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भूजल की भयावह परिस्थिति

देश के भूजल में आर्सेनिक और क्रोमियम से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम का उजागर होना बेहद डरावना और चिंतित करने वाला है

भूजल की भयावह परिस्थिति
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  • अरविंद जयतिलक

हालत यह है कि कहीं भूजल सीमा से अधिक खारा हो चुका है तो कहीं उसमें आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर पर पहुंच गयी है। आंकड़ों में कहा गया है कि 200 मीटर की गहराई पर मौजूद भूजल का बड़ा हिस्सा दूषित हो चुका है वहीं 23 फीसद भूजल अत्यधिक खारा हो चुका है। 37 फीसद भूजल में आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच गयी है।

देश के भूजल में आर्सेनिक और क्रोमियम से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम का उजागर होना बेहद डरावना और चिंतित करने वाला है। यह खुलासा हाल ही में प्रकाशित 'इंडियन मेडिकल जर्नल' के तथ्यों से हुआ है। इस पत्रिका के विश्लेषण में आर्सेनिक से कैंसर का जोखिम सबसे बड़ी चिंता के तौर पर उभरा है। आर्सेनिक वाले पानी के सेवन से 49 फीसदी वयस्कों और 60 फीसदी बच्चों में संभावित गैर-कैंसर वाले स्वास्थ्य के दूसरे जोखिम की आशंका जताई गई है। बच्चों में दूषित पानी के त्वचा से संपर्क से भी खतरा सामने आया है। कैंसर के जोखिम के आंकलन में आर्सेनिक के संपर्क से जुड़े 72 फीसदी वयस्क और 69 फीसदी बच्चों के अध्ययनों में पानी के जरिए जोखिम तय सीमा से अधिक पाया गया है। क्रोमियम के मामले में यह आंकड़ा वयस्कों में 50 फीसदी और बच्चों में 56 फीसदी रहा।

चिंतित करने वाला तथ्य यह भी है कि सतही पानी की तुलना में भूजल में गैर-कैंसरकारी स्वास्थ्य जोखिम ज्यादा पाया गया है। देश के राज्यों की बात करें तो पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, बिहार और जम्मू-कश्मीर समेत कई क्षेत्रों में आर्सेनिक को लेकर जोखिम बढ़ा है। पंजाब के तो कई जिलों में आर्सेनिक से दूषित भूजल से कैंसर का जोखिम तय सीमा से अधिक है। गौर करें तो यह पहली बार नहीं है जब दूषित भूजल को लेकर उपजने वाले खतरों के संबंध में खुलासा हुआ है। गत वर्ष 'भारतीय मानक ब्यूरो' (बीआईएस) द्वारा जारी रिपोर्ट में दिल्ली के पेयजल की गुणवत्ता देश में सबसे निचले स्तर पर होने का खुलासा किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के पेयजल के नमूने 19 मानदंडों में से किसी पर खरे नहीं पाए गए थे।

देश के अधिकांश राज्यों की भी स्थिति कमोवेश ऐसी ही है। अमेरिका के ड्यूक विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा दावा किया जा चुका है कि भारत के भूजल में हानिकारक यूरेनियम की मात्रा 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' (डब्ल्यूएचओ) के मानकों से अधिक है। यह शोध जर्नल 'एनवायरमेंटल साइंस एंड टेक्नालॉजी लेटर्स' में प्रकाशित हुआ था जिसमें भारत के 16 राज्यों के भूजल में खतरनाक स्तर पर यूरेनियम होने का दावा किया गया था। 'डब्ल्यूएचओ' ने भारत के लिए प्रति लीटर पेयजल में 30 माइक्रोग्राम यूरेनियम की मात्रा को सुरक्षित माना है, जबकि भारत के भूजल में यूरेनियम की मात्रा बहुत अधिक है। गत वर्ष ही विज्ञान पत्रिका 'नेचर जियो साइंस' द्वारा भी खुलासा किया जा चुका है कि सिंधु और गंगा नदी के मैदानी क्षेत्र का तकरीबन 60 फीसद भूजल दूषित हो चुका है।

हालत यह है कि कहीं भूजल सीमा से अधिक खारा हो चुका है तो कहीं उसमें आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर पर पहुंच गयी है। आंकड़ों में कहा गया है कि 200 मीटर की गहराई पर मौजूद भूजल का बड़ा हिस्सा दूषित हो चुका है वहीं 23 फीसद भूजल अत्यधिक खारा हो चुका है। 37 फीसद भूजल में आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच गयी है। आर्सेनिक एक जहरीला तत्व होता है जो प्राकृतिक रूप से भूजल में पाया जाता है, लेकिन अत्यधिक खनन और फर्टिलाइजर के इस्तेमाल के कारण इसकी मात्रा लगातार बढ़ रही है। इसके उपयोग से डायरिया, उल्टी, खून वाली उल्टियां, पेशाब में खून आना, बाल गिरना और पेट दर्द जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। साथ ही इससे फेफड़े, त्वचा, किडनी और लिवर प्रभावित होते हैं।

दूषित भूजल में खतरनाक रोग उत्पन करने वाले जीव पाए जाते हैं जो स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। इसमें पाए जाने वाले विषाणु पीलिया, पोलियो, गैस्ट्रोइंटराइटिस और चेचक जैसे रोगों को जन्म देते हैं वहीं जीवाणुओं द्वारा अतिसार, पेचिस, मियादी बुखार, हैजा, सूजाक व क्षयरोग उत्पन होते हैं। आर्सेनिक के अलावा दूषित भूजल में कैडमियम, लेड, मरकरी, निकल तथा सिल्वर की मात्रा भी बढ़ जाती है जो सेहत के लिए बेहद खतरनाक साबित होता है। दूषित भूजल में लोहा, मैंगनीज, कैल्सियम, बेरियम, बोरान एवं अन्य लवणों जैसे नाइट्रेट, सल्फेट, बोरेट और कार्बोनेट इत्यादि की अधिकता भी मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

एक आंकड़े के मुताबिक हर आठ सेंकेंड में एक बच्चा दूषित भूजल के सेवन से जीवन खो रहा है। हर साल पचास लाख से अधिक लोग दूषित भूजल के सेवन से मौत के मुंह में जा रहे हैं। यह समझना होगा कि भूजल जलापूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत है जिसका उचित उपयोग और संरक्षण होना चाहिए। भूजल पीने के पानी के अलावा पृथ्वी में नमी बनाए रखने में भी मददगार साबित होता है। पृथ्वी पर उगने वाली वनस्पति तथा फसलों का पोषण भी इसी जल से होता है। यहां यह भी जानना जरूरी है कि अन्य देशों की तुलना में भारत में सालाना मीठे व स्वच्छ पानी की खपत अधिक होती है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, घरेलू, कृषि एवं औद्योगिक उपयोग के लिए प्रतिवर्ष 761 बिलियन घनमीटर जल का इस्तेमाल होता है।

मौजूदा समय में पानी की कमी बढ़ गयी है। गिरता भूजल सिर्फ महाराष्ट्र के मराठवाड़ा, उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड या बिहार के सीतामढ़ी तक ही सीमित नहीं है। पंजाब व हरियाणा जैसे राज्यों में भूजल स्तर 70 फीसद तक नीचे पहुंच चुका है। विगत वर्षों के आंकड़ों के मुताबिक भारत के 29 फीसद विकासखंड भूजल के दयनीय स्तर पर हैं। हालांकि देश में जल-संरक्षण तथा प्रबंधन कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए समय-समय पर अनेक उपाय किए गए हैं। मसलन 1945 में 'केंद्रीय जल आयोग' का गठन किया गया जो राज्यों के सहयोग से देश भर में जल संसाधनों के विकास, नियंत्रण, संरक्षण तथा समन्वय को आगे बढ़ाता है।

1970 में 'केंद्रीय भू-जल बोर्ड' का गठन किया गया। बोर्ड का मुख्य कार्य भू-जल संसाधनों के प्रबंधन, स्थायी एवं वैज्ञानिक विकास के लिए प्रौद्योगिकियों को विकसित करना तथा राष्ट्रीय नीति की निगरानी में उन्हें वितरित करना है। इसी तरह 1980 में 'राष्ट्रीय जल बोर्ड' तथा 2006 में भू-जल के कृत्रिम पुनर्भरण के लिए सलाहकार परिषद का गठन किया गया। 2012 में 'राष्ट्रीय जल नीति' बनाई गई जिसके तहत सुनिश्चित किया गया कि जल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए वर्षा का प्रत्यक्ष उपयोग एवं अपरिहार्य वाष्पोत्सर्जन को कम करने का प्रयास होगा। देश में भूजल की मात्रा एवं गुणवत्ता की स्थिति का पता लगाया जाएगा। जलवायु परिवर्तन के अनुरूप जल संसाधनों के संरक्षण तथा प्रौद्योगिकी विकल्प को आजमाया जाएगा। औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जल उपयोग हेतु परियोजना मूल्यांकन एवं पर्यावरणीय अध्ययन का विश्लेषण किया जाएगा।

इन प्रयासों के बावजूद भारत में जल-संरक्षण एवं प्रबंधन हेतु व्यापक स्तर पर संचालित कार्यक्रम परिणाम की दृष्टि से प्रभावी साबित नहीं हुए है। भूजल के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए एक स्पष्ट प्रभावी कानूनी ढांचे का अभाव बना हुए है। नतीजा भूजल न सिर्फ बुरी तरह प्रदूषित हो रहा है, बल्कि उसके स्तर में भी भारी गिरावट आ रही है। हैरानी यह है कि इस गहराते संकट का असर दिखने के बाद भी इसके बचाव के लिए लिए कोई कारगर पहल नहीं हो रही है। नतीजे में हर वर्ष अरबों घनमीटर भूजल दूषित हो रहा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार हैं।)


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