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विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों : केवाईसी कॉपी प्रमाणन की प्रक्रिया को किया आसान

नई दिल्ली, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए अनुपालन प्रक्रिया को आसान कर दिया है। इसके तहत भारतीय बैंक अब विदेशों में अधिकृत अधिकारियों द्वारा प्रमाणित कुछ निर्दिष्ट केवाईसी दस्तावेजों की मूल प्रमाणित प्रतियां स्वीकार कर सकेंगे।

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों : केवाईसी कॉपी प्रमाणन की प्रक्रिया को किया आसान
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नई दिल्ली, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए अनुपालन प्रक्रिया को आसान कर दिया है। इसके तहत भारतीय बैंक अब विदेशों में अधिकृत अधिकारियों द्वारा प्रमाणित कुछ निर्दिष्ट केवाईसी दस्तावेजों की मूल प्रमाणित प्रतियां स्वीकार कर सकेंगे।

आरबीआई (वाणिज्यिक बैंक–केवाईसी) संशोधन निर्देश, 2026 के माध्यम से जारी यह बदलाव तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। इसके साथ ही एफपीआईको भी वह सुविधा मिल गई है, जो पहले अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) और भारतीय मूल के व्यक्तियों (पीआईओ) के लिए उपलब्ध थी।

बैंक केवाईसी दस्तावेजों की मूल प्रमाणित प्रतियां स्वीकार कर सकते हैं, बशर्ते उन्हें आरबीआई के ढांचे के तहत मान्यता प्राप्त अधिकारियों द्वारा प्रमाणित किया गया हो।

दस्तावेजों को प्रमाणित करने वाले अधिकृत अधिकारियों में भारत में पंजीकृत अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की विदेशी शाखाओं के अधिकारी, ऐसे विदेशी बैंकों की शाखाओं के अधिकारी जिनके साथ भारतीय बैंकों के संबंध हैं, विदेश में नोटरी पब्लिक, कोर्ट मजिस्ट्रेट, न्यायाधीश तथा उस देश में भारतीय दूतावास या महावाणिज्य दूतावास शामिल हैं, जहां गैर-निवासी ग्राहक रहता है।

इसका मतलब है कि विदेशों में स्थित एफपीआई को अब संबंधित दस्तावेजों को भारत में प्रमाणित कराने की प्रक्रिया से गुजरने की जरूरत नहीं होगी। वे भारतीय बैंक में मूल प्रमाणित प्रति जमा करने से पहले मान्यता प्राप्त विदेशी प्रमाणन माध्यमों में से किसी एक का इस्तेमाल कर सकेंगे।

हालांकि, आरबीआई के संशोधन में बैंकों द्वारा एफपीआई का केवाईसी सत्यापन करने की मूल आवश्यकता को बरकरार रखा गया है।

इस महीने शुक्रवार तक एफपीआई ने एक्सचेंजों के जरिए बिक्री करते हुए 23,676 करोड़ रुपए की निकासी की थी। इससे संकेत मिलता है कि जुलाई और अगस्त में सकारात्मक प्रवाह के बाद भारत में एफपीआई प्रवाह एक बार फिर नकारात्मक हो गया है।

इसकी वजह अमेरिका-ईरान के बीच मध्य पूर्व में बढ़ता संघर्ष और अमेरिकी के 10 साल के बॉन्ड यील्ड का 5 प्रतिशत पर पहुंचना को माना जा रहा है। हालांकि, भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और कंपनियों की बेहतर आय वृद्धि की उम्मीदें सकारात्मक कारक बने हुए हैं।


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