ललित सुरजन की कलम से - हिमाचल प्रदेश- अंतिम: स्वर्ग से वापस धरती पर
'यूरोप के जैकोबियन शिल्प में निर्मित तिमंजिला भवन का एक हिस्सा ही आम जनता के लिए खुला है

'यूरोप के जैकोबियन शिल्प में निर्मित तिमंजिला भवन का एक हिस्सा ही आम जनता के लिए खुला है। बाकी में संस्थान की नियमित गतिविधियां संचालित होती हैं। यहां देश से विभिन्न अनुशासनों के ख्यातिप्राप्त विद्वान फैलोशिप पर आते हैं और शांत सुरम्य वातावरण में बैठकर चिंतन, मनन, लेखन करते हैं। ग्राउंड फ्लोर पर तीन भव्य कक्ष जनता के लिए खुले हैं और उनसे भारत के दो सौ साल के इतिहास की एक मुकम्मल तस्वीर देखने मिल जाती है।
पहले कक्ष में लाट साहब की ऊंची कुर्सी है जहां उनके सामने हाजिरी बजाने गुलाम देश के बड़े-बड़े लोग आते थे। अंग्रेजी राज में क्या-क्या हुआ, इसका एक परिचय यहां चित्रों और अन्य सामग्रियों से मिलता है। दूसरे कक्ष में स्वाधीनता संग्राम की झलक मिलती है।
इस कक्ष में आकर पता चलता है कि हमारे महान स्वाधीनता सेनानियों ने आज़ादी के लिए कितने कष्ट उठाए और कितनी कुर्बानियां दीं। तीसरे कक्ष में स्वतंत्र भारत ने विगत सत्तर वर्षों में जो कुछ हासिल किया है उसके साक्ष्य प्रदर्शित हैं। हमें देखकर अच्छा लगा कि हबीब तनवीर का चित्र भी इस कक्ष में प्रदर्शित था।'
(देशबन्धु में 28 सितम्बर 2017 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2017/09/blog-post_27.html


