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शक्ति के साथ मान्यता के लिये कॉकरोचों को राहुल की दरकार

केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) अमेरिका से लौटे अभिजीत दिपके के नेतृत्व में छह मई से दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन कर रही है

शक्ति के साथ मान्यता के लिये कॉकरोचों को राहुल की दरकार
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पर्यावरणवादी कार्यकर्ता तथा आमिर खान की 'थ्री इडियट्स' के चलते देश भर में और बड़ी पहचान बनाने वाले सोनम के प्रति आदर भाव तो है लेकिन उन्होंने भाजपा सरकार के अनेक कामों का जिस तरह से समर्थन किया है, उनके चलते सोनम की राजनीतिक प्रतिबद्धता अपने आप में संदिग्ध है। तिस पर सोनम ने बिना किसी पूर्व तैयारी और या योजना के 28 जून से भूख हड़ताल शुरू कर दी।

केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) अमेरिका से लौटे अभिजीत दिपके के नेतृत्व में छह मई से दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन कर रही है। लेह-लद्दाख के प्रसिद्ध पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का नाम दुनिया भर में आदर के साथ लिया जाता है। उनके नाम से सैकड़ों पेटेंट्स हैं और उन्होंने अपने क्षेत्र के नागरिकों के जीवन को आसान बनाने के लिये अनेक आविष्कार किये हैं। उन्होंने शून्य से नीचे के तापमान में रहकर सरहदों की रक्षा करते भारतीय सैनिकों के लिये ऐसे शिविरों की ईजाद की है जिनमें रहकर हमारे जवान अधिक सुविधाओं के साथ निगहबानी कर रहे हैं। किसी भी जागरूक नागरिक और सामाजिक कार्यकर्ता की तरह देश के दूरदराज इलाके में रहने वाले सोनम को वे सारे मुद्दे उद्वेलित करते हैं और वे गांधीवादी तरीके से उनका हल भी चाहते हैं। उनकी यही पवित्र मंशा कभी उन्हें लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची (आदिवासी क्षेत्रों में सुरक्षा सम्बन्धी नियम) लागू करने की मांग को लेकर हुए आंदोलन में (जो हिंसक हो गया था) शामिल होने के चलते राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत जोधपुर जेल में 170 दिन के लिये पहुंचाती है, तो वहीं नीट समेत अनेक परीक्षाओं के लीक होने और देश की शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा पर उनकी चिंता उन्हें सीजेपी के आंदोलन में शामिल होने के लिये प्रेरित करती है।

उनकी मंशा बेशक असंदिग्ध है, लेकिन वे देश की मुख्यधारा की राजनीति से नावाकिफ़ हैं। न ही वे बदले हुए निज़ाम के मिजाज़ को ठीक से भांप पाए हैं। यदि सोनम वे इसे ठीक से पहचानते तो शायद ही जंतर-मंतर का रुख करते। ऐसा कहने के कई कारण हैं। उनमें मुख्य तो यह है कि ज्यादातर युवाओं की सदस्यता वाली सीजेपी कोई संगठित दल नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा सोशल मीडिया पर टाइम पास करते हुए उन बेकार नौजवानों को कॉकरोच कहने से आहत हुए लोगों, खासकर छात्रों व युवाओं का सोशल मीडिया पर बना डिजिटल समूह मात्र है। सरकार के नज़रिये से वह किसी वर्ग का अधिकृत प्रतिनिधित्व नहीं करती। अमेरिका में पढ़ने गये दिपके द्वारा कुछ मीम्स, कार्टून्स, रील्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) निर्मित वीडियो आदि बनाकर मुख्य न्यायाधीश के बयान, शिक्षा के प्रति सरकार की उपेक्षा आदि की आलोचना की गयी।

तीन मई को हुई नीट की परीक्षा, जिसमें देश के लगभग 23 लाख परीक्षार्थी शामिल हुए थे, 12 मई को रद्द कर दी गयी थी। इससे व्यथित छात्र-छात्राएं और युवा, यहां तक कि सामान्य नागरिक भी सीजेपी से जुड़ गये। सदस्यता की कोई विधिवत प्रणाली तो है नहीं, इसलिये जिसने खुद को कॉकरोच माना वह सीजेपी का सदस्य बन गया। न तो उसका कोई पंजीकरण हुआ है और न ही वह चुनाव आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त दल है। इसकी शुरुआती लोकप्रियता से आशंकित सरकार के इशारे पर अभिजीत का इंस्टाग्राम एकाउंट सस्पेंड कर दिया गया लेकिन उनके नये एकाउंट को भी तगड़ा प्रतिसाद मिला। अनेक युवाओं ने अपने फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स खातों के जरिये सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला। माना गया कि ये सारे ही सीजेपी के सदस्य हैं। फॉलोवर्स की संख्या दो करोड़ तक देखते ही देखते पहुंच गयी।

वांगचुक शायद इससे प्रभावित हुए होंगे जबकि उन्हें धरना स्थल पर पहुंचकर इस तथ्य को तुरंत भांप लेना था कि दो करोड़ की फॉलोइंग वाले संगठन का कोई ठोस अस्तित्व नहीं है। इसलिये धरना स्थल पर पहले दिन कुछ हजार लोग ही पहुंचे। वैसे तो उन्हें अमेरिका से लौटने पर जिस तरह से दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने एयरपोर्ट पर ही जंतर-मंतर पर आंदोलन करने की इजाज़त दे दी थी- वही यह बतलाने के लिये काफी था कि भाजपा ने इस आंदोलन को फुस्स करने के पहले ही पुख्ता इंतजाम कर लिये हैं। सरकार को पता है कि सीजेपी कोई संगठित या मान्यताप्राप्त सियासी दल तो है नहीं जो भाजपा को राजनीतिक नुकसान पहुंचा सके। 2011 के लोकपाल आंदोलन में अभिजीत की संलिप्तता कुछ दिन पहले उजागर हुई थी। देश को उस आंदोलन का, जिसे 'अण्णा हजारे आंदोलन' भी कहा जाता है, कड़ुवा अनुभव रहा है। उसमें घुसे भारतीय जनता पार्टी तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों ने आंदोलन से आम आदमी पार्टी को बनने में मदद की। उसके बूते खुद 2014, 2019 व 2024 में केन्द्र में और इन 12 वर्षों में कई राज्यों में अपनी सरकारें बना लीं।

पर्यावरणवादी कार्यकर्ता तथा आमिर खान की 'थ्री इडियट्स' के चलते देश भर में और बड़ी पहचान बनाने वाले सोनम के प्रति आदर भाव तो है लेकिन उन्होंने भाजपा सरकार के अनेक कामों का जिस तरह से समर्थन किया है, उनके चलते सोनम की राजनीतिक प्रतिबद्धता अपने आप में संदिग्ध है। तिस पर सोनम ने बिना किसी पूर्व तैयारी और या योजना के 28 जून से भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनकी बिगड़ती तबियत को देखते हुए अनेक लोगों ने उनसे अनशन तोड़ने की अपील की है जिसके लिये वे अब तक तो तैयार नहीं हैं। उनकी जान बचाने का आग्रह करती एक याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में डाली गयी है। असली बात यह है कि अब तक न शिक्षा विभाग से कोई आंदोलनरत कॉकरोचों से बात करने आया है और न ही केन्द्र ने इस आंदोलन को खत्म करने में रूचि दिखलाई है। सोनम एवं अभिजीत के साथ जंतर-मंतर में उम्मीद लगाये हजारों युवा इस गलतफहमी में हैं कि लोकपाल आंदोलन के नेताओं से जिस प्रकार मनमोहन सिंह सरकार ने लोकतांत्रिक तरीके से बातचीत कर समझौता किया था, वैसा ही कुछ भाजपा करेगी। वे भूल रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इसी सरकार ने अपने उत्पादों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग करते किसानों को तकरीबन डेढ़ वर्ष तक दिल्ली की टिकरी, गाजीपुर व सिंधु बॉर्डर पर सड़ाया था। इसमें लगभग 800 किसानों ने शहादत दी थी; जिसके बारे में मोदी ने कहा था- 'वे क्या मेरे लिये मरे हैं?' उन्हें यह भी ख्याल में रखना था कि ये वही मोदी हैं जिन्होंने अचानक लागू की गयी नोटबन्दी के कारण लोगों की परेशानियों पर अट्टहास करते हुए विदेश में कहा था कि, 'घर में शादी है पर जेब में पैसे नहीं हैं।' नोटबन्दी, कोरोना, कुम्भ, कई रेल-सड़क हादसे, धंसकते पुल व सड़कें, एथेनॉल जैसे लोगों पर आने वाले संकटों पर (जिनमें से कई जानलेवा साबित हुए हैं) मोदी व उनकी सरकार मौन रहती है। नोएडा में तनख्वाह बढ़ाने की मांग करने वाले सैकड़ों श्रमिकों-कर्मचारियों का जिस प्रकार से उत्तर प्रदेश की डबल इंजिन सरकार ने दमन किया है- वह क्या मु_ी भर कॉकरोचों के आगे झुकेगी? उलटे, मोदी ने प्रधान के काम-काज की तारीफ कर संदेश दिया है कि उनसे लड़ने का तरीका बदलना होगा।

एक पत्रकार ने, जिनकी अपनी प्रतिबद्धता संदेहास्पद है, अनशनकारी सोनम से जब आंदोलन को लोकसभा में कांग्रेस के समर्थन के बारे में पूछा तो, वांगचुक ने कहा- 'यदि राहुल गांधी जंतर-मंतर पर नहीं आते तो यह उनका छोटापन होगा।' इस एक वाक्य ने आंदोलन की दिशा मोड़ दी है। अब यह लड़ाई भाजपा के आईटी सेल, गोदी मीडिया और ट्रोल आर्मी द्वारा 'कॉकरोच बनाम सरकार' की बजाय 'कॉकरोच वर्सेस राहुल' बनाई जायेगी। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक ही नहीं जागरूक नागरिक भी पूछ रहे हैं कि क्या आंदोलन करने के पहले राहुल गांधी या कांग्रेस को विश्वास में लिया गया था? दूसरे, वांगचुक, अभिजीत या अन्य लोग तब राहुल के साथ क्यों नहीं आये जब उन्होंने जन मुद्दों को लेकर दो बार देशव्यापी मार्च किया था?

वैसे भी इस आंदोलन के 2011 के संस्करण ने जिस दल की सरकार को अपदस्थ किया था, वह कांग्रेस ही थी, जिसे न राहुल भूल सकते न कांग्रेस। न ही यह भूलना चाहिये। वैसे भी कांग्रेस इस मुद्दे पर कई राज्यों में आंदोलन कर ही रही है। दरअसल सोनम को राहुल की ज़रूरत शक्ति के साथ सरकार की ओर से आंदोलन को मान्यता दिलाने के लिये भी है।

(लेखक देशबन्धु के राजनीतिक सम्पादक हैं)


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