एक किताब : जहां सुर की उठान के एहसास से भरे अनछुए किस्से हैं
संगीत के सुरों के साथ तमाम शख्सियतों के ऐसे किस्से जो भाषा की रवानगी और संवेदनशीलता के एहसास से भरी है

संगीत एक ऐसा एहसास है जिसे शब्दों में उतार पाना किसी कलाकार या किसी संवेदनशील लेखक के बस की ही बात है... और जब शब्द और सुरों की उठान का तालमेल एक सधे हुए अंदाज़ में होता है तो आप एक ‘ऑफबीट आलाप’ के समंदर में डूबने उतराने लगते हैं... देवप्रकाश चौधरी की नई किताब ‘शब्द उठान सुर तिहाई’ पढ़ते हुए आप उनकी भाषा और शब्दों के संगीतमय एहसास में डूब जाएंगे..किस्सागोई वाला उनका अंदाज़ आपको कोई पन्ना बीच में छोड़ देने की आज़ादी नहीं देगा और आप इसके हर हिस्से में रम से जाएंगे। इसके मुखड़े से शुरु होने वाली इसकी यात्रा में कई पड़ाव ऐसे आते हैं जहां आप कुछ देर ठिठकते हैं और बेहद संवेदनशील तरीके से सोचने को मजबूर भी हो जाते हैं...मसलन - ‘विभाजन की लकीर ने जमीन तो बांट दी लेकिन रागों को नहीं बांट पाई..’ लेखक ने बड़े गुलाम अली खां को याद करते हुए जो कहा वो दिल में उतरने जैसा है – ‘बड़े गुलाम अली खां सरहद के उस पार पाकिस्तान में अपनी जड़ें तलाश रहे थे लेकिन जिनकी रुह बनारस के घाटों और कसूर की गलियों के बीच हिचकोले खा रही थी...’
देवप्रकाश चौधरी की ये किताब संगीत की जटिलता से दूर आपको किस्सों के खूबसूरत गुलदस्तों की खुशबू बिखेरती मिलेगी जहां राग भी है, लय भी और ताल भी.. आपने संगीत की बहुत सी महफिलें देखी होंगी, उन्हें सुना होगा और उसमें डूबते उतराते उस पल को जिया होगा... लेकिन इनसे जुड़े किस्सों को कभी इतने करीब से महसूस कर शब्दों में बांधने की कला आसान नहीं, देवप्रकाश ने इसे बहुत ही खूबसूरती से आपके बीच रखा है.. यहां एक ऐसा कलाकार आपको हर शब्द में दिखेगा जो रंगों और संगीत की भाषा को गहराई से आत्मसात करता हुआ मिलेगा... संगीत के सात सुरों में बंधी ये किताब आपको षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद के रूप में तो मिलेगी ही, जोड़ झाला में आप उन संदर्भों को पाएंगे जहां से ये कहानियां शक्ल अख्तियार करती हैं।
बेशक कोई लेखक इन अहसासों को शब्दों में पिरोने के लिए तमाम पड़ावों से होकर गुज़रता है और उन पड़ावों से कुछ ऐसी अनकही दास्तान लेकर आता है जो आपको कई दफ़ा उस कालखंड में भी ले जाएगी और संगीत के साथ संवेदना के उन रूपों से भी रू ब रू कराएगी जो खूबसूरत शब्दों में बंधकर एक दिलचस्प एहसास की तरह आपके मन में उतर जाएगी। चाहे वो फैयाज़ खान हों या भीमसेन जोशी, पंडित जसराज हों या किशोरी अमोनकर या फिर उस्ताद ज़ाकिर हुसैन हों, उस्ताद अमीर खां हों या फिर एम एस सुब्बुलक्षामी और तो और लता मंगेशकर हों या मन्ना डे... हर किरदार और उसके होने के एहसास से भरी इस किताब की खूबसूरती जब आप देखेंगे तो उसमें भाषा के साथ कला का भी कम योगदान नहीं है... वरिष्ठ कलाकार सत्येन्दु प्रकाश मिश्रा ने जिस खूबसूरती से इसे संवारा है, आवरण समेत तमाम जगहों पर अपनी बेहतरीन कला दृष्टि का एहसास कराया है और उभरती कलाकार ब्राह्मी पांडेय ने अपनी कलात्मकता का परिचय दिया है उसने सर्वभाषा ट्रस्ट की इस किताब में चार चांद लगाए हैं।
किस्से तमाम हैं लेकिन उन्हें पेश करने का अंदाज़ निराला... मानो आप किसी राग को आत्मसात कर रहे हों, ध्रपुद के एहसास को डागर बंधुओं को सुनकर समझना हो या फिर उनके पिता नसीरुद्दीन खान डागर की डागर वाणी को आगे बढ़ाने वाली पीढ़ी के गुंदेचा बंधुओं को समझना हो तो इस किताब में आपको उसका एक हिस्सा मिलेगा..बनारस की सुबह का एहसास अगर उस्ताद बिस्मिल्ला खान की शहनाई और उनके किस्सों से न हो तो शहनाई की तान अधूरी रह जाती है, वहीं गिरिजा देवी की ठुमरी, दादरा, चैती और कजरी को आपने न सुना और इनके किस्से न सुने तो क्या सुना... ओंकारनाथ ठाकुर से लेकर देश के अलग अलग हिस्सों के तमाम दिग्गजों के किस्से आपको मिल जाएंगे जहां कालखंड बेशक अलग अलग होंगे लेकिन सुरों का एहसास वही होगा। किताब बहुत रिसर्च के बाद लिखी गई है और अंदाज़ ऐसा है जिसके लिए आपको संगीत की बारीकियों से ज्यादा उनसे जुड़ी हर शख्सियत को जानना समझना होगा। संगीत के तमाम पहलुओं से लेकर घरानों और शख्सियतों पर किताबें तो बहुत आईं, लेकिन अगर आपको किसी नए एहसास से गुज़रना हो तो कलाकार, पत्रकार और लेखक देवप्रकाश चौधरी के ये किताब आपके लिए एक ज़रूरी किताब है।
किताब – शब्द उठान सुर तन्हाई लेखक – देवप्रकाश चौधरी प्रकाशक – सर्वभाषा ट्रस्ट मूल्य – 225 रुपए मात्र
यह आलेख - अतुल सिन्हा


