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चुनाव आयोग पर कांग्रेस का निशाना, पवन खेड़ा बोले- प्रेस नोट नाकाफी और विलंबित

देश में चुनाव आयोग को लेकर चल रहे घमासान के बीच कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने शनिवार को कहा कि चुनाव आयोग का प्रेस नोट बेहद कमजोर, अपर्याप्त और देर से आया है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि रिपोर्ट सच थी, लेकिन इसमें कई अहम सवालों के जवाब नहीं दिए गए हैं।

चुनाव आयोग पर कांग्रेस का निशाना, पवन खेड़ा बोले- प्रेस नोट नाकाफी और विलंबित
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नई दिल्ली। देश में चुनाव आयोग को लेकर चल रहे घमासान के बीच कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने शनिवार को कहा कि चुनाव आयोग का प्रेस नोट बेहद कमजोर, अपर्याप्त और देर से आया है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि रिपोर्ट सच थी, लेकिन इसमें कई अहम सवालों के जवाब नहीं दिए गए हैं।

उन्होंने कहा कि दो चुनाव आयुक्तों ने फॉर्म 6 में किए गए बदलावों का विरोध किया। एक ने इन्हें “अनाधिकृत” और “अवैध” बताया। अब चुनाव आयोग का कहना है कि पुराना फॉर्म 6 एसआईआर के बाहर, यानी एसएसआर में उपलब्ध रहेगा। लेकिन बिहार या पश्चिम बंगाल में उन युवा मतदाताओं का क्या होगा जो मताधिकार से वंचित रह गए, जहां एसआईआर के बाद बिना एसएसआर के चुनाव हुए? अगर जनवरी 2024 से एसएसआर आयोजित नहीं किया गया है तो पुराने फॉर्म 6 का क्या महत्व है?

कांग्रेस नेता ने कहा कि चुनाव आयोग का कहना है कि वह ईसीआईएनईटी की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करेगा, जिसकी अध्यक्षता एक वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त (डीईसी) करेंगे और जिसमें एक आईआईटी/आईआईटी विशेषज्ञ भी शामिल होंगे। लेकिन ई-गवर्नेंस, जिसमें ईसीआईएनईटी भी शामिल है, की देखरेख के लिए पहले से ही एक परियोजना संचालन समिति (पीएससी) मौजूद है, जिसमें सभी डीईसी और 3 आईआईटी/आईआईएम विशेषज्ञ शामिल हैं। तो फिर पहले से मौजूद पीएससी का क्या फायदा है कि उसी या इसी तरह की किसी समिति को अब ईसीआईएनईटी की समीक्षा का जिम्मा सौंपा जा रहा है?

उन्होंने कहा कि ईसीआई का कहना है कि रिपोर्ट के बाद गोवा के 97 मतदाताओं में से 81 ने फॉर्म 6 भर दिया है। लेकिन असली सवाल अभी भी बाकी हैं। जैसे कि उन्हें शुरू में ही क्यों बाहर किया गया? इसी कारण से पूरे भारत में कितने अन्य लोगों को बाहर किया गया? और ईसीआई उन्हें ढूंढने और उन्हें बहाल करने की क्या योजना बना रहा है?

कांग्रेस नेता ने कहा कि ज्ञानेश कुमार चाहे जितनी कोशिश कर लें, इन लंबे प्रेस नोटों के पीछे छिप सकते हैं। वे इस गड़बड़ी से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते। उन्हें या तो इस्तीफा देकर सरकारी गवाह बन जाना चाहिए, या फिर राजद्रोह के मुकदमे का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।


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