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मोहन भागवत के बयान का अमित मालवीय ने किया स्वागत, बोले- जेन जी से संवाद की यह सकारात्मक शुरुआत

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आईटी विभाग के प्रमुख अमित मालवीय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत के जेन जी और छात्रों के विरोध-प्रदर्शन को लेकर दिए गए बयान का स्वागत किया है

मोहन भागवत के बयान का अमित मालवीय ने किया स्वागत, बोले- जेन जी से संवाद की यह सकारात्मक शुरुआत
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नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आईटी विभाग के प्रमुख अमित मालवीय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत के जेन जी और छात्रों के विरोध-प्रदर्शन को लेकर दिए गए बयान का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि सार्थक संवाद की पहली शर्त यह है कि सामने वाले के विचारों को सुनने और समझने की इच्छा हो।

अमित मालवीय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा कि "सार्थक संवाद की दिशा में पहला कदम यह स्वीकार करना है कि सामने वाले के पास भी ऐसा दृष्टिकोण है, जिसे सुना जाना चाहिए। जेन जी को लेकर मोहन भागवत जी की टिप्पणी इसी दिशा में एक विचारशील शुरुआत है।"

उन्होंने भागवत के उस बयान का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि "उनकी (जेन जी की) शिकायतें वास्तविक हैं।"

मालवीय ने कहा कि भागवत ने लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन की भूमिका को लेकर भी महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया है। उनके अनुसार, जब संवाद से समाधान नहीं निकलता, तब लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन सहमति बनाने का एक वैध माध्यम है। हालांकि, इसका उद्देश्य मतभेदों को सुलझाना होना चाहिए, न कि समाज में विभाजन को और गहरा करना।

भाजपा नेता ने कहा कि वास्तविक चिंताओं को स्वीकार करते हुए संवाद की आवश्यकता पर जोर देना एक आत्मविश्वासी लोकतंत्र की पहचान है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यदि जेन जी के साथ संवाद की शुरुआत इसी सोच के साथ होती है, तो यह एक स्वागतयोग्य और रचनात्मक कदम होगा।

दरअसल, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को मुंबई में आयोजित इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस के कार्यक्रम में 2,000 से अधिक जेन जी और जेन अल्फा के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा था कि नई पीढ़ी पिछली पीढ़ियों की तुलना में अधिक ईमानदार है और यदि उन्हें किसी पर आंख बंद करके भरोसा करना हो तो वह जेन जी पर करेंगे।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी मुद्दे पर विरोध करने वाले युवाओं को 'राष्ट्रविरोधी' नहीं कहा जा सकता। उनकी शिकायतों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। भागवत ने कहा था कि लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन संवाद का एक वैध माध्यम है, लेकिन इसका इस्तेमाल समाज में विभाजन पैदा करने के लिए नहीं होना चाहिए। उन्होंने शिक्षा नीति में सुधार की जरूरत पर भी जोर दिया था।


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