शिक्षा संस्थान बौद्धिक संबोधनों की जगह : नाराज फूफा जैसे चुटकुलों की नहीं!
आदमी का स्वभाव है नीचे की तरफ आना। ऊपर उठाने में बहुत मेहनत करना पड़ती है

आदमी का स्वभाव है नीचे की तरफ आना। ऊपर उठाने में बहुत मेहनत करना पड़ती है। समझ लीजिए नेहरू को देश का मानसिक स्तर ऊपर लाने में कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी। भारत जिसे विदेशों में सांप सपेरों का देश कहा जाता था। वह वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, डाक्टरों, फाइनेंस, मैनेजमेंट विशेषज्ञों का देश कहलाने लगा। मगर नीचे लाने के लिए एक हल्की बात बहुत है। एक फूहड़ मजाक ऐसे दस और मजाकों को जन्म देता है।
आजादी का आन्दोलन का समय और फिर इसके बाद नेहरू से शुरू हुआ आजादी का दौर भारत के बौद्धिक विकास की कहानी है। केवल विज्ञान तकनीक में ही नहीं कला, साहित्य, फिल्म, संगीत हर क्षेत्र में।
लेकिन अब देश को बौद्धिक रसातल में पहुंचाया जा रहा है। कुछ भी बोलने की आदत, बोलते ही रहने और बोलने को योग्यता समझ लेने ने देश में बातें ही बातें पैदा कर दी हैं और बातों को ही काम का पर्याय समझा जा रहा है। विश्वविद्यालय कालेज दुनिया भर में सबसे मौलिक विचारों के जन्म स्थल के रूप में जाने जाते हैं और हमारे यहां इन्हें सस्ते चुटकुलों का स्थान बनाया जा रहा है।
प्रधानमंत्री एक व्यक्ति नहीं एक संस्थान हैं। उनके पीछे एक पूरी टीम होती है। देश के टाप ब्यूरोक्रेट से लेकर विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाशाली लोगों की। मगर मोदीजी ने लगता है चलताऊ चुटकुले सुनाने वालों को अपने आसपास इक_ा कर लिया है।
प्रधानमंत्री बनने से पहले भी कोई बहुत योग्य लोग उनके साथ नहीं थे। 2013 में जब उन्हें इस गद्दी के लिए सजाया जा रहा था तब भी इसी कालेज में उन्हें लाया गया था और उन्होंने नाले के गैस से चाय और बादलों में रडार काम नहीं करता है जैसी मौलिक स्थापना कि-ग्लास न आधा भरा है न खाली है यहीं दी थी।
देश के सबसे प्रतिष्ठित कालेजों में से एक श्रीराम कालेज आफ कामर्स में (एसआरसीसी) उस समय भी इसका मजाक बहुत बना था। इसे व्यंग्य में विज्ञान की सबसे नई खोज कहा गया। लेकिन लगता है मोदीजी ने उसे बहुत गंभीरता से कहा था और शनिवार को जब वे दोबारा यहां आए तो अपने इस मौलिक विचार का गर्व से जिक्र किया। लगता है अब वे बादलों में रडार और नाले की गैस से चाय जैसे मौलिक आइडियों को भी जल्दी ही फिर दोहराएंगे।
कहें! कुछ भी कह सकते हैं! सुचिंतित विचार हैं। देश को रसातल में ले जाने के लिए। नेहरू का विज्ञान और बड़ा नजरिया ऐसे ही थोड़ी खत्म होगा। आईआईटी को आईटीआई नहीं बना पाए। मगर आईआटीयन का दिमाग बिल्कुल निचले स्तर पर ले जाने का काम जारी है।
हावर्ड से नफरत का बदला मजदूरी तो नहीं! हार्ड वर्क तो सब करते हैं। मगर इसमें बौद्धिक पुट होता है तो बड़ी चीज निकलती है। लेकिन अगर केवल पसीना बहाने को ही हार्ड वर्क माना जाता है तो इससे केवल गरीबी बढ़ती है।
हावर्ड का जवाब देना था तो इस जैसी एक यूनिवर्सिटी खोल देते। मगर यूनिवर्सिटी दूर रहा कोई कालेज तक नहीं खोला। 97 हजार स्कूल बंद कर दिए। पढ़ेगा इंडिया तो पूछेगा इंडिया! यह बिल्कुल नहीं चाहिए तो पढ़ाई-लिखाई बंद कर दो। इसे बिल्कुल निचले स्तर पर ले आओ।
देश के टाप शिक्षा संस्थान नाराज फूफा जैसे मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम आय वर्ग के शादी ब्याह के चलताऊ चुटकुलों के लिए होते हैं? एक मूर्खता दस मूर्खताओं को पैदा करती है। बुद्धि इतनी ताकतवर नहीं होती। एक अक्ल की बात समझाना ही मुश्किल होती है। दस अक्लमंद बनाना तो बड़ी बात। आदमी का स्वभाव है नीचे की तरफ आना। ऊपर उठाने में बहुत मेहनत करना पड़ती है। समझ लीजिए नेहरू को देश का मानसिक स्तर ऊपर लाने में कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी। भारत जिसे विदेशों में सांप सपेरों का देश कहा जाता था। वह वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, डाक्टरों, फाइनेंस, मैनेजमेंट विशेषज्ञों का देश कहलाने लगा।
मगर नीचे लाने के लिए एक हल्की बात बहुत है। एक फूहड़ मजाक ऐसे दस और मजाकों को जन्म देता है। एक पत्रकार पूछ रही हैं। गोदी मीडिया की केटेगरी में बड़ी पत्रकार माने जानी वाली कि नाराज फूफा तो प्रधानमंत्रीजी ने बता दिए। नाराज फूफियां कौन हैं?
सभ्य समाज की मुख्य पहचान में सेंस आफ ह्यूमर ( मजाक समझने और करने की समझ) माना जाता है। वह तो छोड़िए, खुद ऊपर से प्रधानमंत्री लेवल से उसे नीचे धकेला जा रहा है। लेकिन भारतीय रिश्तों की समझ का तो पढ़े -लिखे होने से कोई ताल्लुुक नहीं हैं। हमारे यहां अनपढ़ कम पढ़े-लिखे भी जानते हैं कि कौन से रिश्ते का क्या मतलब होता है?
अफसोस इन सारी चीजों को बताना पड़ रहा है! मगर क्या करें नाराज फूफी का मुहावरा न चल जाए इसलिए लिखना पड़ रहा है। पत्रकार महिला हैं तो फूफी हो सकती हैं तो उन्हें मालूम होगा कि फूफी ब्लड रिलेशन है। अभी रक्षाबंधन बीता है। भाई से बहुत गहरा लगाव होता है एवं उसके बच्चों से और ज्यादा।
नाराज फूफी हो ही नहीं सकती। भतीजे-भतीजियों में उसके मायके की खुशबू आती है और अब नाराज फूफा भी बताएं क्या। प्रधानमंत्री ने कहा है तो लेखक पत्रकारों के यह दिन आ गए!
सब दुआ करो, प्रार्थना करो कि अब कहीं जीजा-साली, देवर-भाभी के मजाक न सुनाने लग जाएं!
अरे रिश्तों की ही बात करना है तो उन छात्र युवाओं के माता-पिता की करो जो रात-दिन मेहनत करके, कर्जा लेकर अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। नाराज फूफा नहीं नाराज मां-बाप हैं। दु:खी हैं। निराश हैं।
प्रधानमंत्री को उनकी बात करना चाहिए। पेपर लीक रोकने से लेकर, शिक्षा व्यवस्था के विस्तार, गुणवत्ता की। उसकी आवाज उठाने वाले छात्र और उनके माता-पिता को मारने की बात करने वाले स्वतंत्र भारद्वाज जैसे गुंडों पर कड़ी कार्रवाई करने और यह बताने की कि सरकार से संबंध होने का जो यह दावा कर रहे हैं वह गलत है।
हम वह मुहावरा लिखना बिल्कुल नहीं चाह रहे मगर सच यह है कि नाराज फूफा आप हैं! नाराज फूफा का जो सारा कान्सेप्ट है वह यह है कि खुद कुछ न करके सब पर आरोप लगाओ।
आप वही काम कर रहे हैं। देश का प्रधानमंत्री काम करने के लिए होता है। दूसरों की गलतियां, कमियां निकालने के लिए नहीं। मटर छीलने वाले के पास बस मटर छीलने का अधिकार होता है। मगर फूफा उसे बताता है कि सब्जी कैसे बनेगी! और मटर गलत तरीके से छीले जा रहे हैं। अच्छी बनेगी ही नहीं!
मोदी जी जनता सवाल उठा रही है। उस पर उल्टे सवाल मत उठाइए। नाराज फूफा कहकर उसे चुप मत करवाइए। गुंडे तो कैमरे पर आकर, सोशल मीडिया पर लिखकर धमकियां दे रहे हैं कि जिसने भी आवाज उठाई उनके साथ गालियां देकर की ये करेंगे वो करेंगे। और इधर आप आवाज उठाने वालों का मजाक बना रहे हैं! और अभी तो होम्योपैथी की गोली दी यह धमकी दे रहे हैं!
क्या सोच रहे हैं आप कि छात्र युवा डर जाएगा? राहुल इस बार आपके सबसे मजबूत इलाके इन्दौर में जाकर छात्रों का प्रोग्राम गूंज कर रहे हैं। वहां 2023 के विधानसभा चुनाव में जिले की सभी 9 सीटें कांग्रेस हार गई थी। उसके बाद 2024 के लोकसभा में कांग्रेस के प्रत्याशी अक्षय कांति बम नाम वापसी के आखिरी दिन अपना नामांकन वापस लेकर बीजेपी में शामिल हो गए थे।
कांग्रेस प्रत्याशी न होने से भाजपा प्रत्याशी जिनका भाजपा में ही विरोध था शंकर लालवानी 11 लाख 75 हजार वोटों से जीत गए। उस इन्दौर को चुनना छात्र और युवाओं की ताकत पर भरोसा है। राहुल के चार कार्यक्रम हो चुके हैं। कोटा, देहरादून, प्रयागराज और पूणे। सब एक से बढ़कर एक। यह छात्र युवाओं के मिज़ाज में आ रहे बदलाव का प्रतीक हैं।
अब यह पांचवा इन्दौर का गेम चेंजर होने वाला है। इसकी सफलता देश से निराशा के बादल पूरी तरह छांट देगी। घबराहट सत्ता पक्ष में है। युवा छात्रों का मुकाबला न तो लाठी, गोली से किया जा सकता है। जो दिल्ली और बिहार में करके देख लिया। और न ही उन्हें नाराज फूफा बताकर उनका उपहास करने से!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


