अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता एरिन ब्रोकोविच के निशाने पर क्यों हैं एआई के डाटा सेंटर
क्या आपके इलाके में भी कोई नया डाटा सेंटर बनने जा रहा है? आज अमेरिका के बहुत से लोग इस सवाल का जवाब ‘हां’ में दे पा रहे हैं और यह मुमकिन हुआ है एरिन ब्रोकोविच की ओर से बनाए गए एक मैप की वजह से;
क्या आपके इलाके में भी कोई नया डाटा सेंटर बनने जा रहा है? आज अमेरिका के बहुत से लोग इस सवाल का जवाब ‘हां’ में दे पा रहे हैं और यह मुमकिन हुआ है एरिन ब्रोकोविच की ओर से बनाए गए एक मैप की वजह से.
दुनिया भर में बहुत तेजी से बन रहे विशाल डाटा सेंटर के खिलाफ चल रहे विरोध में अब अमेरिका की एक बेहद मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल हो गई हैं और उनका नाम है एरिन ब्रोकोविच. 65 साल की इस पर्यावरण कार्यकर्ता को हॉलीवुड की उस मशहूर फिल्म ने दुनिया भर में पहचान दिलाई थी, जो उन्हीं के नाम पर बनी थी और जिसमें उनका किरदार जूलिया रॉबर्ट्स ने निभाया था.
अब उन्होंने एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म शुरू किया है: ‘ब्रोकोविच डाटा सेंटर'. यह प्लेटफॉर्म अमेरिका में बनने वाले नए डाटा सेंटर की योजना और उनके निर्माण से जुड़ी सारी जानकारियां जुटाता है. साथ ही, एक नक्शे पर उनकी सही लोकेशन दिखाते हैं. ब्रोकोविच लिखती हैं, "यह मैप डाटा सेंटर बनाने की इस दौड़ के असली असर को दिखाता है जिससे यह साफ पता चलता है कि ये कहां तेजी से बढ़ रहे हैं, कहां इन्हें लेकर विवाद चल रहा है और कहां हालात अभी अनिश्चित हैं.”
अप्रैल में इस प्लेटफॉर्म को शुरू करने के बाद से उन्हें लोगों से हजारों गुप्त जानकारियां मिली हैं. उनका मकसद आम अमेरिकी नागरिकों की आवाज बनना और उन्हें यह समझने में मदद करना है कि ये एआई डाटा सेंटर कहां-कहां स्थित हैं, क्योंकि उनका मानना है कि "जनता को यह बात सबसे आखिर में नहीं पता चलनी चाहिए.”
डाटा सेंटर का विरोध क्यों हो रहा है?
डाटा सेंटर किसी न किसी रूप में पिछले कई दशकों से मौजूद रहे हैं. लेकिन हाल के सालों में, तकनीक के क्षेत्र की बड़ी कंपनियों ने पूरी दुनिया में नए डाटा सेंटर बनाने का काम बहुत ज्यादा तेज कर दिया है. आज के समय में सिर्फ एआई को चलाने के लिए ही नहीं, बल्कि क्लाउड सर्विसेज और अलग-अलग ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के लिए भी डाटा सेंटर की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है.
ब्रोकोविच जैसे आलोचक सबसे ज्यादा इस बात पर उंगली उठा रहे हैं कि इन डाटा सेंटर को चलाने और इनकी मशीनों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में बिजली और पानी की जरूरत पड़ती है. बर्लिन और ज्यूरिख में स्थित गैर-सरकारी संस्था ‘एल्गोरिदमवॉच' के मुताबिक, एक अकेला डाटा सेंटर उतनी बिजली खर्च कर सकता है जितना एक छोटे से शहर में खपत होती है.
भारत जैसे देशों में तो डाटा सेंटर बनने की वजह से पानी की भारी किल्लत पैदा हो सकती है. भारत में एक डाटा सेंटर के पास रहने वाले लोगों ने डीडब्ल्यू को बताया कि जब से यहां डाटा सेंटर बना है, तब से उन्हें पूरे दिन में सिर्फ कुछ ही घंटों के लिए पानी मिल पा रहा है.
इसके अलावा, इन सेंटर में इस्तेमाल होने वाले कंप्यूटर और मशीनें बहुत जल्दी खराब हो जाती हैं, जिससे भारी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है. अपनी वेबसाइट पर ब्रोकोविच ने ध्वनि प्रदूषण का भी जिक्र किया है, जिससे वहां के इंसानों और जानवरों, दोनों को भारी परेशानी होती है.
इसके अलावा, यह जरूरी नहीं है कि जिन इलाकों में डाटा सेंटर बनाए जाएं, उन इलाकों को आर्थिक फायदा हो. निवेशक इनके निर्माण में अरबों डॉलर जरूर लगाते हैं, लेकिन इससे स्थानीय लोगों को न के बराबर नौकरियां मिलती हैं. ये डाटा सेंटर अक्सर हजारों-लाखों स्क्वायर मीटर की बड़ी जगहों में फैले होते हैं, लेकिन वहां काम करने के लिए मौके पर सिर्फ कुछ दर्जन कर्मचारियों की जरूरत होती है.
ज्यादातर डाटा सेंटर कहां बनाए गए हैं?
इस समय अमेरिका में करीब 5,400 डाटा सेंटर हैं, जो दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले कहीं ज्यादा हैं. यूरोन्यूज पोर्टल की 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में जर्मनी दूसरे नंबर पर आता है. इसके बाद ब्रिटेन, चीन, कनाडा, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड्स और रूस का नंबर आता है.
पूरी दुनिया में, खासकर ग्रामीण या कस्बाई इलाकों में, बहुत से नए डाटा सेंटर बनाने की तैयारी चल रही है. अमेरिका के अलावा, पूर्वी एशिया के अलग-अलग हिस्सों में भी हजारों नए डाटा सेंटर बनाए जाने हैं.
जर्मनी की संघीय आर्थिक विकास एजेंसी ‘जर्मनी ट्रेड एंड इन्वेस्ट' के मुताबिक, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान इसके लिए पूरी तरह तैयार बैठे हैं. उधर संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और कतर भी अपने यहां डाटा सेंटर का तेजी से विस्तार कर रहे हैं. वहीं अगर जर्मनी की बात करें, तो वहां ज्यादातर नए डाटा सेंटर फ्रैंकफर्ट और उसके आसपास के इलाकों में बनाए जाने हैं.
किन इलाकों में मौजूद डाटा सेंटर के निर्माण पर रोक लगाई जा रही है?
ब्रोकोविच का यह प्लेटफॉर्म सिर्फ यही नहीं बताता कि नए डाटा सेंटर कहां बनने जा रहे हैं, बल्कि यह ‘मोरेटोरियम' यानी निर्माण पर लगाई गई अस्थायी रोक का रिकॉर्ड भी रखता है. यह अस्थायी रोक इसलिए लगाई जाती है, ताकि इस परियोजना से पर्यावरण और समाज पर पड़ने वाले असर को समझने का समय मिल सके. वेबसाइट पर लिखा है, "इन पाबंदियों का समय और दायरा अलग-अलग हो सकता है, लेकिन इन सबका मकसद एक ही है: प्लानिंग से पहले निर्माण को आगे मत बढ़ने दो.”
यूरोप की सबसे बड़ी कंपनी एएसएमएल से टाटा की डील
यह प्लेटफॉर्म दिखाता है कि अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना, पेंसिल्वेनिया, मैरीलैंड, फ्लोरिडा, टेक्सास और मेन जैसे राज्यों में डाटा सेंटर पर ऐसी अस्थायी रोक लगाई गई है. लेकिन यह पाबंदी हमेशा कामयाब नहीं होती. मसलन, अप्रैल में मेन राज्य की संसद ने एक नए डाटा सेंटर पर रोक लगा दी थी, जिसे चलाने के लिए 20 मेगावाट से ज्यादा बिजली की जरूरत थी, लेकिन वहां की गवर्नर जेनेट मिल्स ने अपने वीटो (विशेषाधिकार) का इस्तेमाल करके इस फैसले को कानून बनने से रोक दिया.
दुनिया के दूसरे हिस्सों, जैसे कि आयरलैंड और नीदरलैंड्स में भी इन डाटा सेंटर के खिलाफ विरोध हो रहा है. साल 2024 में, चिली के एक पर्यावरण संरक्षण संगठन ने एआई वाले एक डाटा सेंटर के निर्माण के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन किया और उसे रुकवाने में कामयाब रहा. वहीं ब्राजील में भी, जो खुद को डाटा सेंटर का नया गढ़ मान रहा है, वहां विरोध लगातार बढ़ रहा है. खासकर देश के उत्तर-पूर्वी इलाकों में.भविष्य के डिजिटल 'कच्चे माल' की तरह डाटा जुटा रहा है चीन
इसी तरह का माहौल अब जर्मनी में भी देखने को मिल रहा है. अभी पिछले ही महीने, ‘स्पीगल' पत्रिका ने एक रिपोर्ट छापी थी कि अमेरिकी कंपनी ‘एजकॉनेक्स' ने एक डाटा सेंटर को बिजली देने के लिए गैस पावर स्टेशन बनाने की अपनी योजना को रद्द कर दिया. रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी वहां के स्थानीय लोगों और सिटी काउंसिल की मर्जी के खिलाफ जाकर इस प्रोजेक्ट को जबरदस्ती आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी.
हालांकि, ‘एल्गोरिदमवॉच' संस्था ने ध्यान दिलाया है कि कई मामलों में स्थानीय स्तर पर लोगों से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया जाता. जिन लोगों पर इसका असर पड़ना है, उन्हें तब जाकर पता चलता है जब बहुत देर हो चुकी होती है.
मिसाल के तौर पर, स्पेन में कुछ मेयरों को उनके ही इलाकों में बनने वाले डाटा सेंटर की योजना की कोई भनक तक नहीं थी और उन्हें इस बारे में तब पता चला जब स्थानीय अखबारों में खबरें छपीं. एरिन ब्रोकोविच का यह इंटरेक्टिव मैप भविष्य में ऐसा होने से रोकेगा. कम से कम अमेरिका में तो ऐसा नहीं होने देगा.