एनडीआईएम के प्रोफेसर डॉ. एस.पी. शर्मा शामिल थे। विशेषज्ञों ने जीएसटी के बदलते ढांचे और विभिन्न क्षेत्रों पर उसके प्रभावों पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि उद्योग जगत के लिए अनुपालन प्रक्रिया को सरल बनाना एक बड़ी चुनौती रहा है, खासकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए। ई-कॉमर्स क्षेत्र में कराधान के नए नियमों ने पारदर्शिता बढ़ाई है, लेकिन साथ ही परिचालन लागत में वृद्धि की चुनौतियां भी सामने आई हैं। पैनलिस्टों ने इस बात पर सहमति जताई कि दीर्घकालिक स्थिरता के लिए कर नीति में निरंतर संवाद और संशोधन की आवश्यकता है।

सत्र की अध्यक्षता और अकादमिक सहभागिता

पैनल चर्चा की अध्यक्षता जेडीएम कॉलेज के कॉमर्स विभाग की प्रो. चंचल चोपड़ा ने की। उन्होंने अपने समापन वक्तव्य में कहा कि जीएसटी जैसे बड़े सुधारों को समझने के लिए केवल आंकड़ों का विश्लेषण पर्याप्त नहीं है, बल्कि जमीनी अनुभव और क्षेत्रीय विविधताओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

कार्यक्रम में छात्रों और शोधार्थियों ने सक्रिय रूप से प्रश्न पूछे और विशेषज्ञों से संवाद किया। इससे वर्कशॉप का उद्देश्य विश्लेषणात्मक क्षमता का विकास और नीति-सम्बंधी समझ को गहरा करना सफल होता दिखाई दिया।





आर्थिक सुधारों की समझ को मजबूत करने का प्रयास

एक दिवसीय इस वर्कशॉप ने प्रतिभागियों को विचारों के आदान-प्रदान, मौजूदा धारणाओं को चुनौती देने और सामूहिक रूप से आर्थिक सुधारों की जटिलताओं को समझने का अवसर दिया। कार्यक्रम का निष्कर्ष इस बात पर केंद्रित रहा कि जीएसटी केवल एक कर सुधार नहीं, बल्कि आर्थिक संरचना को प्रभावित करने वाला व्यापक परिवर्तन है। इसके प्रभाव उपभोक्ताओं, उत्पादकों और बाजार की संरचना तक फैले हुए हैं। आयोजकों ने उम्मीद जताई कि इस तरह की अकादमिक पहलें नीति और शोध के बीच पुल का काम करेंगी और छात्रों में समकालीन आर्थिक मुद्दों पर गहरी समझ विकसित करेंगी।


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