संसद के मानसून सत्र में जारी रहेगी गरमा-गरमी
सीजेपीआंदोलन और वांगचुक को ज़बरदस्ती हटाने के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों से बातचीत करके मसला सुलझाने से बचने की केंद्र की कार्रवाई की विपक्ष और अन्य लोगों ने व्यापक निंदा की है

- डॉ. ज्ञान पाठक
सीजेपीआंदोलन और वांगचुक को ज़बरदस्ती हटाने के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों से बातचीत करके मसला सुलझाने से बचने की केंद्र की कार्रवाई की विपक्ष और अन्य लोगों ने व्यापक निंदा की है। जहां संसद के मॉनसून सत्र के दौरान इस मुद्दे पर हंगामा होने की संभावना है, वहीं बाहर भी यह विरोध प्रदर्शन और तेज़ हो सकता है।
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के 20 जुलाई के संसद मार्च को विफल करने के लिए दिल्ली पुलिस ने आखिरकार लाठी चार्ज का सहारा लिया। विपक्षी नेताओं, सीजेपी कार्यकर्ताओं और बड़ी संख्या में लेखकों, कलाकारों, मशहूर हस्तियों और आम लोगों का कहना है कि यह लोकतांत्रिक आंदोलन को ज़बरदस्ती दबाने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं है। सीजेपीआंदोलन, जो 16 मई को अभिजीत दिपके द्वारा एक व्यंग्यात्मक ऑनलाइन आंदोलन के तौर पर शुरू किया गया था, अब इतना बड़ा हो चुका है कि जानकारों का मानना है कि इसे दबाया नहीं जा सकता, क्योंकि इसे समाज के सभी वर्गों और देश की सभी विपक्षी पार्टियों से भारी समर्थन मिला है।
अब जाकर खबर आई है कि केंद्र सरकार प्रदर्शनकारियों से बात करने को तैयार है, पर अब तक वह सीजेपी के आन्दोलन का जवाब जोर ज़बरदस्ती से देती रही है। उन्होंने लगभग विरोध स्थल को सील कर दिया और प्रदर्शनकारियों के लिए लॉजिस्टिक्स से जुड़ी बड़ी मुश्किलें खड़ी कर दीं। अब सीजेपी कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने अपना रुख और कड़ा कर लिया है, विरोध जारी रखने का संकल्प लिया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की भी मांग की है।
संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन के तेज होने के कारण मानसून सत्र के हंगामेदार होने की पूरी संभावना है। हालांकि, विपक्ष केंद्र सरकार द्वारा सीजेपीके 'लोकतांत्रिक विरोध को दबाने' और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान (जिनके इस्तीफे की वे पहले ही मांग कर चुके हैं) को बचाने के मुद्दे पर सदन के भीतर विरोध प्रदर्शन करने की योजना बना रहा है।
संसद के भीतर विपक्ष के विरोध का एक खास मौका तब आएगा जब केंद्र सरकार 'विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल, 2025' नाम का एक संशोधित बिल पेश करेगी, जिसे पहले 'हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (एचईसीआई) बिल' के नाम से जाना जाता था। यह बिल अपने पुराने रूप में काफी विवादास्पद था। नया 'शिक्षा अधिष्ठान बिल, 2025' मौजूदा यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी), ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) और नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (एनसीटीई) की जगह एक ही उच्च शिक्षा नियामक लाने का प्रस्ताव करता है।
विपक्ष का आरोप है कि केंद्र सरकार इस बिल के जरिए देश में उच्च शिक्षा को बर्बाद कर रही है और हिंदुत्व-ब्रांड की शिक्षा थोपने की कोशिश कर रही है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि इसके प्रावधान मौजूदा कानूनी ढांचे को नहीं बदलते हैं। धर्मेंद्र प्रधान का विपक्ष के साथ सीधा टकराव होगा, क्योंकि विपक्ष परीक्षा में गड़बड़ी और पेपर लीक को लेकर पहले ही उनके इस्तीफे की मांग कर चुके हैं।
विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बार-बार प्रधान पर राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी भ्रष्टाचार और सिस्टम की विफलता के लिए जिम्मेदार होने का आरोप लगाया है। उन्होंने बड़े पैमाने पर पेपर लीक का हवाला देते हुए पूरे सिस्टम को 'धोखाधड़ी' करार दिया है और देश के लाखों छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने के लिए उनके इस्तीफे की मांग की है। उन्होंने प्रधान पर यह आरोप भी लगाया था कि वे सीबीएसई के उस फ़ैसले में शामिल थे, जिसके तहत एक विवादित कंपनी को ऑन-स्क्रीन मार्किंग का ठेका दिया गया था।
एनसीपी (एसपी) के अध्यक्ष शरद पवार ने कहा, 'केंद्र ने स्थिति को ठीक से नहीं संभाला, और इसका असर कई छात्रों के भविष्य पर पड़ा। जब दूसरी राजनीतिक पार्टियां उनके (वांगचुक के) समर्थन में आईं, तो सरकार सिफ़र् तमाशबीन बनी रही। कांग्रेस, एनसीपी (एसपी) के नेताओं, जिनमें सुप्रिया सुले और कई अन्य शामिल हैं, ने वहां (जंतर-मंतर) जाकर एक जैसी मांग रखी।'
आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा, 'प्रधानमंत्री ने सिफ़र् सोनम वांगचुक को गिरफ़्तार करने के लिए दिल्ली पुलिस कमिश्नर को बदल दिया। छात्रों द्वारा उठाए जा रहे सवालों का सरकार के पास कोई जवाब नहीं है और इसके बजाय वह उनकी आवाज़ दबाने की कोशिश कर रही है।'
टीएससीप्रमुख ममता बनर्जी ने कहा, 'उन्होंने (वांगचुक ने) सिफ़र् बातचीत की मांग की थी, फिर भी हफ़्तों तक उनकी इस अपील पर कोई जवाब नहीं दिया गया। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध पर बातचीत होनी चाहिए, न कि चुप्पी साधी जानी चाहिए। ...जनता का भरोसा पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक अधिकारों के सम्मान से हासिल होता है - न कि शांतिपूर्ण विरोध को दबाने या बातचीत से इनकार करने से।'
शिवसेना (यूबीटी)नेता आदित्य ठाकरे ने दिल्ली में प्रदर्शन स्थल से एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को हटाए जाने की आलोचना करते हुए कहा कि दुनिया देख रही है कि देश में ज़बरदस्ती लोकतंत्र को तोड़ा जा रहा है, जहां शांतिपूर्ण विरोध को भी अब बर्दाश्त नहीं किया जाता।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने सोनम वांगचुक को ज़बरदस्ती हटाए जाने की निंदा करते हुए इसे 'लोकतंत्र और संविधान पर एक काला धब्बा' बताया। खड़गे ने कहा, 'चाहे प्रो. जीडी अग्रवाल हों, जिन्होंने मां गंगा को बचाने के लिए 111 दिनों तक आमरण अनशन किया, या हरियाणा के ओलंपिक पहलवान, चाहे हमारे 750 किसान हों, दलित और आदिवासी हों, या पेपर लीक की भेंट चढ़े 25 बच्चे और उनके परिवार हों - इस ज़ालिम सरकार ने किसी को नहीं बख्शा... उनकी नजऱ में, जो कोई भी आवाज़ उठाता है, वह 'राष्ट्र-विरोधी' या 'परजीवी' है!'
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा, 'दमनकारी भाजपा सरकार की इस अनुचित कार्रवाई ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारे देश की मानवीय और लोकतांत्रिक छवि को बुरी तरह धूमिल और खंडित किया है... भाजपा की सोच बांटने वाली है; इसीलिए जहां भी एकता, सद्भाव और एकजुटता होती है, भाजपा डर के मारे प्रतिक्रियावादी रवैया अपनाती है और आंदोलनों को तितर-बितर कर देती है। लेकिन भाजपा भूल गई है कि आज की नई पीढ़ी 'डिजिटल एकता' के ज़रिए वैचारिक क्रांति लाने में सक्षम है। ऐसा हुआ है, हो रहा है और आगे भी होगा...।'
आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने कहा है, 'यह अहंकार गलत है। 'कॉकरोच आंदोलन' को कुचलने के बजाय, देश की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाएं। सोनम वांगचुक के साथ ज़बरदस्ती करना मोदी सरकार की हार है।'
सीजेपीआंदोलन और वांगचुक को ज़बरदस्ती हटाने के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों से बातचीत करके मसला सुलझाने से बचने की केंद्र की कार्रवाई की विपक्ष और अन्य लोगों ने व्यापक निंदा की है। जहां संसद के मॉनसून सत्र के दौरान इस मुद्दे पर हंगामा होने की संभावना है, वहीं बाहर भी यह विरोध प्रदर्शन और तेज़ हो सकता है।


